दिल्ली हाई कोर्ट ने अरविंद केजरीवाल और AAP नेताओं को चुनाव लड़ने से रोकने वाली PIL खारिज कर दी। कोर्ट ने कहा कि याचिका कानून और तथ्यों दोनों के स्तर पर कमजोर है।
दिल्ली हाई कोर्ट ने आम आदमी पार्टी को डीरजिस्टर करने और अरविंद केजरीवाल समेत पार्टी के तीन नेताओं को चुनाव लड़ने से रोकने की मांग वाली जनहित याचिका को खारिज कर दिया। अदालत ने सुनवाई के दौरान साफ संकेत दिए कि याचिका कानूनी आधार पर टिकती नहीं दिख रही। सुनवाई की शुरुआत से ही कोर्ट ने याचिकाकर्ता के तर्कों पर कड़े सवाल उठाए।
सुनवाई करने वाली बेंच ने पूछा कि क्या चुनाव आयोग के पास किसी राजनीतिक दल का पंजीकरण खत्म करने का ऐसा अधिकार मौजूद है। जिसे अदालत लागू करवा सके। जब याचिकाकर्ता की ओर से इसका स्पष्ट जवाब नहीं दिया जा सका, तब कोर्ट ने टिप्पणी की कि पूरी याचिका गलतफहमी और कमजोर कानूनी आधार पर तैयार की गई लगती है।
नेताओं के आचरण से पूरी पार्टी कैसे दोषी?
मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी एक या कुछ नेताओं के व्यवहार को पूरे राजनीतिक दल के खिलाफ कार्रवाई का आधार नहीं बनाया जा सकता। बेंच ने पूछा कि अगर किसी नेता के खिलाफ आरोप हैं, तो उससे पार्टी का पंजीकरण रद्द करने का रास्ता कैसे निकलता है। अदालत ने यह भी जानना चाहा कि याचिका में ऐसा कौन सा स्पष्ट कानूनी प्रावधान है, जिसके तहत यह मांग की जा रही है। कोर्ट के सवालों से साफ था कि न्यायपालिका राजनीतिक दलों के खिलाफ कार्रवाई में कानूनी प्रक्रिया और स्पष्ट प्रावधान को सबसे अहम मान रही है।
अवमानना और चुनाव लड़ने पर रोक पर बोली कोर्ट
याचिकाकर्ता ने दावा किया था कि आबकारी नीति मामले की सुनवाई के दौरान नेताओं ने अदालत की कार्यवाही का बहिष्कार किया और बाद में प्रेस कॉन्फ्रेंस कर न्यायपालिका का अपमान किया। इस पर हाई कोर्ट ने कहा कि अगर किसी मामले में अदालत की अवमानना हुई है तो उसके लिए अलग कानून मौजूद है। कोर्ट ने Contempt of Court Act का हवाला देते हुए कहा कि ऐसे मामलों की सुनवाई उसी प्रक्रिया के तहत होती है।
बेंच ने यह भी साफ किया कि अवमानना का मामला अपने आप किसी व्यक्ति को चुनाव लड़ने से अयोग्य नहीं बनाता। चुनावी अयोग्यता के लिए अलग कानूनी मानदंड तय हैं।
चुनाव लड़ने से रोकने की मांग पर अदालत का रुख
सुनवाई के दौरान जब नेताओं को चुनाव लड़ने से अयोग्य घोषित करने की मांग दोहराई गई, तब अदालत ने सीधे पूछा कि इसके पीछे कौन सा वैधानिक आधार है। कोर्ट ने कहा कि फिलहाल ऐसा कोई प्रावधान सामने नहीं रखा गया जिससे अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया या दुर्गेश पाठक को चुनाव लड़ने से रोका जा सके। इस टिप्पणी को राजनीतिक तौर पर भी अहम माना जा रहा है क्योंकि हाल के महीनों में आबकारी नीति मामले को लेकर आम आदमी पार्टी लगातार कानूनी और राजनीतिक दबाव झेल रही है।
आबकारी नीति केस से जुड़ा है पूरा विवाद
यह पूरा मामला उस आरोप से जुड़ा था जिसमें कहा गया कि अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया और दुर्गेश पाठक ने जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा की अदालत में चल रही आबकारी नीति मामले की कार्यवाही का बहिष्कार किया था। इसी आधार पर उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई, चुनावी अयोग्यता और आम आदमी पार्टी का पंजीकरण रद्द करने की मांग की गई थी। हालांकि दिल्ली हाई कोर्ट ने साफ कर दिया कि केवल आरोपों और राजनीतिक असहमति के आधार पर इतने बड़े फैसले नहीं लिए जा सकते।
कोर्ट की टिप्पणियों से यह भी संकेत मिला कि चुनावी राजनीति और कानूनी कार्रवाई के बीच स्पष्ट सीमा बनाए रखना न्यायपालिका जरूरी मानती है।