भारतीय वायुसेना को विदेशी सुखोई-57 और स्वदेशी एएमसीए विमानों के बीच चुनाव करने की चुनौती है, जो राष्ट्रीय सुरक्षा और आत्मनिर्भरता के बीच संतुलन स्थापित करेगा।
अनुराग तागड़े
नई दिल्ली। विश्व की बदलती सामरिक परिस्थितियों के बीच भारत की वायु सुरक्षा एक महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़ी दिखाई दे रही है। एक ओर चीन तेजी से अपनी पंचम पीढ़ी की युद्धक विमान क्षमता का विस्तार कर रहा है, वहीं पाकिस्तान भी आधुनिक लड़ाकू विमानों के क्षेत्र में नई प्रौद्योगिकियों को अपनाने का प्रयास कर रहा है। ऐसे समय में रूस द्वारा भारत को अपने अत्याधुनिक पंचम पीढ़ी के युद्धक विमान सुखोई-57 के संयुक्त उत्पादन और प्रौद्योगिकी हस्तांतरण का प्रस्ताव दिए जाने से रक्षा विशेषज्ञों के बीच नई चर्चा प्रारंभ हो गई है।दूसरी ओर भारत का स्वदेशी उन्नत मध्यम लड़ाकू विमान (एएमसीए) कार्यक्रम अभी विकास के चरण में है। यह परियोजना भारतीय रक्षा आत्मनिर्भरता की आधारशिला मानी जा रही है, किंतु इसके पूर्ण रूप से वायुसेना में शामिल होने में अभी कई वर्ष लग सकते हैं। ऐसे में प्रश्न उठ रहा है कि क्या भारत को सुखोई-57 को अपनाना चाहिए अथवा केवल एएमसीए पर ही निर्भर रहना चाहिए?
घटती स्क्वाड्रन शक्ति बनी चिंता
भारतीय वायुसेना की स्वीकृत क्षमता 42 लड़ाकू स्क्वाड्रन की है, जबकि वर्तमान में यह संख्या लगभग 31 स्क्वाड्रन के आसपास बनी हुई है। पुराने मिग विमानों की सेवानिवृत्ति तथा नए विमानों की धीमी आपूर्ति के कारण यह अंतर लगातार बढ़ता जा रहा है। रक्षा मामलों की संसदीय और सरकारी समितियां भी वायुसेना की क्षमता में शीघ्र वृद्धि की आवश्यकता पर बल दे चुकी हैं।विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते पर्याप्त संख्या में आधुनिक लड़ाकू विमान नहीं मिले, तो आने वाले वर्षों में भारत को चीन और पाकिस्तान के संयुक्त सामरिक दबाव का सामना करना पड़ सकता है।
क्या है सुखोई-57?
सुखोई-57 रूस का पंचम पीढ़ी का बहुउद्देशीय युद्धक विमान है। इसमें अदृश्यता (स्टील्थ) प्रौद्योगिकी, अत्याधुनिक सक्रिय इलेक्ट्रॉनिक स्कैनिंग रडार, सुपरक्रूज़ क्षमता, उच्च गतिशीलता तथा उन्नत इलेक्ट्रॉनिक युद्ध प्रणाली जैसी विशेषताएं हैं। यह वायु युद्ध के साथ-साथ भूमि और समुद्री लक्ष्यों पर भी प्रभावी प्रहार करने में सक्षम माना जाता है।रूस का दावा है कि सुखोई-57 का उत्पादन अब ऐसी गति प्राप्त कर चुका है जिससे घरेलू और विदेशी दोनों प्रकार की मांग पूरी की जा सकती है। हाल ही में इसके लिए नए और अधिक शक्तिशाली इंजन के परीक्षण भी प्रारंभ किए गए हैं।
एएमसीए : आत्मनिर्भर भारत की उड़ान
उन्नत मध्यम लड़ाकू विमान परियोजना भारत की सबसे महत्वाकांक्षी सैन्य विमानन योजना मानी जा रही है। इसका उद्देश्य ऐसा स्वदेशी पंचम पीढ़ी का युद्धक विमान विकसित करना है जो भविष्य के नेटवर्क-केंद्रित युद्ध, स्टील्थ अभियान और लंबी दूरी के प्रहार में सक्षम हो।रक्षा मंत्रालय और वैमानिकी विकास अभिकरण (एडीए) इस परियोजना को आगे बढ़ाने के लिए निजी क्षेत्र की भागीदारी भी सुनिश्चित कर रहे हैं। सरकार का उद्देश्य केवल एक विमान बनाना नहीं, बल्कि देश में एक संपूर्ण एयरोस्पेस पारिस्थितिकी तंत्र विकसित करना है।यदि एएमसीए सफल होता है तो भारत अमेरिका, रूस और चीन जैसे चुनिंदा देशों की श्रेणी में शामिल हो जाएगा जो स्वयं पंचम पीढ़ी के युद्धक विमान विकसित करने की क्षमता रखते हैं।
देरी क्यों चिंता का विषय है?
यद्यपि एएमसीए परियोजना को राष्ट्रीय प्राथमिकता प्राप्त है, फिर भी प्रोटोटाइप निर्माण, इंजन विकास, हथियार एकीकरण तथा परीक्षण प्रक्रियाओं में समय लगना स्वाभाविक है। रक्षा विशेषज्ञों का अनुमान है कि इसका पूर्ण परिचालन अगले दशक के मध्य तक ही संभव हो सकेगा।यही वह समयांतराल है जो भारतीय वायुसेना के लिए चिंता का विषय बन गया है। जब तक एएमसीए तैयार होगा, तब तक चीन अपनी पंचम पीढ़ी की क्षमता को और अधिक सुदृढ़ कर चुका होगा।
क्या दोनों साथ-साथ चल सकते हैं?
रक्षा विश्लेषकों का एक बड़ा वर्ग मानता है कि भारत को "विदेशी या स्वदेशी" जैसी द्वंद्वात्मक सोच से बाहर निकलना होगा।उनके अनुसार सीमित संख्या में सुखोई-57 विमानों का अधिग्रहण भारत को तत्काल पंचम पीढ़ी की युद्धक क्षमता उपलब्ध करा सकता है। इससे भारतीय वायुसेना आधुनिक युद्ध के नए आयामों का अनुभव भी प्राप्त कर सकेगी।साथ ही एएमसीए परियोजना को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हुए उसके अनुसंधान, विकास और उत्पादन को मिशन मोड में आगे बढ़ाया जाना चाहिए। इससे भारत की दीर्घकालिक आत्मनिर्भरता भी सुरक्षित रहेगी।
सामरिक दृष्टि से क्या है सर्वोत्तम विकल्प?
यदि भारत केवल एएमसीए की प्रतीक्षा करता है तो अगले कुछ वर्षों तक क्षमता अंतर बना रह सकता है। दूसरी ओर यदि वह केवल विदेशी विमानों पर निर्भर हो जाता है तो आत्मनिर्भरता का राष्ट्रीय लक्ष्य प्रभावित होगा।ऐसी स्थिति में विशेषज्ञों का मानना है कि सीमित संख्या में सुखोई-57 विमानों की प्राप्ति तथा एएमसीए के तीव्र विकास की दोहरी रणनीति भारत के लिए सबसे उपयुक्त विकल्प सिद्ध हो सकती है। इससे वर्तमान की सामरिक आवश्यकता और भविष्य की तकनीकी स्वतंत्रता दोनों का संतुलन बना रहेगा।
भारत के सामने वास्तविक प्रश्न सुखोई-57 और एएमसीए में से किसी एक को चुनने का नहीं है। चुनौती यह है कि आने वाले दस वर्षों में राष्ट्रीय सुरक्षा की आवश्यकताओं और दीर्घकालिक आत्मनिर्भरता के लक्ष्य के बीच संतुलन कैसे स्थापित किया जाए।सुखोई-57 भारत के लिए एक अंतरिम सामरिक सेतु बन सकता है, जबकि उन्नत मध्यम लड़ाकू विमान ही भविष्य में भारतीय वायुसेना की वास्तविक शक्ति और आत्मनिर्भर भारत के स्वप्न का आधार बनेगा। आने वाले वर्षों में लिया गया निर्णय न केवल भारतीय वायुसेना बल्कि देश की सामरिक दिशा को भी प्रभावित करेगा।