मशहूर शायर और पद्मश्री बशीर बद्र का 91 साल की उम्र में भोपाल में निधन हो गया। मोहब्बत और रिश्तों को आसान लफ्जों में कहने वाले इस शायर के जाने से उर्दू अदब में बड़ी खाली जगह बन गई है।
शायरी की दुनिया से गुरुवार को एक अनोखी आवाज खामोश हो गई। जिस आवाज ने दशकों तक मोहब्बत, तन्हाई और रिश्तों को बेहद सादगी से लोगों तक पहुंचाया। पद्मश्री से सम्मानित मशहूर शायर बशीर बद्र का भोपाल में निधन हो गया। उन्होंने 91 साल की उम्र में ईदगाह हिल्स स्थित अपने घर पर अंतिम सांस ली। परिवार के अनुसार, बशीर बद्र लंबे समय से उम्र संबंधी बीमारियों से जूझ रहे थे। पिछले कुछ समय से उनकी तबीयत लगातार खराब चल रही थी। वह डिमेंशिया से भी पीड़ित थे और उनकी याददाश्त काफी हद तक प्रभावित हो चुकी थी।
साहित्य जगत में शोक की लहर
उनके निधन की खबर सामने आते ही साहित्य और उर्दू अदब से जुड़े लोगों में शोक की लहर फैल गई। भोपाल समेत देशभर में उनके चाहने वाले उन्हें याद कर रहे हैं। परिजनों के अनुसार उनका अंतिम संस्कार गुरुवार शाम को किया जा सकता है।
मोहब्बत को आसान लफ्जों में कहने वाले शायर
बशीर बद्र उन चुनिंदा शायरों में गिने जाते थे जिन्होंने उर्दू शायरी को आम लोगों तक पहुंचाया। उनकी ग़ज़लों में भारी शब्दों की जगह इंसानी एहसास और रोजमर्रा की जिंदगी की सादगी दिखाई देती थी।मोहब्बत, दूरी, यादें और रिश्तों पर लिखी उनकी पंक्तियां लोगों की जिंदगी का हिस्सा बन गईं। यही वजह रही कि मुशायरों में उनका नाम आते ही बड़ी संख्या में लोग उन्हें सुनने पहुंचते थे। उनकी शायरी सिर्फ किताबों तक सीमित नहीं रही, बल्कि सोशल मीडिया और नई पीढ़ी के बीच भी लगातार लोकप्रिय बनी रही।
दुनियाभर में पसंद की गईं बशीर बद्र की ग़ज़लें
बशीर बद्र की कई ग़ज़लें ऐसी हैं जिन्हें आज भी लोग याद करते हैं और मंचों पर दोहराते हैं। उनकी लिखी पंक्तियां मोहब्बत और जिंदगी की सच्चाइयों को बेहद सरल अंदाज में बयान करती थीं। “न जी भर के देखा न कुछ बात की, बड़ी आरज़ू थी मुलाकात की” जैसी ग़ज़लें आज भी लोगों की जुबान पर हैं। इसी तरह “आंखों में रहा दिल में उतर कर नहीं देखा” और “अगर तलाश करूं कोई मिल ही जाएगा” जैसी रचनाओं ने उन्हें अलग पहचान दिलाई। उनकी शायरी में दर्द था, लेकिन भाषा हमेशा नरम और दिल के करीब महसूस होती थी। यही उनकी सबसे बड़ी ताकत मानी जाती है।
डिमेंशिया से जूझ रहे थे बशीर बद्र
करीबी लोगों के अनुसार बशीर बद्र पिछले लंबे समय से डिमेंशिया बीमारी से पीड़ित थे। धीरे-धीरे उनकी याददाश्त कमजोर होती गई और वह लोगों को पहचानने में भी दिक्कत महसूस करने लगे थे।स्वास्थ्य लगातार बिगड़ने के कारण उन्होंने सार्वजनिक कार्यक्रमों से भी दूरी बना ली थी। हालांकि उनकी पुरानी ग़ज़लें और रिकॉर्डेड मुशायरे आज भी लोगों के बीच उतने ही लोकप्रिय हैं।
जावेद अख्तर बोले-उर्दू आज थोड़ी गरीब हो गई
शायर और गीतकार जावेद अख्तर ने बशीर बद्र के निधन पर गहरा दुख जताया। उन्होंने कहा कि आज उर्दू भाषा थोड़ी गरीब हो गई है। उनके मुताबिक बशीर बद्र बेहद मधुर और संवेदनशील शायर थे, जिनकी ग़ज़लें हमेशा लोगों की यादों में जिंदा रहेंगी। साहित्य जगत से जुड़े कई लोगों ने भी उनके निधन को उर्दू शायरी की बड़ी क्षति बताया है। बशीर बद्र का जाना सिर्फ एक शायर का निधन नहीं, बल्कि उस दौर का अंत माना जा रहा है जिसने ग़ज़लों को आम लोगों के दिल तक पहुंचाया।