आयात पर निर्भरता घटाने, स्वच्छ ऊर्जा और रसायन उद्योग को बढ़ावा देने की दिशा में बड़ा कदम
अनुराग तागड़े
नई दिल्ली। भारत अब केवल कोयला जलाने वाला देश नहीं, बल्कि कोयले को “भविष्य की स्वच्छ औद्योगिक ऊर्जा” में बदलने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है। केंद्र सरकार ने कोयला गैसीफिकेशन को राष्ट्रीय ऊर्जा रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाते हुए वर्ष 2030 तक 100 मिलियन टन कोयला गैसीफिकेशन क्षमता विकसित करने का लक्ष्य रखा है। इसके लिए ₹85,000 करोड़ से अधिक निवेश की संभावनाएं बन रही हैं।
सरकार का मानना है कि यह पहल भारत को तेल, मेथेनॉल, अमोनिया और गैस आयात पर निर्भरता कम करने में मदद करेगी, साथ ही “विकसित भारत 2047” के लक्ष्य को भी मजबूती देगी।
भारत वर्तमान में अपनी लगभग 83% तेल आवश्यकता आयात से पूरी करता है। देश की 90% से अधिक मेथेनॉल जरूरतें और लगभग 13% अमोनिया भी आयात पर निर्भर हैं। ऐसे में कोयला गैसीफिकेशन को ऊर्जा सुरक्षा, रासायनिक उद्योग और उर्वरक उत्पादन के लिए गेम-चेंजर माना जा रहा है।
क्या है कोयला गैसीफिकेशन?
कोयला गैसीफिकेशन एक थर्मो-केमिकल प्रक्रिया है, जिसमें कोयले को सीधे जलाने के बजाय नियंत्रित मात्रा में ऑक्सीजन और भाप के साथ उच्च तापमान पर प्रतिक्रिया कर “सिंगैस” बनाया जाता है। यह सिंगैस मुख्य रूप से कार्बन मोनोऑक्साइड और हाइड्रोजन का मिश्रण होता है, जिससे आगे चलकर कई महत्वपूर्ण उत्पाद बनाए जा सकते हैं, जैसे
- मेथेनॉल
- अमोनिया
- सिंथेटिक नेचुरल गैस (SNG)
- हाइड्रोजन
- डीजल और पेट्रोल जैसे तरल ईंधन
- उर्वरक
- बिजली
पारंपरिक कोयला आधारित बिजली संयंत्रों की तुलना में गैसीफिकेशन अधिक स्वच्छ और दक्ष तकनीक है। इसमें सल्फर और कार्बन डाइऑक्साइड जैसी गैसों को अलग करना आसान होता है, जिससे प्रदूषण कम होता है।
सरकार की बड़ी घोषणाएं
केंद्र सरकार ने जनवरी 2024 में कोयला गैसीफिकेशन परियोजनाओं को बढ़ावा देने के लिए ₹8,500 करोड़ की वित्तीय प्रोत्साहन योजना को मंजूरी दी। यह सहायता सरकारी कंपनियों और निजी क्षेत्र दोनों के लिए उपलब्ध होगी। इसके अलावा कोल इंडिया लिमिटेड को भारत हैवी इलेक्ट्रिकल लिमिटेड और गैस अथॉरिटी ऑफ़ इंडिया लिमिटेड के साथ संयुक्त उपक्रमों में निवेश की मंजूरी दी गई है।
“सिंगैस उत्पादन” को नीति के अंतर्गत नया उप-क्षेत्र घोषित किया गया है। गैसीफिकेशन उपयोग हेतु कोयले पर वाणिज्यिक कोल ब्लॉक नीलामी में 50% राजस्व छूट दी गई है। सात वर्षों में परियोजना शुरू करने वालों को नियंत्रित क्षेत्र की अधिसूचित कीमत पर कोयला उपलब्ध कराने की व्यवस्था की गई है।
भारत में तेजी से बढ़ रहे प्रोजेक्ट
अक्टूबर 2022 में कोल इंडिया लिमिटेड ने चार बड़े गैसीफिकेशन प्रोजेक्ट्स के लिए समझौते किए।
“लो-कार्बन केमिकल इकोनॉमी” का सपना
यदि भारत 100 मिलियन टन गैसीफिकेशन लक्ष्य हासिल कर लेता है, तो इससे ₹60,000–90,000 करोड़ प्रतिवर्ष की “लो-कार्बन केमिकल और फर्टिलाइजर इकोनॉमी” विकसित हो सकती है। चीन ने इसी मॉडल पर दुनिया की सबसे बड़ी गैसीफिकेशन अर्थव्यवस्था खड़ी की है।
चीन क्यों बना दुनिया का सबसे बड़ा गैसीफायर?
आज चीन हर वर्ष लगभग 340–350 मिलियन टन कोयले का गैसीफिकेशन करता है। इससे वह मेथेनॉल, अमोनिया,हाइड्रोजन,सिंथेटिक गैस,प्लास्टिक और पेट्रोकेमिकल उत्पाद बनाता है। विशेषज्ञों का कहना है कि भारत और चीन दोनों के पास कोयले के बड़े भंडार हैं, लेकिन तेल और प्राकृतिक गैस सीमित मात्रा में है। यही कारण है कि चीन ने गैसीफिकेशन को रणनीतिक औद्योगिक नीति का हिस्सा बनाया।
भारत के लिए चुनौती: भारतीय कोयले की गुणवत्ता
विशेषज्ञों के अनुसार भारत के कोयले में राख की मात्रा अधिक होती है, इसलिए विदेशी तकनीक सीधे भारत में सफल नहीं हो सकती “जो तकनीक अमेरिका या दक्षिण अफ्रीका के कोयले के लिए काम करती है, वह भारतीय कोयले पर जरूरी नहीं कि सफल हो। भारत को अपनी परिस्थितियों के अनुसार ड्राई-ऐश और फ्लूडाइज्ड-बेड गैसीफायर तकनीक विकसित करनी होगी।” 20 लाख टन प्रतिवर्ष क्षमता वाले गैसीफिकेशन प्लांट की लागत तकनीक के आधार पर ₹600 करोड़ से ₹2,000 करोड़ तक हो सकती है।
दुनिया के सफल उदाहरण
चीन - दुनिया का सबसे बड़ा गैसीफिकेशन नेटवर्क।
दक्षिण अफ्रीका - 1955 से गैसीफिकेशन आधारित ईंधन उत्पादन। दुनिया के सबसे बड़े गैसीफिकेशन कॉम्प्लेक्स में से एक आज भी सक्रिय।
अमेरिका - डकोटा गैसीफिकेशन कंपनी 1985 से संचालित। अमेरिकी ऊर्जा विभाग के अनुसार आधुनिक गैसीफिकेशन प्लांट 50% तक दक्षता हासिल कर सकते हैं, जबकि पारंपरिक कोयला बिजली संयंत्र लगभग 30% दक्षता पर काम करते हैं।
जापान - नाकोसो IGCC प्लांट ने 48% नेट थर्मल एफिशिएंसी हासिल की है और CO2 उत्सर्जन घटाने में सफलता पाई है।
इंडोनेशिया - $2.3 बिलियन की परियोजना के तहत कम गुणवत्ता वाले कोयले से डाइमिथाइल ईथर बनाकर LPG आयात कम करने की दिशा में काम।
एकीकृत गैसीफिकेशन संयुक्त चक्र प्रणाली : स्वच्छ बिजली का नया मॉडल
एकीकृत गैसीफिकेशन संयुक्त चक्र प्रणाली को भविष्य की स्वच्छ कोयला तकनीक माना जा रहा है। इसमें गैसीफाइड कोयले से बने सिंगैस को गैस टर्बाइन में जलाकर बिजली बनाई जाती है और निकली गर्म गैस से भाप बनाकर दूसरी टर्बाइन चलाई जाती है। इससे अधिक बिजली उत्पादन कम प्रदूषण CO2 कैप्चर में आसानी जैसे फायदे मिलते हैं।
हाइड्रोजन और उर्वरक सेक्टर को भी मिलेगा लाभ
कोयला गैसीफिकेशन से उत्पादित हाइड्रोजन भविष्य की ग्रीन एनर्जी अर्थव्यवस्था का आधार बन सकता है। वहीं अमोनिया उत्पादन बढ़ने से उर्वरक क्षेत्र में आयात निर्भरता घटेगी। विशेषज्ञों के अनुसार यदि भारत गैसीफिकेशन मिशन को सफलतापूर्वक लागू कर लेता है, तो यह केवल ऊर्जा क्षेत्र नहीं बल्कि रसायन, उर्वरक, परिवहन और विनिर्माण क्षेत्र की तस्वीर भी बदल सकता है।
विकसित भारत 2047 की दिशा में रणनीतिक कदम
ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि यदि भारत कोयले को केवल ईंधन नहीं बल्कि “रासायनिक और ऊर्जा फीडस्टॉक” के रूप में उपयोग करना शुरू कर देता है, तो देश की ऊर्जा अर्थव्यवस्था में बड़ा बदलाव संभव है। कोयला गैसीफिकेशन अब केवल एक तकनीक नहीं, बल्कि भारत की ऊर्जा आत्मनिर्भरता, औद्योगिक विकास और आयात प्रतिस्थापन की नई रणनीति बनता दिखाई दे रहा है।