भारतीय राजनीति में बढ़ती कटुता, आरोप-प्रत्यारोप और अमर्यादित भाषा पर विश्लेषण। लोकतंत्र में संवाद, सम्मान और जिम्मेदार विपक्ष-सत्ता पक्ष की भूमिका क्यों जरूरी है।
राजकुमार सिंह
एक-दूसरे के प्रति विश्वास और सम्मान भाव की जगह परस्पर कटुता की खाई लगातार चौड़ी होती जाना किसी के भी हित में नहीं है। अगर विपक्ष सरकार पर 'देश बेचने' का आरोप लगाए और सत्तापक्ष जवाब में उसे 'अर्बन नक्सल' बताते हुए 'देशद्रोही' का प्रमाणपत्र बांटने लगे, तो परस्पर संवाद की संभावनाएं लगातार क्षीण ही होती जाएंगी।
नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी द्वारा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को 'गद्दार' कहना हमारी राजनीति के भाषाई पतन की पराकाष्ठा है। अपने निर्वाचन क्षेत्र रायबरेली के दौरे के समय जब राहुल गांधी ने यह टिप्पणी की, तब प्रधानमंत्री पांच देशों की यात्रा पर थे। नेता प्रतिपक्ष ने प्रधानमंत्री पर देश की आर्थिक व्यवस्था को बेच देने का आरोप लगाते हुए चेतावनी दी कि आर्थिक तूफान आ रहा है, जिससे मोदी सरकार आपको नहीं बचा पाएगी।एक जनसभा में दिए गए राहुल गांधी के इस भाषण से साफ है कि वह पश्चिम एशिया में जारी टकराव के कारण स्टेट ऑफ हार्मुज बंद हो जाने से उत्पन्न वैश्विक ऊर्जा संकट की बात कर रहे हैं, जिसका असर भारत पर भी दिखने लगा है। जाहिर है, जब संकट वैश्विक है, तो उसके असर से भारत भी अछूता नहीं रह सकता। यह भी कि ऐसी संकटकालीन परिस्थितियों से निपटने की जिम्मेदारी हर देश की सरकार की होती है, जिसमें जन सहयोग भी जरूरी है।
बेशक संकट से निपटने के सरकारी उपायों और उनकी सफलता का विश्लेषण होना चाहिए और उन पर राजनीतिक टीका-टिप्पणी भी होनी चाहिए, लेकिन संकट की आहट के साथ ही सरकार पर नाकामी का ठप्पा लगाना राष्ट्र की चिंता कम और आपदा में राजनीतिक अवसर की तलाश अधिक लगता है।यह दीवार पर लिखी इबारत की तरह साफ है कि पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव में भाजपा की संभावनाएं प्रभावित हो सकने की चिंता में सरकार ने घरेलू मोर्चे पर तत्काल जरूरी सख्त कदम नहीं उठाए, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि उसने संकट से निपटने की तैयारियां नहीं कीं। जिस स्टेट ऑफ हार्मुज जलमार्ग से वैश्विक ऊर्जा जरूरतों का लगभग 20-22 प्रतिशत कच्चा तेल आयात होता हो, उसके अचानक बंद हो जाने पर रातोंरात वैकल्पिक व्यवस्था संभव नहीं है।फिर भी ईरान से संपर्क के अलावा ऊर्जा आपूर्ति के नए स्रोत तलाशने की हरसंभव कोशिश की गई है। हां, अमेरिकी अड़चनों के बावजूद उसमें मिली सफलता की समीक्षा की जानी चाहिए कि क्या और बेहतर किया जा सकता था, पर शायद वैसी सकारात्मक सोच किसी भी ओर दिखाई नहीं देती।
बेशक लगातार तीसरी बार नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में सरकार जनादेश से ही बनी है, लेकिन हमारे देश में राष्ट्रीय सुरक्षा और विदेश नीति पर राजनीतिक सहमति की परंपरा रही है, जो भाजपा और विपक्ष के बीच बढ़ती कटुता की भेंट चढ़ती गई है। पिछले 12 वर्षों में पहलगाम और ऑपरेशन सिंदूर ही अपवाद रहे, जब केंद्र सरकार ने सर्वदलीय बैठक बुलाकर सभी राजनीतिक दलों को विश्वास में लेने की पहल की। उसका सकारात्मक परिणाम भी निकला, हालांकि राजनीतिक कटुता के चलते वह ज्यादा दिन टिक नहीं सका और सत्तापक्ष तथा विपक्ष फिर एक-दूसरे को कठघरे में खड़ा करने में लग गए।बहुदलीय संसदीय लोकतंत्र में राजनीतिक हितों और एजेंडे का टकराव स्वाभाविक है। इसलिए असहमति को लोकतंत्र का अनिवार्य तत्व माना गया है, लेकिन वैचारिक 'मतभेद' का 'मनभेद' में बदल जाना और राजनीति का अमर्यादित हो जाना न तो लोकतंत्र के हित में है और न ही राष्ट्रहित में।
अगर सत्तापक्ष और विपक्ष एक-दूसरे को 'देशद्रोही' या 'गद्दार' कहने लगें, तो मानना चाहिए कि हम गंभीर राजनीतिक संकट के मुहाने पर पहुंच गए हैं। बेशक यह एकतरफा नहीं है। प्रधानमंत्री पर नेता प्रतिपक्ष की आपत्तिजनक टिप्पणी के जवाब में कांग्रेस पर 'अर्बन नक्सल' सोच का आरोप लगाने वाली भाजपा ने अतीत में भी राहुल गांधी समेत विपक्षी नेताओं के बारे में कुछ भी कहने में संकोच नहीं किया।खुद नरेंद्र मोदी ने संसद में बोलते हुए 'बाल बुद्धि' संबंधी टिप्पणी के सहारे, बिना नाम लिए, नेता प्रतिपक्ष पर निशाना साधा था। पर प्रधानमंत्री और गृह मंत्री को 'गद्दार' कहकर राहुल गांधी राजनीतिक और भाषाई मर्यादा की तमाम सीमाएं लांघ गए हैं।चंद उद्योगपतियों के प्रति सरकार के कथित प्रेम तथा अमेरिका-चीन संबंधों में उतार-चढ़ाव को लेकर राहुल गांधी अक्सर मोदी सरकार से सवाल पूछते रहे हैं। बेशक समस्याओं और नीतियों को लेकर सरकार से सवाल पूछने का अधिकार मीडिया समेत आम आदमी को भी है। उचित माध्यम से सरकार को उनके जवाब भी देने चाहिए, लेकिन जिम्मेदार देश और सभ्य समाज में सवाल पूछने के भी कुछ स्वीकार्य तरीके होने चाहिए।
विपक्ष की शिकायत है कि मीडिया सवाल नहीं पूछता। अगर यही धारणा जनता के मन में बन गई, तो स्वयं मीडिया की भूमिका पर भी सवालिया निशान लग जाएगा।संसदीय लोकतंत्र में सत्तापक्ष और विपक्ष की अपनी-अपनी भूमिकाएं हैं। न केवल लोकतंत्र की सफलता के लिए, बल्कि बेहतर समाज और देश के निर्माण के लिए भी जरूरी है कि दोनों परस्पर सम्मान और समन्वय के साथ अपनी-अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन करें।विडंबना यह है कि पिछले एक दशक में यह आशा निराशा में अधिक बदलती गई है। शायद दशकों तक देश पर लगभग निष्कंटक शासन करने वाली कांग्रेस इस वास्तविकता को स्वीकार नहीं कर पा रही है कि देश और अधिकांश प्रदेशों ने अब सरकार चलाने के लिए भाजपा को चुना है। लेकिन सच से कब तक मुंह चुराया जा सकता है?बेशक दशकों के संघर्ष के बाद मिले व्यापक जनादेश से भाजपा में भी अहमन्यता के बजाय दायित्व और फलदार वृक्ष जैसी विनम्रता का भाव अधिक होना चाहिए।
वैसे हिमाचल प्रदेश, कर्नाटक, तेलंगाना और केरलम में कांग्रेस की सरकारें हैं। झारखंड, तमिलनाडु और जम्मू-कश्मीर में भी कांग्रेस सत्तारूढ़ गठबंधन का हिस्सा है। शेष प्रदेशों और केंद्र में उसकी भूमिका विपक्ष की है, जिसे कमतर नहीं आंका जा सकता, लेकिन उस भूमिका के निर्वहन में कांग्रेस बहुत सफल नजर नहीं आती।लोकतंत्र और देश के प्रति सत्तापक्ष एवं विपक्ष की जिम्मेदारीपूर्ण भूमिकाओं जितना ही महत्वपूर्ण उनका परस्पर व्यवहार और आचरण भी है। दुर्भाग्य से दोनों ही इन जन अपेक्षाओं पर पूरी तरह खरे उतरते नजर नहीं आते।एक-दूसरे के प्रति विश्वास और सम्मान भाव की जगह परस्पर कटुता की खाई लगातार चौड़ी होती जाना किसी के भी हित में नहीं है। अगर विपक्ष सरकार पर 'देश बेचने' का आरोप लगाए और सत्तापक्ष जवाब में उसे 'अर्बन नक्सल' बताते हुए 'देशद्रोही' का प्रमाणपत्र बांटने लगे, तो परस्पर संवाद की संभावनाएं लगातार क्षीण ही होती जाएंगी।
चुनावी जंग में दल और नेता अपनी-अपनी बिसात बिछाते ही हैं, लेकिन उस दौरान की आक्रामकता का हमेशा के लिए बंधक नहीं बन जाना चाहिए। देश में पहले भी चुनाव होते रहे हैं। जाहिर है, अलग-अलग दल सत्तापक्ष और विपक्ष की भूमिकाएं भी निभाते रहे हैं, लेकिन दलगत राजनीति में रंजिश जैसा भाव पहले कभी इतनी तीव्रता से नहीं दिखा, जैसा अब दिखाई दे रहा है।देश के लिए यह भी कम बड़ा संकट नहीं है, लेकिन इससे उबरने की पहल सभी को मिलकर करनी होगी।