अग्नि अखाड़ा के सभापति मुक्तानंद बापू खुद चौथी तक पढ़े, लेकिन आज हजारों बच्चों के लिए स्कूल-कॉलेज और सेवा प्रकल्प चला रहे हैं।
अग्नि अखाड़ा के सभापति मुक्तानंद बापू से ‘स्वदेश’ की विशेष चर्चा
खुद पढ़ाई से इस हद तक कतराते थे कि बड़ी मुश्किल से चौथी कक्षा तक पढ़ पाए। मन तो वैराग्य की राह पर चलना चाहता था। आज अग्नि अखाड़ा के सभापति मुक्तानंद बापू की पहचान विश्व के 23 से अधिक देशों तक है। उन्होंने गुजरात के जूनागढ़ से लगे चापरदा स्थित आश्रम को सेवा तीर्थ के रूप में स्थापित किया है।विदेशों में बसे उनके अनुयायी सेवा कार्यों में खुलकर सहयोग करते हैं। मुक्तानंद बापू का मन भले ही पढ़ाई में नहीं लगा, लेकिन गोपालानंद जी के आशीर्वाद का ही परिणाम है कि आश्रम से शिक्षा, स्वास्थ्य और सेवा की त्रिवेणी निरंतर बह रही है, जिससे गुजरात के कई गांव सकारात्मक बदलाव की ओर बढ़ रहे हैं।
पशुओं के इलाज से लेकर पक्षी विहार तक कई सेवा प्रकल्प
मुक्तानंद बापू द्वारा संचालित सेवा कार्यों के तहत जूनागढ़ क्षेत्र के 183 गांवों में पशुओं के इलाज के लिए चलित अस्पताल संचालित किए जा रहे हैं। इसके साथ ही सैकड़ों बीघा क्षेत्र में पक्षियों के लिए अभयारण्य भी स्थापित किया गया है।इसके अलावा 172 बेड वाले अस्पताल में ग्रामीण मरीजों का निशुल्क इलाज किया जाता है। प्राथमिक और माध्यमिक विद्यालयों के माध्यम से करीब 10 हजार बच्चों को शिक्षा दी जा रही है। मंदबुद्धि और दृष्टिबाधित बच्चों के लिए भी विशेष स्कूल संचालित किए जा रहे हैं। इसके साथ ही 40 गांवों में विभिन्न सेवा कार्य चल रहे हैं और नौ गांवों में स्कूल एवं सभा भवन निर्माण में सहयोग दिया गया है।
जूनागढ़ में आठ कॉलेजों का संचालन
सदावल रोड, उज्जैन स्थित अग्नि अखाड़ा में निशुल्क भोजनशाला के शुभारंभ के अवसर पर पहुंचे मुक्तानंद बापू आधुनिक उपकरण जैसे टीवी, मोबाइल और लैपटॉप चलाना नहीं जानते, लेकिन उनके ट्रस्ट द्वारा संचालित ब्रह्मानंद विद्या मंदिर के माध्यम से गुजरात के चापरदा और कच्छ क्षेत्र के गांवों में हजारों बच्चों को निशुल्क शिक्षा उपलब्ध कराई जा रही है।जूनागढ़ में उनके संस्थान द्वारा आठ कॉलेज संचालित किए जा रहे हैं।
‘स्वदेश’ से चर्चा में मुक्तानंद बापू ने कहा, “मेरे साथ स्कूल में पढ़ने वाले कई लोग डॉक्टर और वकील बन गए। मैं खुद ज्यादा नहीं पढ़ पाया, लेकिन यह मेरे लिए संतोष की बात है कि हमारे कॉलेजों से विषय विशेषज्ञ तैयार हो रहे हैं।”उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा कि उन्हें खुद यह भी नहीं पता कि कौन-कौन से विषयों के कॉलेज संचालित हो रहे हैं। “जिस विषय में छात्रों की संख्या ज्यादा हो जाती है, उसी विषय का कॉलेज शुरू कर दिया जाता है। इसका संचालन समिति देखती है,” उन्होंने कहा।
“धर्म का सार है लोगों को राहत देना”
मुक्तानंद बापू ने कहा कि वह इस विवाद में नहीं पड़ना चाहते कि कौन सा धर्म किससे बेहतर है। उन्होंने बताया कि 16 वर्ष की उम्र से वह गोपालानंद जी के साथ रहे और उन्होंने हमेशा एक ही सीख दी “अच्छे काम करते रहो।”बापू ने कहा, “धर्म भी तो यही कहता है कि दूसरों को राहत दीजिए। भोजनशाला के माध्यम से निशुल्क भोजन, स्कूल-कॉलेजों के जरिए शिक्षा और पीड़ितों की सेवा करना ही सबसे बड़ा धर्म है।”