भारत अपनी उदारता के बावजूद, अवैध प्रवास के खतरों को समझते हुए 'डिटेक्ट, डिलीट, डिपोर्ट' नीति को अपना रहा है, जो राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज से अपरिहार्य है।
आचार्य ललित मुनि
भारत एक ऐसा देश है जो अपनी उदार परंपराओं के लिए जाना जाता है। यहाँ सदियों से शरणार्थियों, यात्रियों और प्रवासियों को आश्रय मिला है। लेकिन इस उदारता की भी एक सीमा होती है, और वह सीमा तब टूटती है जब राष्ट्रीय सुरक्षा, सामाजिक संसाधन और सांस्कृतिक अखंडता खतरे में पड़ने लगती है। आज भारत उस मोड़ पर खड़ा है जहाँ अवैध घुसपैठ की समस्या केवल एक प्रशासनिक चुनौती ही नहीं रही, बल्कि यह एक राष्ट्रीय संकट का रूप ले चुकी है। इसी संदर्भ में 'डिटेक्ट, डिलीट, डिपोर्ट' की नीति न केवल प्रासंगिक है, बल्कि अपरिहार्य भी है।
भारत में अवैध घुसपैठ कोई नई घटना नहीं है। इसकी जड़ें विभाजन के बाद की उथलपुथल से शुरू होती हैं। 1947 में जब देश का विभाजन हुआ, तब बड़े पैमाने पर जनसंख्या का स्थानांतरण हुआ। परंतु वह प्रक्रिया पूरी तरह कभी नहीं थमी। पूर्वी पाकिस्तान, जो बाद में बांग्लादेश बना, वहाँ से लोगों का भारत में आना दशकों तक जारी रहा।
1971 में बांग्लादेश मुक्ति युद्ध के दौरान लाखों शरणार्थी भारत आए। उस समय यह मानवीय संकट था और भारत ने खुले दिल से उन्हें शरण दी। परंतु युद्ध समाप्त होने के बाद भी अनेक लोग भारत में ही रह गए और धीरे धीरे वे असम, पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा और दिल्ली जैसे क्षेत्रों में बस गए।
असम इस संकट का सबसे स्पष्ट उदाहरण है। 1979 में असम में छात्र आंदोलन शुरू हुआ जो बांग्लादेशी घुसपैठियों के विरुद्ध था। छह वर्षों तक चले इस आंदोलन के परिणामस्वरूप 1985 में असम समझौता हुआ। इसके तहत यह तय किया गया कि 1971 के बाद से असम में आए विदेशी नागरिकों की पहचान कर उन्हें वापस भेजा जाएगा। परंतु यह प्रक्रिया अत्यंत धीमी रही और घुसपैठ नहीं रुकी।
आज स्थिति और भी गंभीर है। भारत और बांग्लादेश के बीच लगभग 4,156 किलोमीटर लंबी सीमा है। इसमें से बड़ा हिस्सा नदियों, जंगलों और पहाड़ी क्षेत्रों से घिरा है जहाँ चौबीसों घंटे निगरानी अत्यंत कठिन है। बाड़ लगाने का काम दशकों से चल रहा है, परंतु अभी भी सैकड़ों किलोमीटर की सीमा असुरक्षित है।
सरकारी आंकड़ों और स्वतंत्र अनुसंधानकर्ताओं के अनुमानों के अनुसार भारत में अवैध प्रवासियों की संख्या एक से दो करोड़ के बीच हो सकती है। इनमें से अधिकांश बांग्लादेश से आए हैं, परंतु रोहिंग्या मुसलमान भी इस संख्या में शामिल हैं जो म्यांमार से भागकर बांग्लादेश होते हुए भारत पहुँचे हैं।
रोहिंग्या की स्थिति विशेष रूप से चिंताजनक है। 2017 में म्यांमार में हुई हिंसा के बाद लाखों रोहिंग्या बांग्लादेश पहुँचे। उनमें से एक बड़ा हिस्सा भारत में भी घुस आया। जम्मू, दिल्ली, हैदराबाद और कई अन्य शहरों में रोहिंग्या बस्तियाँ पाई गई हैं। राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (NIA) और खुफिया एजेंसियों ने चेतावनी दी है कि कुछ रोहिंग्या नागरिकों के आतंकी संगठनों से संबंध हैं और उन्हें फर्जी भारतीय दस्तावेज प्रदान किए जा रहे हैं।
राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए अवैध घुसपैठ बड़ा खतरा है। इंटेलिजेंस ब्यूरो और NIA की रिपोर्टों में यह बार बार उजागर हुआ है कि आतंकवादी संगठन अवैध प्रवासियों के नेटवर्क का उपयोग करते हैं। जम्मू में पाए गए रोहिंग्या कैंपों की जाँच में हथियार और संदिग्ध सामग्री मिली थी। 2018 में जम्मू पुलिस ने कई रोहिंग्याओं को गिरफ्तार किया था जिनके पास फर्जी आधार कार्ड और मतदाता पहचान पत्र थे। अवैध घुसपैठ के रास्तों का उपयोग मादक पदार्थों, हथियारों और जाली मुद्रा की तस्करी के लिए भी होता है। पश्चिम बंगाल और असम की सीमाओं पर यह समस्या अत्यंत गंभीर है। बांग्लादेश से फेन्सीडाइल और याबा जैसी नशीली दवाएँ इन्हीं मार्गों से आती हैं।
अवैध प्रवासी आधार कार्ड, मतदाता पहचान पत्र, राशन कार्ड और पासपोर्ट जैसे दस्तावेज फर्जी तरीके से हासिल कर लेते हैं। यह एक बड़े नेटवर्क के जरिए होता है। चुनाव आयोग की जाँचों में कई बार ऐसे मतदाता पहचान पत्र मिले हैं जो वास्तव में विदेशी नागरिकों के हैं। इससे लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर भी सीधा आघात होता है। असम के कुछ जिलों में पिछले तीन दशकों में जनसंख्या का संतुलन नाटकीय रूप से बदल गया है। 1971 की जनगणना से 2011 की जनगणना तक, कई सीमावर्ती जिलों में मुस्लिम आबादी का प्रतिशत असामान्य गति से बढ़ा, जो घुसपैठ की वास्तविकता को दर्शाता है।
सुरक्षा के अतिरिक्त अवैध घुसपैठ भारत की सामाजिक और आर्थिक संरचना पर भी भारी बोझ डालती है। भारत के सरकारी अस्पतालों, स्कूलों, राशन व्यवस्था और आवास योजनाओं पर पहले से ही भारी दबाव है। करोड़ों गरीब भारतीय नागरिक बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहे हैं। ऐसे में जब अवैध प्रवासी फर्जी दस्तावेजों के आधार पर इन सुविधाओं का लाभ उठाते हैं, तो वे वास्तविक लाभार्थियों का हक छीनते हैं।
दिल्ली के कुछ इलाकों जैसे संगम विहार, मदनपुर खादर और तुर्कमान गेट के पास बड़ी संख्या में अवैध प्रवासी बसे हैं। वे अनौपचारिक क्षेत्र में काम करते हैं और बेहद कम मजदूरी पर काम लेते हैं। इससे स्थानीय मजदूरों के लिए रोजगार और मजदूरी दोनों पर दबाव बढ़ता है। शहरी अनधिकृत बस्तियों में इनकी उपस्थिति अपराध और कानून व्यवस्था की समस्याओं को भी बढ़ावा देती है। पुलिस रिकॉर्ड दिखाते हैं कि कुछ इलाकों में अवैध प्रवासियों की सांद्रता और स्थानीय अपराध दर के बीच सीधा संबंध है।
अवैध घुसपैठ को लेकर जब हम 'डिटेक्ट, डिलीट, डिपोर्ट' की नीति की बात करते हैं, तो यह कोई कठोर या मानवविरोधी नीति नहीं है। यह एक संप्रभु राष्ट्र का वह अधिकार है जिसे दुनिया का हर देश किसी न किसी रूप में लागू करता है।
डिटेक्ट अर्थात पहचान: सबसे पहली आवश्यकता यह है कि अवैध प्रवासियों की सटीक और निष्पक्ष पहचान हो। इसके लिए राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर, NRC जैसे उपकरणों का उपयोग जरूरी है। आधुनिक तकनीक जैसे बायोमेट्रिक डेटा, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित सीमा निगरानी और फेशियल रिकग्निशन इस काम में बड़ी भूमिका निभा सकते हैं। सीमा सुरक्षा बल (BSF) को और अधिक संसाधन और तकनीक से लैस करना इस चरण की अनिवार्यता है।
डिलीट अर्थात रिकॉर्ड से हटाना: एक बार पहचान होने के बाद अवैध प्रवासियों के नाम सरकारी दस्तावेजों, मतदाता सूचियों, राशन कार्डों और अन्य सरकारी योजनाओं से हटाए जाने चाहिए। यह सुनिश्चित करना होगा कि वे फर्जी दस्तावेजों के आधार पर नागरिकता के किसी भी लाभ का उपयोग न कर सकें। इसके साथ ही जो लोग फर्जी दस्तावेज बनाते और बेचते हैं, उनके विरुद्ध कड़ी कानूनी कार्रवाई भी आवश्यक है।
डिपोर्ट अर्थात वापसी: कानूनी प्रक्रिया के माध्यम से अवैध प्रवासियों को उनके मूल देश वापस भेजना किसी भी संप्रभु राष्ट्र का संवैधानिक अधिकार और कर्तव्य है। भारत और बांग्लादेश के बीच इस विषय पर समझौते की आवश्यकता है। हालाँकि यह प्रक्रिया कूटनीतिक दृष्टि से जटिल है, परंतु यह असंभव नहीं है। सर्वोच्च न्यायालय ने भी कई बार अवैध प्रवासियों को वापस भेजने के आदेश दिए हैं।
यह नीति कोई भारतीय मौलिक नीति नहीं है। दुनिया के सबसे उदार और लोकतांत्रिक देश भी अवैध प्रवासन के विरुद्ध कठोर कदम उठाते हैं। अमेरिका में ICE (इमिग्रेशन एंड कस्टम्स एनफोर्समेंट) एजेंसी प्रतिवर्ष लाखों अवैध प्रवासियों को पकड़कर उनके देश भेजती है। यूरोपीय देशों ने 2015 के शरणार्थी संकट के बाद अपनी सीमा नीतियों को अत्यंत कड़ा किया।
ऑस्ट्रेलिया का बॉर्डर प्रोटेक्शन तंत्र तो विश्व के सबसे सख्त तंत्रों में गिना जाता है। जापान, दक्षिण कोरिया, सिंगापुर और मलेशिया जैसे एशियाई देश अवैध प्रवासन के मामले में बिल्कुल समझौता नहीं करते। फिर भारत से यह अपेक्षा क्यों कि वह अपनी सीमाओं और संसाधनों पर अनियंत्रित बोझ झेलता रहे? पिछले वर्ष भारतीय अवैध घुसपैठियों को अमेरिका ने भारत कैसे भेजा था ये तो सभी ने देखा है।
भारत एक सहिष्णु और बहुलतावादी देश है। हम अतिथि देवो भव की परंपरा में विश्वास रखते हैं। परंतु किसी भी देश की सहिष्णुता की सीमा वहाँ समाप्त होती है जहाँ उसकी संप्रभुता, उसके नागरिकों की सुरक्षा और उसके लोकतांत्रिक ढाँचे पर खतरा आने लगे। 'डिटेक्ट, डिलीट, डिपोर्ट' कोई नफरत की नीति नहीं है। यह एक संप्रभु राष्ट्र का वह कर्तव्य है जो उसे अपने 140 करोड़ नागरिकों के प्रति निभाना है। यह नीति उन नागरिकों की सुरक्षा के लिए है जो प्रतिदिन काम करते हैं, कर देते हैं और अपने देश के विकास में योगदान करते हैं।
लेखक आचार्य ललित मुनि, वरिष्ठ पत्रकार एवं लोक संस्कृति के अध्येता हैं।