Breaking News
  • Twisha Sharma Case: CBI ने पूर्व जज सास गिरिबाला सिंह को गिरफ्तार किया
  • BJP ने 4 राज्यों में नए प्रदेश अध्यक्ष नियुक्त किए। दिल्ली की कमान केंद्रीय मंत्री हर्ष मल्होत्रा को सौंपी
  • केरलम में ED टीम पर हमले के बाद आठ गिरफ्तार, पूर्व CM विजयन के आवास पर छापेमारी के बाद मचा था बवाल
  • छिंदवाड़ा में 4 किशोर डूबे, 2 के शव बरामद: बर्थडे मनाने गए 2 दोस्त तालाब में डूबे
  • राजस्थान-MP समेत 15 राज्यों में कल से गर्मी से राहत: अगले 3 दिन बारिश का अलर्ट
  • ISRO को बड़ी सफलता: चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव के नीचे बर्फ के मिले संकेत
  • मद्रास हाईकोर्ट की टिप्पणी 'न्यायपालिका में भ्रष्टाचार है, जज पवित्र गाय जैसे नहीं'

होम > टेक

ISRO को बड़ी सफलता, चांद पर बर्फ के संकेत

ISRO को बड़ी सफलता: चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव के नीचे बर्फ के मिले संकेत, चंद्रयान-2 के डेटा से खुला राज

चंद्रयान-2 के रडार डेटा से ISRO वैज्ञानिकों को चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव के नीचे पानी की बर्फ के मजबूत संकेत मिले हैं। यह खोज भविष्य के मानव मिशनों और अंतरिक्ष अनुसंधान के लिए बेहद अहम मानी जा रही है।


isro को बड़ी सफलता चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव के नीचे बर्फ के मिले संकेत चंद्रयान-2 के डेटा से खुला राज

भारत के चंद्र मिशन चंद्रयान-2 ने एक बार फिर दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। इसरो के वैज्ञानिकों को चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव के पास मौजूद कुछ गहरे क्रेटरों के नीचे पानी की बर्फ होने के मजबूत संकेत मिले हैं। यह जानकारी चंद्रयान-2 ऑर्बिटर से मिले रडार डेटा के विश्लेषण के बाद सामने आई है।

यह खोज इसलिए भी बेहद अहम मानी जा रही है क्योंकि भविष्य में चंद्रमा पर मानव मिशन और स्थायी बेस बनाने की योजनाओं में पानी सबसे बड़ा संसाधन माना जाता है। ऐसे में भारत की यह उपलब्धि अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में बड़ी कामयाबी के तौर पर देखी जा रही है।

आखिर वैज्ञानिकों को क्या मिला?

दरअसल, अहमदाबाद स्थित फिजिकल रिसर्च लेबोरेटरी (PRL) के वैज्ञानिकों ने चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर मौजूद उन क्षेत्रों का अध्ययन किया, जहां सूरज की रोशनी कभी नहीं पहुंचती। इन्हें “परमानेंटली शैडोड रीजन” कहा जाता है।

इन इलाकों में तापमान माइनस 248 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है। वैज्ञानिकों का मानना है कि इतनी ठंड में बर्फ लंबे समय तक सुरक्षित रह सकती है। चंद्रयान-2 के ऑर्बिटर में लगे ड्यूल फ्रीक्वेंसी सिंथेटिक अपर्चर रडार यानी DFSAR की मदद से इन क्षेत्रों की जांच की गई। यह खास रडार चंद्रमा की सतह के नीचे की परतों  तक का अध्ययन करने में सक्षम है।

किस क्रेटर में मिले सबसे मजबूत संकेत?

वैज्ञानिकों के मुताबिक, फॉस्टिनी क्रेटर के अंदर मौजूद करीब 1.1 किलोमीटर चौड़ा एक छोटा क्रेटर सबसे मजबूत दावेदार बनकर सामने आया है। यहां मिले संकेत सतह के नीचे बर्फ की मौजूदगी की ओर इशारा करते हैं।

अब समझिए, इस शोध में सिर्फ सामान्य रडार डेटा ही नहीं देखा गया। वैज्ञानिकों ने नई तकनीक का इस्तेमाल करते हुए यह पता लगाने की कोशिश की कि रडार संकेत चट्टानों से आ रहे हैं या बर्फ से। इसके लिए “सीपीआर” यानी Circular Polarization Ratio और “डीओपी” यानी Degree of Polarization जैसे पैरामीटर का इस्तेमाल किया गया। यही तकनीक इस खोज को और ज्यादा भरोसेमंद बनाती है।

चंद्रमा पर पानी मिलना इतना महत्वपूर्ण क्यों?

चंद्रमा पर पानी की मौजूदगी को भविष्य के अंतरिक्ष अभियानों की सबसे बड़ी जरूरत माना जाता है। वैज्ञानिकों का कहना है कि इस पानी का इस्तेमाल पीने, ऑक्सीजन तैयार करने और यहां तक कि रॉकेट ईंधन बनाने में भी किया जा सकता है।

यही वजह है कि दुनियाभर की स्पेस एजेंसियां पिछले कुछ वर्षों से चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर खास ध्यान दे रही हैं। भारत का चंद्रयान-3 मिशन भी 2023 में इसी इलाके के पास सफलतापूर्वक उतरा था। फिलहाल चंद्रयान-2 का ऑर्बिटर लगातार काम कर रहा है और महत्वपूर्ण वैज्ञानिक जानकारियां भेज रहा है। गौर करने वाली बात यह है कि 2019 में लैंडर की सॉफ्ट लैंडिंग भले पूरी तरह सफल नहीं हो पाई थी, लेकिन ऑर्बिटर आज भी भारत के लिए बड़ी वैज्ञानिक उपलब्धियां हासिल कर रहा है।

भारत के लिए क्यों खास है यह उपलब्धि?

इस खोज ने एक बार फिर साबित किया है कि भारत अंतरिक्ष अनुसंधान में तेजी से आगे बढ़ रहा है। चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर बर्फ के संकेत मिलने से आने वाले समय में भारत की भूमिका वैश्विक स्पेस मिशनों में और मजबूत हो सकती है। ऐसे में अब यह सवाल भी उठने लगा है कि क्या भविष्य में इंसान लंबे समय तक चंद्रमा पर रह पाएंगे? फिलहाल इस खोज ने वैज्ञानिकों की उम्मीदों को जरूर नई उड़ान दे दी है।

Related to this topic: