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MP Water Crisis: Groundwater Falling Fast

प्रदेश में पाताल की ओर चला पानी:संरक्षण के अभाव में कचरा घर बनीं कुएं-बावड़ियां

मध्यप्रदेश में भूजल स्तर तेजी से गिर रहा है। केंद्रीय भूजल बोर्ड की रिपोर्ट के अनुसार 60 ब्लॉक सेमी-क्रिटिकल और 26 अतिदोहित श्रेणी में पहुंच गए हैं, जबकि कुएं-बावड़ियां उपेक्षा और अतिक्रमण की शिकार है


प्रदेश में पाताल की ओर चला पानीसंरक्षण के अभाव में कचरा घर बनीं कुएं-बावड़ियां

प्रदेश का पानी पाताल की ओर चला पड़ा है। इसके चलते भूजल स्तर गंभीर श्रेणी में पहुंच गया है। अत्यधिक दोहन के चलते बनी इस स्थिति को केंद्रीय भूजल बोर्ड 2025 की रिपोर्ट भी बताती है कि प्रदेश में साल-दर-साल हालात गंभीर होते जा रहे हैं। वजह यह भी है कि राजधानी सहित प्रदेश में 60 ब्लॉक सेमी-क्रिटिकल स्थिति में पहुंच चुके हैं।

वहीं 26 ब्लॉक अति-दोहित श्रेणी में शामिल हो गए हैं। चिंताजनक बात यह है कि पिछले साल के मुकाबले सुरक्षित ब्लॉकों की संख्या में कमी आई है, जबकि क्रिटिकल और सेमी-क्रिटिकल श्रेणी में बढ़ोतरी हुई है। वर्ष 2024 में मध्यप्रदेश में सुरक्षित ब्लॉकों की संख्या 225 थी, जो वर्ष 2025 में घटकर 221 (69.72 प्रतिशत ब्लॉक) रह गई। वहीं सेमी-क्रिटिकल ब्लॉकों की संख्या 61 से बढ़कर 64 (20.19 प्रतिशत ब्लॉक) हो गई है।

हालात नहीं सुधरे तो स्थिति होगी भयावह

राजधानी के मामले में केंद्रीय भूजल आयोग की वर्ष 2023 और 2025 की रिपोर्ट का अंतर बताता है कि यदि समय रहते सुधारात्मक कदम नहीं उठाए गए तो आने वाले समय में हालात भयावह हो सकते हैं। राजधानी के फंदा, बैरसिया और भोपाल शहर के आंकड़े इसकी पुष्टि करते हैं। बीते दो वर्षों में इन ब्लॉकों में पानी के दोहन में 7.82 प्रतिशत तक बढ़ोतरी हुई है।

राजधानी के ब्लॉक 
वर्ष 2024-बैरसिया- 72.48, भोपाल शहर- 71.13, फंदा- 83.47, कुल- 76.18

वर्ष 2025- बैरसिया- 80.30, भोपाल शहर- 85.06, फंदा- 81.78, कुल – 78.34

पर्यावरणविद् सुभाष चंद्र पांडेय के मुताबिक गिरता भूजल स्तर और बढ़ता दोहन चिंता की वजह है। इसे रोकने के लिए पर्यावरण संरक्षण पर गंभीरता से काम करना होगा। तभी समय रहते भूजल संवर्धन संभव हो सकेगा। पूरे प्रदेश में बीते 15 वर्षों में बड़ी संख्या में बोरवेल कराए गए हैं। वाटर हार्वेस्टिंग को लेकर भी शासन-प्रशासन द्वारा कई पहल की गईं, लेकिन उनका सही तरीके से पालन नहीं हो पाया।

ये है भूजल स्तर की स्थिति

सुरक्षित: 70 प्रतिशत से कम भूजल का दोहन
सेमी-क्रिटिकल: 70 से 90 प्रतिशत के बीच भूजल का दोहन

गंभीर: 90 प्रतिशत से अधिक और 100 प्रतिशत से कम भूजल का दोहन

अति-दोहित: 100 प्रतिशत से अधिक भूजल का दोहन

बावड़ियों के संरक्षण का मॉडल

करीब एक दशक पहले भोपाल और इंदौर नगर निगम ने मां राजराजेश्वरी मंदिर के समीप स्थित दर्जनों बावड़ियों की सफाई के लिए शाजापुर मॉडल अपनाने की योजना बनाई थी। शाजापुर में इस दिशा में उल्लेखनीय काम हुआ था और आज भी वहां लोग बावड़ियों का पानी उपयोग में लेते हैं।

भोपाल रियासत की बावड़ियां दूर कर सकती हैं पानी की कमी

देखरेख के अभाव में भोपाल रियासत की करीब 12 बावड़ियां अपनी पहचान खोती जा रही हैं। इनमें सैकड़ों फीट गहरे जलस्तर के साथ पर्याप्त पानी मौजूद है, लेकिन गंदगी के कारण इसका उपयोग नहीं हो पा रहा। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि शाजापुर मॉडल के अनुसार गर्मी में इन बावड़ियों की सफाई कर दी जाए, तो इनका पानी पीने योग्य बनाया जा सकता है।

ये हैं ऐतिहासिक बदहाल बावड़ियां

  1. नदीबाग की सबसे पुरानी बावड़ी
  2. बैरसिया रोड स्थित इस्लामनगर की बावड़ी
  3. बड़े बाग की बावड़ी
  4. बाग फरहत अफजा बावड़ी
  5. ऐशबाग स्टेडियम के पास की बावड़ी
  6. बाग उमरावदुल्लाह की बावड़ी
  7. भोपाल से 60 किमी दूर गिन्नौरगढ़ किले की चार बड़ी बावड़ियां
  8. रायसेन किले की दो बड़ी और एक छोटी बावड़ी
     

बावड़ियों के संरक्षण पर नहीं दिया जा रहा ध्यान

कहने को भोपाल झीलों, तालाबों और बावड़ियों का शहर है, लेकिन हर साल गर्मी आते ही शहर को जल संकट से जूझना पड़ता है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि इन बावड़ियों की नियमित सफाई और संरक्षण किया जाए तो न केवल शहर का जलस्तर सुधर सकता है, बल्कि बोरवेल सूखने की समस्या भी कम हो सकती है।

क्या कहते हैं जिम्मेदार

नगर निगम भोपाल के अध्यक्ष किशन सूर्यवंशी ने बताया कि मुख्यमंत्री के निर्देश पर ‘जल गंगा संवर्धन अभियान’ के तहत दो वर्ष पहले कुओं, बावड़ियों और अन्य जल स्रोतों की सफाई का काम शुरू किया गया था, ताकि इनका पानी उपयोग में लाया जा सके। हालांकि जागरूकता की कमी के कारण कई बावड़ियां फिर से गंदगी से भर गईं। उन्होंने कहा कि इस गर्मी में इन्हें दोबारा साफ कराने का प्रयास किया जाएगा।

वहीं पद्मश्री डॉ. नारायण व्यास, पुरातत्वविद् के अनुसार भोपाल रियासत के समय नवाबों ने बावड़ियां इस तरह बनवाई थीं कि ऊपर बैठने की जगह और नीचे जल स्रोत का भंडार होता था। इससे शहर के लगभग 100 किलोमीटर क्षेत्र में जल संकट नहीं होता था। उन्होंने कहा कि सरकार को इन ऐतिहासिक जल स्रोतों के संरक्षण के लिए गंभीर प्रयास करने चाहिए।

मिली जानकारी के अनुसार भोपाल में करीब 12 बावड़ियां हैं, जिनमें से अधिकांश पर अतिक्रमण हो चुका है। कहीं लोगों ने इनके किनारों पर घर बना लिए हैं, तो कहीं इन्हें कचरा घर बना दिया गया है। कुछ स्थानों पर तो बावड़ियों को समतल कर निजी उपयोग में भी लिया जा रहा है।

स्थिति यह है कि शहरी क्षेत्र में अब केवल 9 बावड़ियां ही किसी तरह जीवित हैं, लेकिन वे भी जर्जर अवस्था में पहुंच चुकी हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इन ऐतिहासिक जल स्रोतों का संरक्षण किया जाए तो शहर के जल संकट को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

 

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