7 मई 2025 की रात, जब भारतीय वायुसेना बहावलपुर और मुरीदके में आतंकी ढाँचों पर पर प्रहार कर रही थी, उसी समय कॉकपिट से दूर भी कुछ चल रहा था। अमृतसर में विद्यार्थी रक्तदान शिविरों के बाहर कतारों में खड़े थे। मुम्बई में फैक्ट्री मालिक पंजाब और जम्मू से आए मज़दूरों के परिवारों की कुशलक्षेम पूछ रहे थे। हज़ारों जगहों पर, देश आने वाली परिस्थिति के लिए तैयार हो रहा था।
ऑपरेशन सिंदूर का यह पहलू किसी रणनीतिक विश्लेषण में दर्ज नहीं होता। इसे ध्वस्त हवाई अड्डों या मारे गए आतंकियों की संख्या में नहीं नापा जा सकता। पर एक तरह से यही पूरे संकट का सबसे उल्लेखनीय अंश था। भारत का नागरिक समाज अपनी सेना के साथ गति में चला, आदेश से नहीं बल्कि सहज तालमेल से। यह वह बात है जो भारत जैसे विशाल देशों में बहुत कम देखने को मिलती है।
सीमावर्ती गाँवों ने धैर्य रखा
युद्धकाल में किसी राष्ट्र के सामाजिक ताने-बाने की पहली परीक्षा सीमावर्ती गाँवों में होती है। ये वही परिवार हैं जिनके बच्चे गोलाबारी की आवाज़ें सुनते हुए सोते हैं। ऑपरेशन सिंदूर के जवाब में पाकिस्तान ने जम्मू के शम्भू मंदिर, पुंछ के गुरुद्वारे और सीमावर्ती ईसाई कन्वेंटों को सीधे निशाना बनाया। उसका लक्ष्य ठीक इन्हीं समुदायों को तोड़ना था।
पर वह योजना कामयाब नहीं हुई। उरी, बोनियार, टंगधार और गुरेज़ के गाँव बिखरे नहीं। परिवार सुरक्षित कस्बों में गए, पर साथ गए, हिन्दू, मुस्लिम और सिख एक-दूसरे की मदद करते हुए। तरनतारन में स्थानीय गुरुद्वारे ने धर्म से ऊपर उठकर विस्थापित परिवारों के लिए द्वार खोले। जम्मू के प्रभावित क्षेत्रों में मन्दिरों और मस्जिदों ने मिलकर भोजन वितरण किया। पाकिस्तान को जिस सांप्रदायिक तनाव की आशा थी, उसका ठीक उल्टा हुआ। उन भयभीत घड़ियों में जिन लोगों के पास एक-दूसरे पर शक करने के सब कारण थे, उन्होंने एक-दूसरे को खाना खिलाना चुना।
उरी और पुंछ के लोगों ने अपनी बात कहने के लिए न माइक उठाया, न मंच ढूँढा। उन्होंने अपना उत्तर सिर्फ इस तरह दिया कि उन कठिन दिनों में एक-दूसरे का हाथ थामे रहे।
उन भयभीत घड़ियों में जिन लोगों के पास एक-दूसरे पर शक करने के सब कारण थे, उन्होंने एक-दूसरे को खाना खिलाना चुना।
मूक स्वयंसेवक
सीमा से दूर एक अलग तरह की लामबंदी चल रही थी। आधिकारिक आँकड़ों के अनुसार, 2,406 एनसीसी कैडेटों ने, जिनमें 898 लड़कियाँ शामिल थीं, ऑपरेशन सिंदूर से जुड़ी नागरिक सुरक्षा गतिविधियों में भाग लिया। उन्होंने संघर्ष क्षेत्र से दूर के शहरों में रक्त शिविर लगाए, घायल सैनिकों के स्वागत वाले हवाई अड्डों पर रसद व्यवस्था में सहायता की और सरकारी सूचनाओं का स्थानीय भाषाओं में अनुवाद किया। यह काम चकाचौंध भरा नहीं था। पर यह सब आवश्यक था।
भारतीय रेड क्रॉस ने, अपनी 1,100 से अधिक शाखाओं के साथ, घंटों के भीतर अपने रक्तदान अभियान को कई गुना बढ़ा दिया। पश्चिमी सीमा के अस्पतालों को रक्त की निरंतर आपूर्ति इसलिए होती रही क्योंकि तमिलनाडु, केरल, पश्चिम बंगाल और पूर्वोत्तर के स्वयंसेवकों ने उन सैनिकों के लिए रक्त दिया जिनसे वे कभी मिलने वाले नहीं थे। एक नागरिक समाज ऐसा ही दिखता है जब वह सच में काम करता है।
पूरे देश के ज़िलों में 1971 के बाद के सबसे बड़े नागरिक सुरक्षा अभ्यास हुए। स्कूल और कॉलेज इनमें सम्मिलित हुए। निवासी कल्याण समितियों ने निकासी मार्गों के नक्शे तैयार किए। चंडीगढ़ में प्रशासन ने 419 प्रशिक्षित नागरिक सुरक्षा स्वयंसेवकों के पहले बैच का नामांकन शुरू किया। देश चुपचाप, क्रमबद्ध तरीके से, स्वयं को बचाना सीख रहा था।
व्यापारी जब सिपाही बने
भारतीय उद्योग की प्रतिक्रिया अपने आप में एक लामबंदी थी। 9 मई को भारतीय उद्योग परिसंघ ने सरकार और सशस्त्र बलों को अपना पूर्ण समर्थन दिया। 9 करोड़ व्यापारियों का प्रतिनिधित्व करने वाले अखिल भारतीय व्यापारी परिसंघ ने और भी विशिष्ट प्रतिबद्धता जताई। महासचिव प्रवीण खंडेलवाल ने कहा कि जिस तरह हमारे वीर सैनिक सीमाओं की रक्षा कर रहे हैं, उसी तरह देश के व्यापारी आर्थिक मोर्चे पर सिपाही बनकर खड़े होंगे, ताकि देश की आपूर्ति शृंखला किसी भी परिस्थिति में बाधित न हो।
यह कोई हल्की प्रतिज्ञा नहीं थी। भारत की ईंधन, खाद्य और दवाओं की आपूर्ति शृंखलाएँ मुख्यतः व्यापारियों और छोटे कारोबारियों द्वारा चलती हैं। 36 भारतीय स्थानों पर ड्रोन हमलों के बीच भी जब बाधा नहीं आई, तो यह भारतीय व्यापार के अनुशासन का प्रमाण था। पेट्रोल पम्प खुले रहे। दवा की दुकानों में दवाइयाँ मिलती रहीं। राशन की दुकानों ने वितरण जारी रखा। लोगों ने इसे होने दिया।
बड़े कॉर्पोरेट घरानों ने भी अपने तरीके से योगदान दिया। कई निजी अस्पतालों ने घायल सैनिकों और उनके परिवारों को मुफ्त इलाज दिया। टेलीकॉम कंपनियों ने प्रभावित क्षेत्रों में नेटवर्क चालू रखा। बेंगलुरु, हैदराबाद और पुणे की आईटी कंपनियों ने उन कर्मचारियों के लिए सहायता केंद्र खोले जिनके परिवार संघर्ष क्षेत्र में थे। शायद पहली बार इस पैमाने पर कॉर्पोरेट जगत ने यह स्वीकार किया कि देश की सुरक्षा में उसकी भागीदारी केवल कर भुगतान तक सीमित नहीं है।
प्रवासी और डिजिटल नागरिक
ऑपरेशन सिंदूर के दौरान एक नए प्रकार का नागरिक उभरा, डिजिटल नागरिक। हमलों के पहले घंटों में पाकिस्तान का दुष्प्रचार सोशल मीडिया पर बाढ़ की तरह उमड़ा। पर इस बाढ़ के सामने आम भारतीय खड़े थे। फैक्ट चेकर थे, पत्रकार थे, सेवानिवृत्त सैन्य अधिकारी थे, और ऐसे नागरिक भी जिनकी कोई भूमिका नहीं थी। सबने मिलकर झूठ को उसी पल काटना शुरू कर दिया जिस पल वह जन्म ले रहा था। तस्वीरों की पड़ताल हुई, पुराने वीडियो पकड़े गए, नकली खाते उजागर हुए। पीआईबी की फैक्ट चेक यूनिट इस प्रयास का सरकारी चेहरा थी। उसके पीछे की अनौपचारिक सेना विशाल थी और मुख्यतः स्वयंसेवी।
प्रवासी भारतीय, खाड़ी देशों, ब्रिटेन, अमेरिका और कनाडा में, समानांतर रूप से सक्रिय हुए। भारतीय मूल के पेशेवरों ने पश्चिमी मीडिया के लिए ब्रीफिंग की। प्रवासी व्यापार संघों ने भारत के आत्मरक्षा के अधिकार के समर्थन में बयान जारी किए। ह्यूस्टन, टोरंटो, दुबई और लंदन में, भारतीय समुदायों ने पहलगाम के पीड़ितों के लिए प्रार्थना सभाएँ कीं, ताकि सैन्य प्रतिक्रिया की हलचल में मूल हमले की मानवीय कीमत भुलाई न जाए।
बड़ी तस्वीर
ऑपरेशन सिंदूर को सैन्य परिशुद्धता और राजनीतिक संकल्प की कहानी कहना सरल लगता है। ये दोनों उपस्थित थे। पर इनमें से कोई भी मई 2025 के उन पाँच दिनों की पूरी कथा नहीं कहता। पूरी कथा यह है कि भारत के नागरिक समाज ने, अपनी विविधता में, उस क्षण एक होकर खड़ा होना तय किया जब एक देह की आवश्यकता थी। सीमावर्ती गाँवों ने धैर्य रखा। स्वयंसेवक संगठित हुए। उद्योग चलते रहे। प्रवासी समुदाय खड़ा हुआ। फैक्ट चेकरों ने झूठ काटा। अस्पताल खुले रहे।
इसमें से कुछ भी ऊपर से संचालित नहीं था। जो था वह यह था कि एक समाज जिसने दशकों से सामूहिक प्रतिक्रिया की पेशीय स्मृति बनाई है, बाढ़ों, भूकम्पों, महामारी की तालाबन्दियों से होते हुए, और अब अपनी सीमाओं पर एक संघर्ष में। वह पेशीय स्मृति भारत की सबसे कम आँकी गई रणनीतिक सम्पदा है। इसे बजट से नहीं ख़रीदा जा सकता।
कोई सेना ऐसा युद्ध नहीं जीत सकती जिसका समर्थन उसका समाज न करे। भारत की सेना ने सैन्य भिड़ंत जीती। पर भारत के नागरिक समाज ने वह गहरा संग्राम जीता, वह सवाल कि क्या यह देश उस दबाव में एक बना रह सकता है जो उसे तोड़ने के लिए जानबूझकर रचा गया था। वह विजय शान्ति से जीती गई, घरों में, गाँवों में, दफ्तरों में, उन लोगों ने जिनका नाम किसी आधिकारिक विवरण में कभी नहीं आएगा। वे ही कारण हैं कि ऑपरेशन सिंदूर एक राष्ट्रीय अभियान बना।

(मयंक चंद्र सामाजिक विकास क्षेत्र में कार्यरत हैं वे ग्रामीण विकास, महिला सशक्तिकरण और बड़े पैमाने पर सामाजिक पहलों के संचालन में विशेषज्ञता रखते हैं।)