सिंचाई के लिए करोड़ों रुपये खर्च कर बनाए गए राजकीय नलकूप अब खेतों को पानी कम और सरकारी फाइलों को वजन ज्यादा दे रहे हैं।
Gonda News: करोड़ों का कुआं, बूंद भर पानी नहीं! जवाब दे गए नलकूप जिम्मेदार कौन? |
गोण्डा: सिंचाई के लिए करोड़ों रुपये खर्च कर बनाए गए राजकीय नलकूप अब खेतों को पानी कम और सरकारी फाइलों को वजन ज्यादा दे रहे हैं। नलकूप कार्य खंड में वर्षों से ऐसा खेल चल रहा है, जिसमें पहले बड़े बजट से नलकूप बनाए जाते हैं, फिर कुछ ही वर्षों में उन्हें "डिवायर" (निष्प्रयोज्य) घोषित करने की तैयारी शुरू हो जाती है। हैरत की बात यह है कि कई नलकूप ऐसे हैं जिनका ठीक से ट्रायल तक नहीं हुआ, लेकिन वे भी डिवायर होने की कतार में बताए जा रहे हैं।
दो दर्जन नलकूप डिवायर घोषित
विभागीय सूत्रों के अनुसार करीब दो दर्जन नलकूप पहले ही डिवायर घोषित किए जा चुके हैं, लेकिन उनका पूरा रिकॉर्ड अभी भी फाइलों में कैद है। सवाल यह है कि यदि ये नलकूप निष्प्रयोज्य थे तो वर्षों तक इन पर मरम्मत और रखरखाव का खर्च किस आधार पर होता रहा? आरोप है कि प्रत्येक नलकूप पर मरम्मत के नाम पर निर्धारित लगभग 42 हजार रुपये तक खर्च दिखाने का खेल चलता रहा, जबकि कई नलकूप किसानों के किसी काम ही नहीं आए।
शिकायत पर मिलता है ये जवाब
बताया जाता है कि जब किसान सिंचाई न मिलने की शिकायत करते हैं, तब विभाग डिवायर सूची निकालकर कह देता है कि संबंधित नलकूप तो वर्षों से खराब था। सवाल यह उठता है कि यदि नलकूप पहले से बंद था तो उसकी मरम्मत, निरीक्षण और रखरखाव के कागज आखिर किस कहानी के पात्र हैं? किसान इसे सरकारी धन की बर्बादी और जवाबदेही से बचने का आसान तरीका बता रहे हैं।
क्या कहते अधिशासी अभियंता?
अधिशासी अभियंता अखिलेश कुमार सिंह का कहना है कि विभाग करीब दो दर्जन नलकूपों को डिवायर घोषित कर चुका है और अब उनसे कोई कार्य नहीं लिया जा रहा है। हालांकि वह यह स्पष्ट नहीं कर सके कि महज एक दशक पहले बने नलकूप इतनी जल्दी निष्प्रयोज्य कैसे हो गए। यह भी बड़ा सवाल है कि यदि निर्माण गुणवत्ता बेहतर थी तो करोड़ों की परिसंपत्तियां इतनी कम उम्र में कबाड़ बनने की नौबत तक कैसे पहुंच गईं?
फिर कहां गया बजट?
कुल मिलाकर नलकूप कार्य खंड में बजट, मरम्मत और डिवायर घोषित करने की प्रक्रिया कई सवाल खड़े कर रही है। किसान अब मांग कर रहे हैं कि प्रत्येक डिवायर घोषित नलकूप की स्वतंत्र तकनीकी जांच कराई जाए, ताकि यह साफ हो सके कि पानी खेतों तक नहीं पहुंचा या फिर बजट कहीं और बह गया।