सोशल मीडिया और डिजिटल अश्लीलता की बढ़ती लत बच्चों के मानसिक विकास पर असर डाल रही है। भारत में ‘डिजिटल एज ऑफ कंसेंट’ पर बहस तेज होने लगी है।
प्रो. डॉ. राकेश शर्मा
तकनीक ने आधुनिक जीवन को अभूतपूर्व गति और सुविधा दी है। इंटरनेट और सोशल मीडिया ने ज्ञान, संवाद, शिक्षा और अभिव्यक्ति के नए आयाम खोले हैं। लेकिन हर तकनीकी क्रांति अपने साथ कुछ गंभीर सामाजिक चुनौतियाँ भी लेकर आती है। आज भारत सहित पूरी दुनिया जिस सबसे बड़ी चुनौती का सामना कर रही है, वह है बच्चों और युवाओं का अनियंत्रित डिजिटल संसार में तेजी से बढ़ता प्रवेश और सोशल मीडिया व डिजिटल अश्लीलता की लत।
एक समय था, जब बचपन खेल के मैदानों, किताबों, मित्रों और पारिवारिक संवादों के बीच विकसित होता था। आज वही बचपन मोबाइल स्क्रीन, रील्स, शॉर्ट वीडियो, ऑनलाइन गेमिंग और वर्चुअल दुनिया में सिमटता जा रहा है। डिजिटल प्लेटफॉर्म बच्चों की दिनचर्या का हिस्सा बन चुके हैं। तकनीक का संतुलित उपयोग निश्चित रूप से उपयोगी है, लेकिन जब वही तकनीक बचपन की मासूमियत, मानसिक संतुलन और सामाजिक व्यवहार को प्रभावित करने लगे, तब यह केवल व्यक्तिगत नहीं बल्कि राष्ट्रीय चिंता का विषय बन जाता है।
सबसे गंभीर पहलू यह है कि इंटरनेट पर अश्लील, हिंसक और भ्रामक सामग्री तक पहुँच पहले से कहीं अधिक आसान हो गई है। एल्गोरिद्म आधारित सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एंगेजमेंट' बढ़ाने के लिए उपयोगकर्ताओं को लगातार उसी प्रकार की सामग्री दिखाते हैं, जिसे वे एक बार देख चुके होते हैं। परिणामस्वरूप किशोर मन धीरे-धीरे ऐसे कंटेंट की ओर आकर्षित होता है और कई बार यह आकर्षण मानसिक निर्भरता तथा लत का रूप ले लेता है।विशेषज्ञों के अनुसार कम आयु में अश्लील और हिंसक सामग्री के संपर्क में आने से बच्चों और युवाओं के मानसिक एवं भावनात्मक विकास पर गहरा नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। इससे रिश्तों, महिलाओं और सामाजिक मूल्यों के प्रति विकृत धारणाएँ विकसित हो सकती हैं। मानसिक तनाव, अकेलापन, अवसाद, आक्रामक व्यवहार, पढ़ाई में गिरावट और सामाजिक अलगाव जैसी समस्याएँ तेजी से बढ़ रही हैं। 'लाइक्स' और 'फॉलोअर्स' की संस्कृति बच्चों के आत्मविश्वास को वास्तविक उपलब्धियों के बजाय आभासी स्वीकृति से जोड़ रही है।
इसी बढ़ती चिंता के बीच ऑस्ट्रेलिया द्वारा 16 वर्ष से कम आयु के बच्चों के लिए सोशल मीडिया उपयोग पर नियंत्रण संबंधी पहल वैश्विक चर्चा का विषय बनी है। इस मॉडल का उद्देश्य केवल तकनीकी प्रतिबंध लगाना नहीं, बल्कि बच्चों को साइबर बुलिंग, ऑनलाइन शोषण, डिजिटल अश्लीलता और मानसिक दुष्प्रभावों से सुरक्षित करना है। आयु सत्यापन, कंपनियों की जवाबदेही और बच्चों के लिए सुरक्षित डिजिटल वातावरण तैयार करने की दिशा में यह एक महत्वपूर्ण प्रयास माना जा रहा है।भारत में भी यह बहस अब प्रासंगिक होती जा रही है। देश में करोड़ों बच्चे बिना किसी प्रभावी निगरानी के सोशल मीडिया और इंटरनेट का उपयोग कर रहे हैं। ऑनलाइन गेमिंग, रील्स और शॉर्ट वीडियो की लत बच्चों की पढ़ाई, नींद, खेलकूद और पारिवारिक जीवन को प्रभावित कर रही है। कई बच्चे साइबर बुलिंग, फर्जी प्रोफाइल, ब्लैकमेलिंग और डेटा दुरुपयोग जैसे खतरों का भी शिकार हो रहे हैं। यह स्थिति केवल डिजिटल अनुशासन की कमी नहीं, बल्कि सामाजिक संरचना के बदलते स्वरूप का संकेत भी है।
हालाँकि भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में पूर्ण प्रतिबंध व्यावहारिक समाधान नहीं हो सकता। यहाँ डिजिटल शिक्षा, ऑनलाइन सीखने और तकनीकी पहुँच की भी महत्वपूर्ण भूमिका है। इसलिए भारत को किसी दूसरे देश के मॉडल की सीधी नकल करने के बजाय अपनी सामाजिक, सांस्कृतिक और शैक्षणिक आवश्यकताओं के अनुरूप संतुलित डिजिटल नीति विकसित करनी होगी।अब समय आ गया है कि 'डिजिटल एज ऑफ कंसेंट' पर गंभीर राष्ट्रीय चर्चा हो। एक निश्चित आयु से पहले बच्चों के स्वतंत्र सोशल मीडिया उपयोग पर नियंत्रण, प्रभावी आयु सत्यापन प्रणाली, एल्गोरिद्म पारदर्शिता और पैरेंटल कंट्रोल को कानूनी रूप से मजबूत बनाना आवश्यक है। इसके साथ ही परिवारों और शिक्षण संस्थानों की भूमिका भी अत्यंत महत्वपूर्ण है।केवल बच्चों को मोबाइल देना पर्याप्त नहीं; यह समझना भी आवश्यक है कि वे डिजिटल दुनिया में क्या देख रहे हैं और किस प्रकार की मानसिकता विकसित कर रहे हैं। अभिभावकों को बच्चों के साथ संवाद बढ़ाना होगा, जबकि विद्यालयों को डिजिटल साक्षरता, साइबर सुरक्षा और नैतिक इंटरनेट उपयोग को शिक्षा का अनिवार्य हिस्सा बनाना चाहिए।
सरकार, समाज, तकनीकी कंपनियों और परिवारों सभी को मिलकर यह समझना होगा कि युवा पीढ़ी केवल परिवारों की नहीं, बल्कि राष्ट्र की सबसे महत्वपूर्ण पूंजी है। यदि उनका मानसिक और नैतिक विकास डिजिटल प्रदूषण से प्रभावित होगा, तो उसका असर भविष्य के समाज पर भी स्पष्ट दिखाई देगा।