देश का सबसे व्यस्त एयरपोर्ट होने के बावजूद इंदौर अब भी सीमित अंतरराष्ट्रीय कनेक्टिविटी पर निर्भर है। क्या नई विमानन नीति शहर को उसकी वास्तविक क्षमता के अनुरूप पहचान दिला पाएगी?
अनुराग तागड़े, इंदौर। मध्यप्रदेश का इंदौर जिला सबसे बड़ा कारोबारी शहर नहीं है बल्कि मध्य भारत की अर्थव्यवस्था की धुरी बन चुका है। स्वच्छता से लेकर उद्योग, शिक्षा, आईटी और एयर कार्गो तक शहर ने लगातार अपनी पहचान मजबूत की है। इसके बावजूद राष्ट्रीय विमानन ढांचे में इसकी भूमिका अब भी उस स्तर तक नहीं पहुंच सकी है, जिसकी इसकी क्षमता मांग करती है।
हर साल करीब 42.45 लाख यात्री इंदौर एयरपोर्ट का उपयोग करते हैं। यह प्रदेश का सबसे व्यस्त हवाई अड्डा और सबसे बड़ा एयर कार्गो केंद्र भी है। ऐसे में सवाल केवल एयरपोर्ट की रैंकिंग का नहीं बल्कि उस रणनीतिक सोच का है, जिसमें इतने बड़े आर्थिक केंद्र को अब भी सीमित कनेक्टिविटी वाले शहर की तरह देखा जा रहा है।
इंदौर की नई अंतरराष्ट्रीय शुरुआत
इंदौर के लिए हाल में एयर इंडिया एक्सप्रेस की अबूधाबी के लिए सीधी उड़ान एक अहम उपलब्धि बनकर सामने आई है। इससे मालवा-निमाड़ क्षेत्र के यात्रियों का लंबा कनेक्टिंग सफर घटकर करीब साढ़े तीन घंटे रह गया है। व्यापार, निवेश, पर्यटन और विदेशों में रहने वाले भारतीयों के लिए यह सुविधा नई संभावनाएं लेकर आई है। हालांकि इतनी बड़ी आर्थिक क्षमता वाले शहर के लिए केवल एक अंतरराष्ट्रीय उड़ान भविष्य की जरूरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त नहीं मानी जा सकती।
इंदौर की तुलना किस स्तर पर होनी चाहिए
इंदौर की तुलना केवल प्रदेश के अन्य एयरपोर्ट से करना उसकी वास्तविक स्थिति को नहीं दर्शाता। इसकी आर्थिक और औद्योगिक ताकत अहमदाबाद, पुणे, जयपुर, लखनऊ, कोच्चि और चंडीगढ़ जैसे शहरों के करीब मानी जाती है। इन शहरों ने कई अंतरराष्ट्रीय उड़ानों, मजबूत एयरलाइन नेटवर्क, कार्गो सेवाओं और कॉर्पोरेट ट्रैवल के दम पर अपनी विमानन क्षमता का विस्तार किया है। इंदौर में उद्योग, स्टार्टअप, स्वास्थ्य, फार्मा, ऑटोमोबाइल और खाद्य प्रसंस्करण जैसे मजबूत आधार मौजूद हैं, लेकिन उसी अनुपात में एयर कनेक्टिविटी विकसित नहीं हो सकी।
भोपाल और खजुराहो की उपलब्धि अलग श्रेणी की कहानी
भोपाल और खजुराहो का ग्राहक संतुष्टि के आधार पर बेहतर प्रदर्शन अपनी जगह महत्वपूर्ण उपलब्धि है। उनकी सेवा गुणवत्ता की सराहना भी होनी चाहिए। लेकिन इन एयरपोर्ट की तुलना उस श्रेणी में होती है जहां यात्रियों की संख्या और परिचालन का दबाव अपेक्षाकृत कम रहता है। दूसरी ओर इंदौर हर साल 42 लाख से अधिक यात्रियों का भार संभालता है। इसलिए केवल रैंकिंग के आधार पर यह निष्कर्ष निकालना सही नहीं होगा कि इंदौर पीछे है। वास्तविक मुद्दा यह है कि इतने बड़े यात्री आधार और आर्थिक महत्व के बावजूद शहर को राष्ट्रीय विमानन नीति में अपेक्षित प्राथमिकता क्यों नहीं मिली।
कनेक्टिविटी की कमी सबसे बड़ी चुनौती
इंदौर की सबसे बड़ी जरूरत बेहतर रणनीतिक कनेक्टिविटी है। आज भी अधिकांश अंतरराष्ट्रीय यात्रियों को दिल्ली, मुंबई, हैदराबाद या बेंगलुरु के जरिए अपनी यात्रा पूरी करनी पड़ती है। इसका सीधा असर यह होता है कि यात्रियों का बड़ा हिस्सा इंदौर से आता है लेकिन एयर ट्रैफिक और आर्थिक लाभ दूसरे बड़े हब एयरपोर्ट को मिलता है। शहर के लिए दुबई, सिंगापुर, बैंकॉक, दोहा और कोलंबो जैसी प्रमुख अंतरराष्ट्रीय उड़ानों के साथ एयरलाइन बेस, नाइट पार्किंग, एयर कार्गो विस्तार, एमआरओ सुविधा और एयरोसिटी जैसी परियोजनाओं की जरूरत लगातार महसूस की जा रही है।
नीतिगत प्राथमिकता से बदल सकती है तस्वीर
राज्य सरकार ने नई नागरिक उड्डयन नीति के तहत अंतरराष्ट्रीय उड़ानों को बढ़ावा देने की दिशा में कदम बढ़ाए हैं और अबूधाबी की सीधी उड़ान उसी प्रयास का पहला परिणाम मानी जा रही है। यदि इसी सोच के साथ इंदौर को मध्य भारत के ट्रांजिट और अंतरराष्ट्रीय विमानन केंद्र के रूप में विकसित किया गया तो आने वाले समय में यह शहर केवल प्रदेश ही नहीं बल्कि पूरे मध्य भारत के लिए वैश्विक प्रवेश द्वार बन सकता है। स्वच्छता, उद्योग, निवेश और उद्यमिता में पहचान बनाने के बाद अब इंदौर की अगली बड़ी चुनौती विमानन क्षेत्र में उसी स्तर की रणनीतिक पहचान हासिल करना है। 42 लाख से अधिक वार्षिक यात्रियों वाला यह शहर अब केवल एक क्षेत्रीय एयरपोर्ट नहीं बल्कि मध्य भारत की आर्थिक आकांक्षाओं का प्रतिनिधित्व करता है।