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अप्रत्याशित बिखराव और हार

हार से भी अधिक अप्रत्याशित है तृणमूल में बिखराव

तृणमूल कांग्रेस की चुनावी हार के बाद पार्टी में बिखराव और ममता बनर्जी की नेतृत्व शैली पर उठते सवालों का विश्लेषण।


हार से भी अधिक अप्रत्याशित है तृणमूल में बिखराव

राजकुमार सिंह

लोकतंत्र में जन समर्थन और आक्रोश, दोनों को व्यक्त करने का तरीका चुनाव प्रक्रिया ही है। यदि व्यवस्था बदलने का वादा कर सत्ता में आई तृणमूल कांग्रेस ने वाम मोर्चा के चुनाव जीतने के हथकंडों को अपनाकर स्वयं को स्थायी बनाना चाहा, तो मतदाताओं ने उसे शर्मनाक हार के रूप में दंड दिया है। यह खुला रहस्य है कि राजनेताओं के लिए सत्ता ही सब कुछ होती है सत्ता बिना सब सून!लगातार पंद्रह वर्ष शासन करने के बाद ममता बनर्जी की चुनावी पराजय से भी अधिक चौंकाने वाला तृणमूल कांग्रेस में बिखराव है। 2021 के विधानसभा चुनाव में 294 में से 215 और फिर 2024 के लोकसभा चुनाव में 42 में से 29 सीटें जीतने वाली तृणमूल इस बार विधानसभा में 80 सीटों पर सिमट जाएगी, ऐसा किसने सोचा था?

निस्संदेह, चुनावों में बड़े उलटफेर पहले भी देखे गए हैं। भारतीय राजनीति की 'लौह महिला' इंदिरा गांधी 1977 में प्रधानमंत्री रहते हुए लोकसभा चुनाव हार गई थीं और पहली बार कांग्रेस केंद्र की सत्ता से बेदखल हुई थी। 2009 में 206 सीटें जीतने वाली कांग्रेस 2014 के लोकसभा चुनाव में 44 सीटों पर सिमट गई थी। इसलिए कांग्रेस छोड़कर अपनी तृणमूल कांग्रेस बनाने वाली और 2011 में 34 वर्ष पुराने वाम मोर्चा शासन को उखाड़ फेंकने वाली ममता का सत्ता के साथ स्वयं भी चुनाव हार जाना कोई अनहोनी घटना नहीं है।

हाँ, बदलाव की ऐसी आंधी भाजपा के अलावा किसी अन्य दल को चुनाव प्रचार के दौरान दिखाई नहीं दी थी। दरअसल, हार से भी अधिक अप्रत्याशित है तृणमूल में विभाजन और जन आक्रोश। अभिषेक बनर्जी और कल्याण बनर्जी के साथ सड़क पर जिस तरह मारपीट की गई, उसकी कड़ी निंदा की जानी चाहिए। पश्चिम बंगाल में राजनीतिक हिंसा का लंबा इतिहास रहा है, लेकिन समझदारी ऐसे इतिहास से सही सबक सीखने में है, उसे दोहराने में नहीं।लोकतंत्र में जन समर्थन और आक्रोश व्यक्त करने का माध्यम चुनाव ही है। यदि व्यवस्था परिवर्तन का वादा कर सत्ता में आई तृणमूल कांग्रेस ने वाम मोर्चा के तौर-तरीकों को अपनाकर स्वयं को स्थायी बनाना चाहा, तो मतदाताओं ने उसे करारी हार देकर जवाब दिया। राजनेताओं के लिए सत्ता का महत्व किसी से छिपा नहीं है।

विधानसभा चुनाव में तृणमूल का कथित 'गुंडा राज' बड़ा मुद्दा था। यह समझना होगा कि मतदाताओं ने 'गुंडा राज' समाप्त करने के लिए जनादेश दिया है, केवल चेहरे बदलने के लिए नहीं। तृणमूल कांग्रेस नेताओं ने भ्रष्टाचार से लेकर हिंसा तक जो कुछ भी गलत किया, कानूनसम्मत प्रक्रिया के तहत उसकी कठोर सजा उन्हें मिलनी चाहिए। लेकिन कानून-व्यवस्था बनाए रखना शुवेंदु अधिकारी के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार की संवैधानिक जिम्मेदारी है, जिससे वह मुंह नहीं मोड़ सकती।चार मई को विधानसभा चुनाव परिणाम आने के साथ ही तृणमूल ने चुनाव आयोग पर धांधली के आरोप लगाने शुरू कर दिए थे और पार्टी में बड़ी टूट की आशंका भी जताई जाने लगी थी। चुनाव आयोग कोई 'पवित्र गाय' नहीं है, लेकिन राजनीतिक दलों द्वारा अपनी हर नाकामी का ठीकरा उसके सिर फोड़ना भी उचित नहीं है। चुनाव आयोग और विवादास्पद एसआईआर प्रक्रिया पर अंतिम निर्णय सर्वोच्च न्यायालय का ही होगा, पर इस तथ्य को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि ममता की तृणमूल को नकारकर मतदाताओं ने 'सोनार बांग्ला' बनाने की जिम्मेदारी भाजपा को सौंपी है, जिसके निर्वहन का दायित्व शुवेंदु अधिकारी को मिला है।

जाहिर है, भाजपा के 'वादे और इरादे' शुवेंदु सरकार के कामकाज की कसौटी पर ही परखे जाएंगे। लेकिन तृणमूल कांग्रेस में अप्रत्याशित बिखराव कई सवाल खड़े करता है, जिनसे कुछ महत्वपूर्ण सबक भी मिलते हैं। मसलन, राज्य-दर-राज्य यह रेखांकित हो रहा है कि क्षेत्रीय दल वस्तुतः परिवार विशेष की जागीर बनकर रह जाते हैं, जिनकी सफलता की कसौटी केवल सत्ता होती है। ये दल नेतृत्व के लिए परिवार से बाहर देखने की भी जहमत नहीं उठाते, इसलिए सत्ता जाते ही उनकी प्रासंगिकता पर प्रश्नचिह्न लगने लगते हैं।उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव की सबसे बड़ी योग्यता यही है कि वे दिवंगत मुलायम सिंह यादव के पुत्र हैं, जिन्होंने अपने जीवनकाल में ही उन्हें मुख्यमंत्री बना दिया था। राजनीतिक हमसफर भाई शिवपाल सिंह यादव देखते रह गए। बसपा सुप्रीमो मायावती भी राजनीतिक उत्तराधिकार के लिए भतीजे आकाश आनंद से आगे नहीं देख सकीं। यही कहानी ममता बनर्जी की भी है।

कई-कई बार इतने बड़े राज्यों पर शासन करने वाले दलों में परिवार से बाहर कोई योग्य उत्तराधिकारी नहीं मिला, इस पर विश्वास करना कठिन है। ऐसा तर्क स्वयं उस दल की विचारधारा और औचित्य पर प्रश्नचिह्न लगा देता है। मायावती ने आकाश को आगे बढ़ाया तो अनेक दिग्गजों को बाहर का रास्ता देखना पड़ा। वहीं ममता ने जब अभिषेक को आगे बढ़ाया, तो बगावत करने वाले शुवेंदु अंततः भाजपा में चले गए और सत्ता ही छीन ली।दरअसल, तृणमूल में बगावत के मूल में जो भी ज्ञात-अज्ञात कारण हों, यह स्पष्ट है कि नाराजगी ममता की अपेक्षा अभिषेक से अधिक है। क्या सब कुछ देखते हुए भी न समझना और मूकदर्शक बने रहना 'धृतराष्ट्र ग्रंथि' का ही परिचायक नहीं है?चुनाव प्रचार के दौरान अभिषेक बनर्जी की भाषा किसी राजनेता से अधिक एक क्षेत्रीय बाहुबली जैसी दिखाई दी। वे खुलेआम 'डायमंड हार्बर मॉडल' को तोड़ने की चुनौती देते नजर आए, लेकिन नतीजों ने बता दिया कि जब मतदाता ठान लेता है, तो कोई मॉडल टिक नहीं पाता।

आपातकाल के बाद हुए लोकसभा चुनाव और 34 वर्षों के वाम शासन के बाद पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के परिणाम यह पहले ही बता चुके थे, लेकिन सत्ता का मद अक्सर समझदारी छीन लेता है। 1998 में अलग तृणमूल कांग्रेस बनाने वाली ममता को वाम मोर्चा से सत्ता छीनने में लगभग 13 वर्ष लगे। वे लगातार 15 वर्ष मुख्यमंत्री रहीं। छात्र जीवन से राजनीति शुरू कर अपने दम पर इस मुकाम तक पहुंचने वाली इतनी अनुभवी ममता भी सत्ता के मद से नहीं बच सकीं।15 वर्षों की सत्ता विरोधी लहर और सर्वशक्तिमान भाजपा से मुकाबले के बीच 80 विधानसभा सीटों को सम्मानजनक भी मान लिया जाए, तो रितब्रत बनर्जी के नेतृत्व में 58 विधायकों की बगावत को क्या कहा जाए? अब 29 लोकसभा सांसदों में भी ऐसी ही बगावत की आशंका जताई जा रही है।

जाहिर है, हाल तक ममता के निष्ठावान रहे इन बागी नेताओं की आत्मा अचानक जाग जाने के लिए भाजपा पर उंगलियां उठाई जा रही हैं। महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली महा विकास अघाड़ी सरकार गिराकर वैकल्पिक सरकार बनाने में भाजपा ने जिस प्रकार एकनाथ शिंदे और अजीत पवार जैसे नेताओं का उपयोग किया, उसके मद्देनजर तृणमूल कांग्रेस में अप्रत्याशित बिखराव में उसकी भूमिका को पूरी तरह खारिज करना आसान नहीं है। लेकिन ऐसा माहौल तैयार होने के लिए जिम्मेदार तो स्वयं ममता ही हैं।वाम मोर्चा से सत्ता छीनने के लिए कभी कांग्रेस तो कभी भाजपा से चुनावी गठबंधन करने वाली ममता सत्ता में आने के बाद भी वोट बैंक की राजनीति से आगे अपनी कोई स्पष्ट वैचारिक प्रतिबद्धता स्थापित नहीं कर सकीं। सत्ता मिलने के बाद 'एकला चलो' का राग अलापने वाली तथा लोकसभा और विधानसभा चुनावों में 'इंडिया' गठबंधन के सहयोगियों के लिए सीटें न छोड़ने वाली ममता अब भाजपा के विरुद्ध संघर्ष के लिए सभी को साथ आने का आह्वान कर रही हैं।

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