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जल साक्षरता और संरक्षण

जल साक्षरता : पानी बचाने का समय कल नहीं, आज है बारिश की हर बूंद बने भविष्य की पूंजी

अमृत को बहने न दें; 'कैच द रेन' को बनाएं संकल्प। भारत जल संकट का सामना कर रहा है, जिसे हल करने के लिए बारिश के पानी का संचयन और जल साक्षरता में सुधार जरूरी है।


जल साक्षरता  पानी बचाने का समय कल नहीं आज है बारिश की हर बूंद बने भविष्य की पूंजी 

प्रवीण कक्कड़
पहली बारिश की सोंधी खुशबू हर मन को आनंद से भर देती है। भारत में मानसून केवल एक मौसम नहीं, बल्कि जीवन का उत्सव है। लेकिन इस उत्सव के पीछे एक ऐसा कड़वा सच छिपा है, जिसे हम हर साल नजरअंदाज कर देते हैं। जिस अमृत रूपी जल का हम महीनों इंतजार करते हैं, उसका बड़ा हिस्सा कुछ ही घंटों में नालियों के रास्ते बहकर व्यर्थ चला जाता है। फिर कुछ ही महीनों बाद हम पानी के लिए चिंतित दिखाई देते हैं। सवाल बारिश कम होने का नहीं, बल्कि बारिश के पानी को सहेजने की हमारी सोच और व्यवस्था का है।
भारत आज गंभीर जल संकट की चुनौती का सामना कर रहा है। नीति आयोग की ‘कंपोजिट वाटर मैनेजमेंट इंडेक्स’ रिपोर्ट के अनुसार देश की लगभग 60 करोड़ आबादी जल संकट से प्रभावित है। विश्व बैंक की एक रिपोर्ट चेतावनी देती है कि यदि वर्तमान गति से भूजल का दोहन जारी रहा, तो अगले दो दशकों में देश के 60 प्रतिशत ब्लॉक ‘क्रिटिकल’ श्रेणी में पहुंच सकते हैं। इसका अर्थ है कि पीने के पानी का संकट और गहरा होगा।

स्थिति की गंभीरता को नासा के GRACE सैटेलाइट अध्ययन भी रेखांकित करते हैं। इस अध्ययन के अनुसार भारत का उत्तर-पश्चिम और मध्य क्षेत्र, जिसमें मालवा अंचल भी शामिल है, दुनिया के उन क्षेत्रों में है जहां भूजल स्तर सबसे तेजी से गिर रहा है। वहीं केंद्रीय भूजल बोर्ड की ‘डायनेमिक ग्राउंड वाटर रिसोर्सेज’ रिपोर्ट बताती है कि देश के लगभग 14 प्रतिशत आकलित ब्लॉक ‘ओवर-एक्सप्लॉइटेड’ हो चुके हैं, अर्थात जितना पानी जमीन में पहुंचता है, उससे कहीं अधिक निकाला जा रहा है।
मध्यप्रदेश भी इस चुनौती से अछूता नहीं है। मालवा और निमाड़ क्षेत्र में गर्मियों के दौरान भूजल स्तर लगातार नीचे जा रहा है। देश के सबसे स्वच्छ शहर इंदौर में भी जल उपलब्धता भविष्य की बड़ी चिंता बनती दिखाई दे रही है। बढ़ती आबादी, कंक्रीट के फैलते जंगल, सिकुड़ते तालाब और वर्षा जल का सीधे नालों में बह जाना इस संकट को और गंभीर बना रहा है।
विडंबना यह है कि जिस समस्या का समाधान हर साल आसमान से बरसता है, उसे हम स्वयं बहा देते हैं। वर्षा जल संचयन कोई जटिल या महंगी तकनीक नहीं, बल्कि जल सुरक्षा का सबसे सरल और प्रभावी उपाय है। विशेषज्ञों के अनुसार 1000 वर्गफीट की एक सामान्य छत पर होने वाली वर्षा से सालभर में लगभग 60 से 70 हजार लीटर पानी संरक्षित या भूजल में पुनर्भारित किया जा सकता है। यह एक औसत परिवार की कई महीनों की जरूरत पूरी करने के लिए पर्याप्त है।
जल साक्षरता के 10 अचूक मंत्र
-    घर में बोरवेल हो तो छत के पानी को फिल्टर कर सीधे उसमें रिचार्ज करें।
-    बोरवेल न हो तो सोकपिट या रिचार्ज पिट बनाकर पानी जमीन में उतारें।
-    वर्षा जल को टंकी में संग्रहित कर बागवानी, सफाई और अन्य कार्यों में उपयोग करें।
-    पुराने कुएं, बावड़ियों और जल संरचनाओं को पुनर्जीवित करें।
-    स्कूल और कॉलेज अपने परिसरों में रेन वॉटर हार्वेस्टिंग को अनिवार्य बनाएं।
-    उद्योग, अस्पताल और बड़े व्यावसायिक भवन अपनी छतों का उपयोग जल संचयन के लिए करें।
-    आवासीय कॉलोनियां सामुदायिक रिचार्ज सिस्टम विकसित करें।
-    तालाबों, स्टॉप डैम और जलाशयों की नियमित सफाई और संरक्षण करें।
-    घर और परिसर का कुछ हिस्सा खुला रखें ताकि पानी सीधे जमीन में समा सके।
-    ‘कैच द रेन’ को व्यक्तिगत और पारिवारिक संकल्प बनाएं।

केवल बैंक बैलेंस नहीं, जल बैलेंस भी जरूरी
हम अपने बच्चों के लिए मकान, जमीन, गाड़ियां और बैंक बैलेंस छोड़ने की चिंता करते हैं लेकिन यदि उनके हिस्से में पर्याप्त और स्वच्छ पानी नहीं होगा, तो बाकी सारी संपत्ति का महत्व कम हो जाएगा। आने वाली पीढ़ी को केवल शिक्षित नहीं, बल्कि जल-साक्षर बनाना होगा। उन्हें यह समझाना होगा कि पानी सुविधा नहीं, जीवन का आधार है और उसका संरक्षण हमारी साझा जिम्मेदारी है। जल संकट का समाधान केवल सरकारों या प्रशासन के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। जिस तरह स्वच्छता जनभागीदारी से जन आंदोलन बनी, उसी तरह जल संरक्षण को भी जन अभियान बनाना होगा। हर घर, हर संस्था और हर नागरिक को इसमें अपनी भूमिका निभानी होगी।

समय आ गया है संकल्प लेने का
मानसून हमारे दरवाजे पर दस्तक दे चुका है। बादल फिर हमारी छतों पर अमृत बरसाने को तैयार हैं। अब फैसला हमारे हाथ में है क्या हम इस अनमोल धरोहर को यूं ही बह जाने देंगे या इसे सहेजकर अपने भविष्य को सुरक्षित करेंगे? याद रखिए, पानी की हर बूंद केवल आज की जरूरत नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों की पूंजी है। इस मानसून एक संकल्प लें—बारिश की एक भी बूंद व्यर्थ नहीं जाने देंगे। क्योंकि भविष्य उन्हीं का सुरक्षित होगा, जो आज पानी बचाने का निर्णय लेंगे।

प्रवीण कक्कड़

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