NFHS-6 रिपोर्ट के अनुसार मध्य प्रदेश में 35.7% बच्चे कम वजन और 35.6% बच्चे ठिगनेपन का शिकार हैं। मध्य प्रदेश में हर तीसरा बच्चा कुपोषित, जानिए राज्य में कुपोषण की ताजा तस्वीर।
भोपाल। मध्य प्रदेश में कुपोषण के खिलाफ लंबे समय से चल रहे सरकारी अभियानों के बावजूद बच्चों की सेहत को लेकर चिंता पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS-6) के ताजा आंकड़े बताते हैं कि प्रदेश में आज भी लगभग हर तीसरा बच्चा कम वजन (Underweight) और हर तीसरा बच्चा ठिगनेपन (Stunting) का शिकार है। यह स्थिति बताती है कि कुपोषण के खिलाफ लड़ाई अभी अधूरी है।
रिपोर्ट के अनुसार पांच वर्ष से कम उम्र के बच्चों में 35.7 प्रतिशत बच्चे कम वजन वाले हैं, जबकि 35.6 प्रतिशत बच्चे उम्र के अनुपात में कम लंबाई (Stunted) वाले पाए गए। हालांकि NFHS-5 की तुलना में कुछ सुधार दर्ज हुआ है, लेकिन आंकड़े अब भी राष्ट्रीय चिंता का विषय बने हुए हैं।
क्या कहती है रिपोर्ट?
NFHS-6 के अनुसार मध्य प्रदेश में बच्चों के पोषण से जुड़े प्रमुख आंकड़े इस प्रकार हैं
| संकेतक |
NFHS-5 (%) |
NFHS-6 (%) |
| कम वजन (Underweight) |
41.0 |
35.7 |
| ठिगनापन (Stunting) |
42.9 |
35.6 |
| दुबलापन (Wasting) |
22.9 |
19.0 |
आंकड़े बताते हैं कि पिछले सर्वेक्षण की तुलना में स्थिति में सुधार हुआ है, लेकिन अभी भी प्रदेश के लाखों बच्चे कुपोषण की समस्या से जूझ रहे हैं।
आदिवासी और ग्रामीण क्षेत्रों में चुनौती ज्यादा
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि मध्य प्रदेश के आदिवासी और दूरस्थ ग्रामीण इलाकों में कुपोषण की समस्या अपेक्षाकृत अधिक गंभीर है। इन क्षेत्रों में पोषणयुक्त भोजन, स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच और मातृ स्वास्थ्य संबंधी जागरूकता की कमी बच्चों के विकास को प्रभावित करती है प्रदेश के कई जिलों में बच्चों के शारीरिक विकास, वजन और ऊंचाई से जुड़े संकेतक अभी भी राष्ट्रीय औसत से पीछे हैं। यही कारण है कि सरकार लगातार पोषण अभियान, आंगनवाड़ी सेवाओं और मातृ-शिशु स्वास्थ्य कार्यक्रमों पर जोर दे रही है।
क्यों खतरनाक है ठिगनापन?
विशेषज्ञों के अनुसार ठिगनापन केवल कम लंबाई की समस्या नहीं है। यह बच्चे के मस्तिष्क विकास, सीखने की क्षमता, रोग प्रतिरोधक क्षमता और भविष्य की उत्पादकता को भी प्रभावित करता है कम वजन और ठिगनापन वाले बच्चों में संक्रमण का खतरा अधिक होता है और उनका शारीरिक तथा मानसिक विकास भी प्रभावित हो सकता है।
सुधार के संकेत भी मिले
रिपोर्ट का सकारात्मक पक्ष यह है कि पिछले कुछ वर्षों में कुपोषण के कई संकेतकों में गिरावट दर्ज हुई है। आंगनवाड़ी नेटवर्क, पोषण ट्रैकर, पूरक पोषण आहार और जन-जागरूकता अभियानों का असर आंकड़ों में दिखाई देने लगा है हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि यदि मध्य प्रदेश को कुपोषण मुक्त राज्य बनाना है तो गर्भवती महिलाओं के पोषण, स्तनपान, पूरक आहार और ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाओं पर और अधिक निवेश की आवश्यकता होगी।
बच्चों की सेहत पर बड़ा सवाल
प्रदेश में हाई BP, डायबिटीज और मोटापे जैसी जीवनशैली संबंधी बीमारियों के बढ़ते मामलों के बीच बच्चों में कुपोषण की यह तस्वीर दोहरी स्वास्थ्य चुनौती की ओर इशारा करती है। एक तरफ वयस्कों में जीवनशैली रोग बढ़ रहे हैं, तो दूसरी तरफ बड़ी संख्या में बच्चे अब भी पर्याप्त पोषण से वंचित हैं।