मध्यप्रदेश में कई छोटी जनजातियां विलुप्ति की कगार पर हैं, जिनकी जनसंख्या 500 से कम हो गई है। सरकारी योजनाओं के बावजूद संकट बरकरार।
जनजातीय बाहुल्य मध्यप्रदेश में कई छोटी जनजातियों के सामने अस्तित्व का संकट खड़ा हो गया है। ये सामाजिक-आर्थिक असमानता की वजह से लुप्त होने की कगार पर हैं। अचरज की बात यह है कि राज्य की वर्गीकृत 43 जनजातियों में से 13 की जनसंख्या हजार से भी कम रह गई है। इनमें से कुछ जनजातियों की संख्या तो 500 से भी कम है। इस तरह आधुनिकता के वर्तमान दौर में कई जनजातियों का अस्तित्व सिमटता जा रहा है।
आधिकारिक जानकारी के अनुसार राज्य में भील, गोंड और कोल जैसी बड़ी जनजातियों की संख्या लाखों में है, लेकिन बिरहोर, कोंघ, आंध, परजा, कोलम, नगेसिया, मंझवार और गदवा जैसे छोटे जनजातीय समूहों की जनसंख्या महिला-पुरुष मिलाकर 500 से भी कम नहीं बची है। वहीं कमार और सावर-सवरा जैसी जनजातियों की कुल जनसंख्या लगातार घटते हुए 1000 के दायरे में सिमट गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि समय रहते स्वास्थ्य, शिक्षा और आजीविका के क्षेत्र में प्रभावी हस्तक्षेप नहीं किए गए, तो छोटी जनजातियां आने वाले कुछ दशकों में पूरी तरह विलुप्त होने के खतरे का सामना कर सकती हैं। केंद्र और राज्य सरकार द्वारा पीएम-जनमन सहित कई योजनाएं चलाई जा रही हैं, जिनका उद्देश्य विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूहों तक बुनियादी सुविधाएं पहुंचाना, आवास, शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार के अवसर बढ़ाना है। इसके अलावा विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूह (पीवीटीजी) के रूप में चिन्हित बैगा, भारिया और सहरिया समुदायों के शिक्षा, स्वास्थ्य और पोषण पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है।
जनसंख्या घटने के प्रमुख कारण
- कुपोषण और स्वास्थ्य सुविधाओं का अभाव
- शिशु एवं मातृ मृत्यु दर अधिक होना
- जंगलों पर निर्भर पारंपरिक जीवनशैली का संकट
- रोजगार के लिए पलायन
- मुख्यधारा समाज में विलय से सांस्कृतिक पहचान का कमजोर होना
- शिक्षा और सामाजिक जागरूकता की कमी
- आर्थिक उपेक्षा से कई समुदाय विलुप्तता की कगार पर पहुंच गए
अंग्रेजों ने जनजातियों को विभिन्न समूहों में बांटा। जबकि एक क्षेत्र की विभिन्न जनजातियां वास्तव में एक ही जनजाति के अभिन्न अंग थीं। कुछ जनजातियों की जनसंख्या बहुत कम हो गई। अतः सामाजिक व आर्थिक उपेक्षा के कारण कम जनसंख्या वाली जनजातियाँ विलुप्तता की कगार पर पहुंच गई हैं। संरक्षण के लिए कई क्षेत्रों में एक साथ काम करने की जरूरत है। - डॉ. रूप नारायण मांडवे, सदस्य, जनजातीय मंत्रणा परिषद, मध्यप्रदेश सरकार
सर्वे करा रहे हैं, सरकार को सौंपेंगे अनुशंसाएं
इधर मध्यप्रदेश राज्य अनुसूचित जनजाति आयोग के अध्यक्ष रामलाल रौतेल के मुताबिक आयोग ने इस विषय को गंभीरता से लिया है। इसलिए एक जून को बुलाई गई बैठक के एजेंडे में इसे शामिल किया गया है। विलुप्तता की कगार पर पहुंची जनजातियों के संरक्षण पर विचार करते हुए हम सरकार को अनुशंसाएं सौंपेंगे।