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Amit Shah Bastar Mission

जिस बस्तर में शाम ढलते ही छा जाता था डर, वहीं से अमित शाह ने क्यों किया ‘नक्सल मुक्त भारत’ का ऐलान?

कभी नक्सल हिंसा का गढ़ रहे बस्तर से अमित शाह ने ‘नक्सल मुक्त भारत’ का ऐलान किया। सरकार अब बस्तर को डर नहीं, विकास और निवेश की नई पहचान बनाना चाहती है।


जिस बस्तर में शाम ढलते ही छा जाता था डर वहीं से अमित शाह ने क्यों किया ‘नक्सल मुक्त भारत’ का ऐलान

Chhattisgarh News |

कभी जिस बस्तर का नाम सुनते ही लोगों के मन में गोलियों, बारूदी सुरंगों और नक्सली हमलों की तस्वीर उभरती थी, वहीं से अब केंद्र सरकार ने ‘नक्सल मुक्त भारत’ का दावा किया है। केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah ने छत्तीसगढ़ के बस्तर में बड़ा ऐलान करते हुए कहा कि देश अब लाल आतंक की छाया से बाहर निकल चुका है।

यह सिर्फ एक सरकारी घोषणा नहीं थी। इसके पीछे एक बड़ा राजनीतिक और प्रतीकात्मक संदेश भी छिपा था। सरकार ने जानबूझकर उसी बस्तर को चुना, जो कभी देश में नक्सल हिंसा का सबसे बड़ा चेहरा माना जाता था। बस्तर में आयोजित कार्यक्रम के जरिए केंद्र ने यह दिखाने की कोशिश की कि अब यह इलाका संघर्ष नहीं, बल्कि विकास और बदलाव की नई कहानी लिखेगा।

बस्तर ही क्यों बना इस ऐलान का केंद्र?

बस्तर दशकों तक नक्सल गतिविधियों का सबसे मजबूत गढ़ रहा। यहां कई बड़े हमले हुए, जिनमें सुरक्षा बलों और आम नागरिकों की बड़ी संख्या में जान गई।
6 अप्रैल 2010 का दंतेवाड़ा हमला आज भी देश के सबसे भयावह नक्सली हमलों में गिना जाता है, जब CRPF के 76 जवान शहीद हुए थे। लंबे समय तक यहां हालात ऐसे रहे कि शाम के बाद गांवों और सड़कों पर सन्नाटा छा जाता था। ऐसे इलाके से ‘नक्सल मुक्त भारत’ का ऐलान करना सरकार के लिए सिर्फ सुरक्षा सफलता दिखाना नहीं, बल्कि मनोवैज्ञानिक जीत का संदेश देना भी था।

‘असल आजादी अब मिली’

अपने संबोधन में अमित शाह ने कहा कि देश को भले 1947 में आजादी मिल गई थी, लेकिन बस्तर ने “सच्ची आजादी” अब महसूस की है। उन्होंने कहा कि छह दशकों तक इस क्षेत्र ने हिंसा, आर्थिक पिछड़ेपन और सामाजिक अस्थिरता का बोझ उठाया। सरकार अब बस्तर को उस दौर से बाहर निकालकर नई पहचान देना चाहती है। यह बयान सिर्फ सुरक्षा अभियान की सफलता नहीं, बल्कि उस राजनीतिक नैरेटिव का हिस्सा भी माना जा रहा है जिसमें केंद्र सरकार आंतरिक सुरक्षा को विकास मॉडल से जोड़कर पेश कर रही है।

सुरक्षा कैंप अब बनेंगे सेवा केंद्र

सरकार ने बस्तर के लिए नई विकास रणनीति का भी ऐलान किया है। गृह मंत्री ने कहा कि अब सुरक्षा बलों के कैंपों को धीरे-धीरे जन सेवा केंद्रों में बदला जाएगा। इन केंद्रों पर बैंकिंग, आधार, सरकारी योजनाएं और डिजिटल सेवाएं उपलब्ध कराई जाएंगी। यानी जहां पहले बंदूकें और सुरक्षा चौकियां दिखती थीं, वहां अब प्रशासन और विकास की मौजूदगी दिखाई जाएगी। सरकार का मानना है कि सिर्फ सैन्य कार्रवाई से नक्सलवाद खत्म नहीं होता। लोगों तक सड़क, शिक्षा, इंटरनेट और रोजगार पहुंचाना भी उतना ही जरूरी है।

आंकड़ों के जरिए सरकार का दावा

केंद्र सरकार के मुताबिक, 2019 के बाद नक्सल विरोधी अभियान में तेजी लाई गई। खासकर छत्तीसगढ़ में भाजपा सरकार बनने के बाद ऑपरेशन और आक्रामक हुए। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, 2024 में 224 नक्सली मारे गए, जबकि 2025 में यह संख्या करीब 400 तक पहुंच गई। पिछले दस वर्षों में 10 हजार से ज्यादा नक्सलियों के सरेंडर करने का दावा भी किया गया है। हालांकि सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि सिर्फ मुठभेड़ों के आंकड़ों से स्थिति का पूरा आकलन नहीं किया जा सकता। असली चुनौती यह होगी कि क्या बस्तर में स्थायी विकास और भरोसे का माहौल बन पाता है या नहीं।

अब बस्तर की नई पहचान गढ़ने की कोशिश

सरकार अब बस्तर को सिर्फ सुरक्षा चुनौती के तौर पर नहीं, बल्कि निवेश और पर्यटन की संभावनाओं वाले क्षेत्र के रूप में पेश करना चाहती है। पिछले कुछ वर्षों में यहां सड़क, मोबाइल नेटवर्क, स्कूल, बैंकिंग और स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार बढ़ा है। सरकार का दावा है कि नक्सलवाद कम होने के बाद निजी निवेश और रोजगार के नए अवसर खुलेंगे। बस्तर में केंद्रीय क्षेत्रीय परिषद की बैठक आयोजित करना भी इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। जिस जमीन को कभी संघर्ष का प्रतीक कहा जाता था, अब वहीं से ‘न्यू इंडिया’ का संदेश देने की कोशिश की जा रही है।

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