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Missing Children Crisis in Madhya Pradesh

लौट आओ... तुम्हारे बिना घर, अब 'घर' जैसा नहीं लगता

अंतरराष्ट्रीय गुमशुदा बाल दिवस पर विशेष रिपोर्ट में मध्यप्रदेश में लापता बच्चों के आंकड़ों, उनकी स्थिति और सामाजिक चुनौतियों को विस्तार से बताया गया है।


लौट आओ तुम्हारे बिना घर अब घर जैसा नहीं लगता

इसे विडंबना ही कहा जाएगा कि हर साल हजारों बच्चे किसी न किसी कारणवश दुखद परिस्थितियों में अपने परिजनों से बिछड़ जाते हैं। यह बिछड़न इतनी पीड़ादायक होती है कि उनका और उनके परिजनों का हर क्षण घुटनभरा, अंधकारमय और असहनीय वेदना से भरा होता है। बिछड़े बच्चों और उनके परिजनों की अंतरवेदना से उपजा रुदन किसी भयावह दर्द से उत्पन्न चीख से भी अधिक पीड़ादायक प्रतीत होता है।

दरअसल, गुमशुदा या खो चुके हर बच्चे की तस्वीर के पीछे एक ऐसा परिवार होता है, जो दरवाजे की ओर हर दस्तक पर अपने बच्चे की वापसी की आशा लगाए बैठा रहता है। कई बार यह उम्मीद भरी टकटकी खुशियों में बदल जाती है, लेकिन कई बार दरवाजे पर होने वाली हर आहट बिछड़न की टीस को और अधिक गहरा कर देती है।

तुम्हारी गुड़िया, खिलौने और गेंद अब भी वैसे ही पड़े हैं.

हर दस्तक पर एक उम्मीद जगती है कि शायद तुम लौट आए हो।हर परिवार अपने बिछड़े हुए बच्चे की वापसी की आशा में दरवाजे पर नजरें टिकाए रहता है। यह उम्मीद कई बार साकार भी होती है, लेकिन कई बार यही प्रतीक्षा दर्द को और बढ़ा देती है।

प्रदेश में अब भी 17 हजार से अधिक बच्चे लापता

प्रदेश में ऐसे लापता बच्चों की संख्या अभी भी करीब 17 हजार से अधिक है। ये बच्चे अपने परिवार में लौटने की प्रतीक्षा कर रहे हैं। कल्पना की जा सकती है कि उनके घरों में उनके खिलौने, गेंद और गुड़िया अब भी वैसे ही पड़े होंगे, जबकि दूसरी ओर वे बच्चे समाज के कठोर और असुरक्षित हालात का सामना कर रहे होंगे।बच्चों के बिछड़ने की कहानी तब और अधिक पीड़ादायक हो जाती है जब यह सामने आता है कि लापता बच्चों में बेटियों की संख्या अधिक है। यह तथ्य इस बात की ओर भी संकेत करता है कि समाज में लड़कियों के प्रति भेदभाव केवल नारों तक सीमित नहीं है।कई मामलों में लापता बच्चों में उन लड़कियों की संख्या भी शामिल है, जिन्हें कुछ परिवार विभिन्न कारणों से छोड़ देते हैं या वे परिस्थितियों में घर से दूर हो जाती हैं, जिनका वापस लौटना अत्यंत कठिन हो जाता है।

पिछले पांच साल में 59 हजार से अधिक बच्चे लापता

आधिकारिक रिकॉर्ड के अनुसार, पिछले लगभग पांच वर्षों में मध्य प्रदेश में 59,365 बच्चों की गुमशुदगी दर्ज की गई है।चौंकाने वाली बात यह है कि जनवरी 2021 से अब तक 48,274 लड़कियां और 11,091 लड़के लापता हो चुके हैं। वहीं राहत की बात यह है कि 41,955 बच्चों को खोजकर उनके परिवारों तक पहुंचा दिया गया है। इसके बावजूद लगभग 17,410 बच्चे अभी भी लापता हैं।जिलावार आंकड़ों में इंदौर राज्य में सबसे आगे है, जहां 4,574 बच्चे (3,560 लड़कियां और 1,014 लड़के) लापता हुए हैं। राजधानी भोपाल में 2,978 मामले दर्ज किए गए हैं, जिनमें 1,804 लड़कियां और 1,174 लड़के शामिल हैं।जबलपुर में 2,000 से अधिक बच्चे लापता हैं। ग्वालियर में 1,857 बच्चों की गुमशुदगी दर्ज की गई है, जिनमें 1,286 लड़कियां शामिल हैं। खरगोन में 1,812 मामलों में 1,502 लड़कियां लापता हैं। इसी तरह गुना और शिवपुरी में लापता बच्चों की संख्या क्रमशः 795 और 960 है। मुरैना में 1,700 और भिंड में 1,500 बच्चे लापता बताए गए हैं। अन्य जिलों में भी यह संख्या उल्लेखनीय है।

बच्चों के बिछड़ने की मुख्य वजहें

  • बच्चों का अपहरण या मानव तस्करी

  • बाल श्रम के लिए साजिशन ले जाना

  • बहला-फुसलाकर घर से दूर ले जाना

विभिन्न कारणों से परिवार से बिछड़ने वाले कई बच्चों को अवैध गतिविधियों और शोषण में धकेल दिया जाता है। कुछ मामलों में इन बच्चों के शारीरिक अंगों की तस्करी जैसी गंभीर आपराधिक गतिविधियों की आशंका भी जताई जाती है।

 

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