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वीर सावरकर जयंती (28 मई) विशेष

त्याग, तप, आत्मबल और तेजस्वी राष्ट्रचेतना के अमर प्रतीक : वीर सावरकर

काला पानी की कालकोठरी में भी जिसने स्वतंत्रता की ज्योति बुझने नहीं दी ।


 त्याग तप आत्मबल और तेजस्वी राष्ट्रचेतना के अमर प्रतीक  वीर सावरकर

शुभानन मधुसूदन खेमरिया

“याद करो काला पानी को, अंग्रेजों की मनमानी को,
कोल्हू में जुट तेल फेरते सावरकर से बलिदानी को।”

भारत माता की स्वतंत्रता के लिए अपना संपूर्ण जीवन समर्पित कर देने वाले महान क्रांतिकारी विनायक दामोदर सावरकर केवल एक स्वतंत्रता सेनानी नहीं थे, बल्कि वे साहस, आत्मबल, त्याग, तप और राष्ट्रचेतना के जीवंत प्रतीक थे। 28 मई 1883 को महाराष्ट्र के नासिक जिले के भगूर गांव में जन्मे वीर सावरकर बचपन से ही राष्ट्रभक्ति की भावना से ओतप्रोत थे। उनका संपूर्ण जीवन भारत माता की सेवा, स्वतंत्रता और राष्ट्र जागरण के लिए समर्पित रहा।

अंग्रेजी शासन के अत्याचारों के समय जब देश भय और दमन के वातावरण से गुजर रहा था, तब वीर सावरकर जी ने निर्भीक होकर क्रांति का बिगुल फूंका। उन्होंने युवाओं के भीतर स्वतंत्रता की ऐसी ज्वाला प्रज्वलित की, जिसने आगे चलकर अंग्रेजी शासन की नींव हिला दी। छात्र जीवन में उन्होंने “मित्र मेला” और बाद में “अभिनव भारत” जैसे संगठनों की स्थापना कर युवाओं को राष्ट्रसेवा और स्वतंत्रता संग्राम के लिए प्रेरित किया। उनका मानना था कि राष्ट्र की स्वतंत्रता केवल शब्दों से नहीं, बल्कि साहस, संगठन और बलिदान से प्राप्त होती है।

वीर सावरकर जी केवल क्रांतिकारी ही नहीं, बल्कि महान चिंतक, साहित्यकार और ओजस्वी वक्ता भी थे। उन्होंने अपने साहित्य और लेखनी के माध्यम से भारतीय समाज में राष्ट्रवाद और स्वाभिमान की चेतना जागृत की। उनकी प्रसिद्ध पुस्तक “1857 का स्वातंत्र्य समर” ने अंग्रेजों द्वारा “गदर” कहे जाने वाले संघर्ष को भारत का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम सिद्ध किया। यह पुस्तक उस समय क्रांतिकारियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बन गई थी।

अंग्रेज सरकार उनके विचारों और क्रांतिकारी गतिविधियों से इतनी भयभीत थी कि उन्हें गिरफ्तार कर अंडमान की सेल्यूलर जेल भेज दिया गया, जिसे “काला पानी” कहा जाता था। वहां कैदियों के साथ अमानवीय व्यवहार किया जाता था। कैदियों को कोल्हू में बैलों की तरह जोतकर तेल निकलवाया जाता, कठोर श्रम कराया जाता और मानसिक रूप से प्रताड़ित किया जाता था। लेकिन इन असहनीय यातनाओं के बीच भी वीर सावरकर जी का आत्मबल कभी नहीं टूटा। उन्होंने जेल की दीवारों पर कीलों और पत्थरों से कविताएं लिखीं तथा उन्हें स्मरण कर अपने साथियों तक पहुंचाया। यह केवल एक व्यक्ति का संघर्ष नहीं था, बल्कि राष्ट्रभक्ति की उस अमर चेतना का प्रतीक था जिसे कोई शक्ति समाप्त नहीं कर सकती थी।

वीर सावरकर जी का जीवन हमें यह सिखाता है कि कठिन परिस्थितियां व्यक्ति को कमजोर नहीं बनातीं, बल्कि उसके आत्मबल की परीक्षा लेती हैं। उन्होंने अपने जीवन से यह सिद्ध किया कि यदि मन में राष्ट्र के प्रति समर्पण और आत्मविश्वास हो, तो संसार की कोई भी बाधा बड़ी नहीं होती। उनका मानना था कि मातृभूमि के लिए जीवन समर्पित करना किसी भी पुत्र के लिए सबसे बड़ा गौरव है।

आज जब समाज अनेक प्रकार की चुनौतियों से जूझ रहा है, तब वीर सावरकर जी का जीवन युवाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत है। उनका इतिहास केवल वीरता की कहानी नहीं, बल्कि संघर्ष, धैर्य और राष्ट्रनिष्ठा का महान संदेश है। वे हमें सिखाते हैं कि राष्ट्र सर्वोपरि होता है और उसके सम्मान के लिए हर प्रकार का त्याग छोटा पड़ जाता है।

वीर सावरकर जयंती केवल एक महान क्रांतिकारी को स्मरण करने का अवसर नहीं, बल्कि राष्ट्र के प्रति अपने कर्तव्यों को समझने का भी दिन है। हमें उनके जीवन से प्रेरणा लेकर राष्ट्र की एकता, संस्कृति और स्वाभिमान की रक्षा के लिए सदैव तत्पर रहना चाहिए।

आज उनकी जयंती पर हम सभी को यह संकल्प लेना चाहिए कि हम राष्ट्रहित को सर्वोपरि मानते हुए भारत माता की सेवा, संस्कृति के संरक्षण और समाज के उत्थान के लिए निरंतर कार्य करेंगे। वीर सावरकर जी का संघर्ष, उनका आत्मबल और उनका राष्ट्रप्रेम आने वाली पीढ़ियों को सदैव प्रेरणा देता रहेगा।

“जिसने कालकोठरी की अंधेरी दीवारों में भी स्वतंत्रता का स्वप्न जीवित रखा, वही सच्चे अर्थों में राष्ट्रवीर कहलाने का अधिकारी है।”

लेखक: शुभानन मधुसूदन खेमरिया- युवा लेखक, स्तंभकार

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