WB Election 2026: Record Voting Meaning

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026:  रिकॉर्ड मतदान के मायने

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 में रिकॉर्ड मतदान ने नई राजनीतिक बहस छेड़ दी है। 92% से अधिक वोटिंग के पीछे सुरक्षा, बदलाव और जन-आक्रोश के संकेत देखे जा रहे हैं।

By : स्वदेश डेस्क
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026:  रिकॉर्ड मतदान के मायने

अवधेश कुमार

भारतीय चुनाव में जो पहले कभी नहीं हुआ, वह 2026 पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में हो गया। अब तक 92.86 प्रतिशत मतदान का रिकॉर्ड दर्ज किया गया है। तमिलनाडु में भी लगभग 85 प्रतिशत मतदान एक रिकॉर्ड है। अंतिम आंकड़ा आने के बाद इसमें और वृद्धि की संभावना है। पूर्वोत्तर राज्यों में मतदान प्रतिशत औसत से अधिक रहा है, लेकिन वहां भी केवल 2018 के त्रिपुरा विधानसभा चुनाव में 91.4% मतदान हुआ था।

बंगाल में 2011 से मतदान औसत से अधिक रहा है। 2011 में 84.5%, 2016 में 82.56% और 2021 में 81.56% मतदान हुआ। वैसे 2010 के बाद से मतदान में वृद्धि देशव्यापी प्रवृत्ति रही है। मतदान अंकगणित का विषय है, लेकिन इसकी परिणति राजनीतिक होती है और इसके मायने राजनीति के साथ सामाजिक और सांस्कृतिक आयाम तक जाते हैं।

बंगाल का दूसरा चरण अभी बाकी है, इसलिए संपूर्ण मूल्यांकन उसके बाद ही होगा। पर चुनाव के दौरान बने हुए माहौल का संकेत यही है कि मतदान की रिकॉर्ड प्रवृत्ति में ज्यादा अंतर नहीं आने वाला और यही संकेत भी छिपा हुआ है। 2010 के पहले सामान्यतः मतदान में वृद्धि को सत्तारूढ़ पार्टी या घटकों की पराजय के रूप में देखा जाता था और अधिकतर मामलों में ऐसा ही हुआ। बाद में यह प्रवृत्ति बदल गई। मतदान बढ़ने के बावजूद सरकारें वापस आती रहीं और मतदान घटना पर भी कई सरकारें गईं। इसलिए सामान्यतः मतदान प्रतिशत किसी सरकार के जाने या नई सरकार के आने का निश्चयात्मक संकेत नहीं माना जा सकता।

बंगाल में 2011 में 84.5 प्रतिशत का रिकॉर्ड मतदान हुआ और वामपंथी मोर्चे की 34 वर्षों की सरकार चली गई। उसके बाद मतदान प्रतिशत थोड़ा-थोड़ा घटा, किंतु ममता बनर्जी वापस आती रहीं। चुनाव आयोग द्वारा विशेष मतदाता पुनरीक्षण अभियान (SIR) के कारण अब वास्तविक मतदाताओं के नाम ही बचे हैं, इसलिए हर राज्य में मतदान प्रतिशत संतोषजनक होगा।पिछले वर्ष बिहार चुनाव में 67.25% मतदान हुआ, जो 2020 के 57.29% से 9.96% अधिक था। बिहार में लगभग 65 लाख नाम SIR प्रक्रिया में हटाए गए थे। बंगाल में कुल 90 लाख 83 हजार 345 मतदाताओं के नाम सूची से हटाए गए। कई लाख मतदाताओं ने अपनी आपत्ति दर्ज कराई हुई है और न्यायिक प्राधिकरणों को निर्णय लेना है। किंतु 7.66 करोड़ की जगह मतदाताओं की संख्या 6.7 करोड़ रह गई।

यह सच नहीं है कि प्रतिशत ज्यादा होने के बावजूद कुल मतों की संख्या इतनी नहीं बढ़ी। पिछले चुनाव से लगभग 26 लाख अधिक मतदाताओं ने मतदान किया। भारी संख्या में मृत, स्थानांतरित, दो जगह नाम वाले या फर्जी नाम मतदाता सूची में थे, जिनके नाम पर मतदान होता था। इनकी संख्या बहुत बड़ी थी, लेकिन इनके नाम पर कितने वोट डाले गए, इसकी गणना कोई नहीं कर सकता।अगर 6.77 करोड़ मतदाताओं के आधार पर पिछला मतदान होता, तो मतदाताओं की संख्या कम होती और इस बार वृद्धि बहुत अधिक होती। इस महत्वपूर्ण पहलू की अनदेखी नहीं की जानी चाहिए।

2011 में ममता बनर्जी ने लगभग 5 वर्षों के अनवरत संघर्ष और आक्रामकता से मतदाताओं में वाममोर्चा सरकार के विरुद्ध गुस्सा और आक्रोश पैदा किया था। वाममोर्चा समर्थक भी उनके साथ आए और तृणमूल का अपना आधार भी खड़ा हुआ। जब से भाजपा ने बंगाल में अपनी विचारधारा और राजनीति को जमीन पर उतारने का अभियान चलाया है, ममता के विरुद्ध समाज के निचले स्तरों पर जबरदस्त आक्रोश है और कुछ महीनों में 2011 पूर्व की स्थिति ममता और भाजपा के संदर्भ में उल्टी हो गई है।ममता समर्थक और विरोधी तथा भाजपा समर्थक और विरोधी दोनों पक्षों में अपने-अपने मतदाताओं को अधिक संख्या में मतदान केंद्रों तक पहुंचाने की प्रबल भावना है। 2019 लोकसभा चुनाव में इसका परिणाम दिखा, जब भाजपा ने 40% मत के साथ 18 सीटें जीत लीं। 2018 पंचायत चुनाव में भी जबरदस्त आक्रोश था और संकेत मिल गया था कि भाजपा जमीन पर नीचे तक पहुंच चुकी है तथा राज्य से कांग्रेस और वाम दलों का लगभग सफाया हो चुका है।

भाजपा और उसके विरोधियों की दो ध्रुवीय राजनीति में पक्ष और विपक्ष दोनों तरह की लहर भारत में देखी गई है। 2021 में भी भाजपा ने वातावरण बनाने की कोशिश की, लेकिन तब तीन सीटों से बहुमत तक पहुंचना बंगाल के सामाजिक-सांप्रदायिक समीकरणों में कठिन था। इसलिए लगभग 38% मत के साथ 77 सीटों तक ही पहुंच सकी। कोरोना महामारी के कारण बने सरकार विरोधी माहौल का भी थोड़ा असर हुआ।बंगाल में 1967 के बाद से ही मतदाताओं की सुरक्षा आम लोगों के लिए हमेशा बड़ा मुद्दा रही है। चुनावी रैगिंग या धांधली प्रदेश का स्वाभाविक चरित्र पिछले 60 वर्षों में बना रहा है। कांग्रेस, फिर वाम दल और तृणमूल कांग्रेस ने भी इस प्रवृत्ति को कायम रखा।

इस बार बड़ी संख्या में मतदाताओं के मतदान करने का प्रमुख कारण सुरक्षा और भरोसे का माहौल दिखता है। पहले चरण में केंद्रीय बलों की 2407 कंपनियां, 2193 क्विक रिस्पांस टीमें और 40,000 पुलिसकर्मियों की तैनाती की गई थी। जहां समस्या होती दिखी, वहां मतदान से पहले ही केंद्रीय बल तुरंत पहुंचते थे।इसके बावजूद दक्षिण दिनाजपुर में एक भाजपा उम्मीदवार को लोगों द्वारा खदेड़ने और पिटाई का वीडियो यह संकेत देता है कि कुछ क्षेत्रों में भय और तनाव बना रहा। लेकिन सुरक्षा व्यवस्था के कारण हिंसा में रिकॉर्ड कमी आई है।

मतदान के बाद भी केंद्रीय बलों की उपस्थिति ने मतदाताओं में सुरक्षा का भाव पैदा किया। 2021, 2019 और 2018 के चुनावों में मतदान के बाद हिंसा और पलायन से भय का माहौल बना था। 2026 में माहौल में बदलाव साफ दिखाई दे रहा है। मतदाता धीरे-धीरे खुलकर अपना मत व्यक्त कर रहे हैं।लंबे समय बाद मतदान अपेक्षाकृत निर्भय, कम हिंसा और बेहतर सुरक्षा वातावरण में संपन्न होता दिख रहा है। इसका प्रभाव निश्चित रूप से परिणामों में भी दिखाई देगा।

 

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