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आपातकाल की आपबीती

आपातकाल की आपबीती: जाति-धर्म नहीं, विरोधी खोजती थी सरकार

1975-77 के आपातकाल में अमान उल्ला खां की गिरफ्तारी और जेल जीवन का वर्णन, जहां उन्होंने विभिन्न विचारधाराओं के बीच सौहार्द का अनुभव किया।


आपातकाल की आपबीती जाति-धर्म नहीं विरोधी खोजती थी सरकार 

25 जून 1975 से 21 मार्च 1977 तक का आपातकाल भारतीय लोकतंत्र के इतिहास का सबसे विवादास्पद अध्याय माना जाता है। यह वह समय था जब अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सीमित कर दी गई थी और सरकार की आलोचना करने वालों को विभिन्न कानूनों के तहत जेल भेजा जा रहा था। भोपाल जिले की बैरसिया तहसील के सरपंच अमान उल्ला खां भी इसी दौर में मीसा के तहत गिरफ्तार किए गए।

अमान उल्ला खां बताते हैं कि गिरफ्तारी से पहले उन्हें इस बात का कोई अंदेशा नहीं था कि उन्हें जेल भेजा जा सकता है। वे गांव के सरपंच थे और खेती-किसानी का काम करते थे। एक दिन कुछ पुलिसकर्मी उनके घर पहुंचे और कहा कि थानेदार साहब ने बुलाया है। उन्होंने कारण पूछा, लेकिन कोई स्पष्ट जवाब नहीं मिला।

वे थाने पहुंचे तो वहां भी किसी प्रकार की पूछताछ नहीं हुई। कुछ औपचारिक कार्रवाइयों के बाद उन्हें मीसा के तहत गिरफ्तार कर लिया गया और भोपाल केंद्रीय जेल भेज दिया गया। वे याद करते हुए कहते हैं, मैं यह समझ ही नहीं पाया कि आखिर मेरा अपराध क्या था। शाम तक घर पर था और अगला सूरज जेल की बैरक में देखा।

अमान उल्ला खां लगभग छह से सात महीने तक जेल में रहे। इस दौरान उन्हें तीन-चार बार पैरोल भी मिली। वे बताते हैं कि जेल में विभिन्न विचारधाराओं और संगठनों से जुड़े लोग बंद थे। जनसंघ, जमात-ए-इस्लामी तथा अन्य संगठनों के कार्यकर्ता एक साथ रहते थे। हालांकि संख्या सबसे अधिक संघ और जनसंघ से जुड़े लोगों की थी।

वे विशेष रूप से बताते हैं कि जेल का वातावरण अपेक्षा से अधिक सौहार्दपूर्ण था। सभी लोग जाति, धर्म और पंथ की सीमाओं से ऊपर उठकर एक-दूसरे के साथ रहते थे। धार्मिक चर्चा, कथा-कहानियां, विचार-विमर्श और हंसी-मजाक का क्रम चलता रहता था। एक-दूसरे के विचारों को सुनने और समझने का अवसर भी मिलता था। अमान उल्ला खां के अनुसार, भोपाल जेल में स्वर्गीय कैलाश नारायण सारंग मीसा बंदियों से जुड़ी व्यवस्थाओं को देखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते थे। 

बंदियों के भोजन की अलग व्यवस्था थी। अखबार भी उपलब्ध कराए जाते थे, जिससे बाहरी दुनिया की जानकारी मिलती रहती थी। वे बताते हैं कि उनके परिवार को मानसिक परेशानी अवश्य हुई, लेकिन आर्थिक संकट नहीं आया। उनका परिवार खेती-किसानी से जुड़ा था और पर्याप्त संसाधन उपलब्ध थे। हालांकि परिजनों को पैरोल और अन्य औपचारिकताओं के लिए प्रशासनिक अधिकारियों के चक्कर लगाने पड़ते थे। इसके बावजूद गांव और समाज में उनकी प्रतिष्ठा प्रभावित नहीं हुई, क्योंकि लोगों को विश्वास था कि अनेक गिरफ्तारियां राजनीतिक कारणों से की जा रही हैं।

आपातकाल समाप्त होने के बाद अमान उल्ला खां रिहा हुए। उन्हें संगठन या सरकार में कोई विशेष पद नहीं मिला, लेकिन जनता का विश्वास लगातार उनके साथ बना रहा। यही कारण रहा कि वे चार बार सरपंच चुने गए। इसके अलावा दो बार जनपद सदस्य और जनपद अध्यक्ष का दायित्व भी उन्होंने संभाला।आज अमान उल्ला खां की कहानी  इस बात का प्रमाण है कि आपातकाल के दौर में सत्ता के लिए व्यक्ति का धर्म या जाति नहीं, बल्कि उसकी वैचारिक पहचान महत्वपूर्ण थी। लोकतंत्र की उस कठिन परीक्षा में उन्होंने जो अनुभव किए, वे आज भी इतिहास की एक महत्वपूर्ण गवाही हैं।

आपातकाल के दौर में सत्ता का निशाना केवल राजनीतिक नेता नहीं थे। गांवों में रहने वाले सामान्य नागरिक, जनप्रतिनिधि और सामाजिक कार्यकर्ता भी इसकी चपेट में आए। भोपाल जिले की बैरसिया तहसील के सरपंच अमान उल्ला खां उन्हीं लोगों में से एक थे। उनका अपराध केवल इतना था कि वे जनसंघ से जुड़े थे। पुलिस उन्हें यह कहकर थाने ले गई कि 'साहब बुला रहे हैं, लेकिन अगली सुबह उन्होंने खुद को भोपाल केंद्रीय जेल की बैरक में पाया। आज 86 वर्ष की आयु में भी वे उस दौर को लोकतंत्र की सबसे कठिन परीक्षा के रूप में याद करते हैं।

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