पीएम मोदी का नॉर्वे दौरा सिर्फ कूटनीतिक नहीं बल्कि ऊर्जा और व्यापार रणनीति से भी जुड़ा है। जानिए कैसे तेल और गैस ने नॉर्वे को दुनिया के सबसे खुशहाल देशों में शामिल कर दिया।
यूरोप का छोटा सा देश नॉर्वे एक बार फिर वैश्विक राजनीति और ऊर्जा रणनीति के केंद्र में आ गया है। पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और तेल आपूर्ति पर असर के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का ओस्लो दौरा कई मायनों में अहम माना जा रहा है। आज दुनिया के सबसे खुशहाल देशों में गिने जाने वाले नॉर्वे की कहानी सिर्फ विकास की नहीं, बल्कि प्राकृतिक संसाधनों के सही इस्तेमाल की भी मिसाल है।
1970 के दशक में समुद्र के नीचे मिले तेल और गैस ने नार्वे देश की अर्थव्यवस्था पूरी तरह बदल दी। अब जब भारत ऊर्जा सुरक्षा और नए आर्थिक साझेदारों की तलाश में है, तब नॉर्वे के साथ बढ़ती नजदीकियां रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही हैं।
43 साल बाद भारतीय प्रधानमंत्री का नॉर्वे दौरा
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी नॉर्वे की राजधानी ओस्लो पहुंच चुके हैं, जहां वह तीसरे भारत-नॉर्डिक सम्मेलन में हिस्सा ले रहे हैं। यह पिछले चार दशकों में किसी भारतीय प्रधानमंत्री की पहली द्विपक्षीय नॉर्वे यात्रा है। इस दौरान पीएम मोदी नॉर्वे के प्रधानमंत्री जोनास गहर स्टोर के साथ व्यापार, ऊर्जा, ग्रीन टेक्नोलॉजी और निवेश जैसे मुद्दों पर चर्चा करेंगे। भारतीय राजनयिकों के मुताबिक यह दौरा ऐसे समय हो रहा है जब दुनिया ऊर्जा अस्थिरता और भू-राजनीतिक तनाव के दौर से गुजर रही है।
तेल और गैस ने बदली नॉर्वे की तस्वीर
नॉर्वे कभी यूरोप का एक सामान्य समुद्री देश माना जाता था, लेकिन 1970 के दशक में उत्तरी सागर में तेल और प्राकृतिक गैस के बड़े भंडार मिलने के बाद इसकी अर्थव्यवस्था ने जबरदस्त छलांग लगाई। आज नॉर्वे दुनिया के प्रमुख पेट्रोलियम निर्यातकों में शामिल है। तेल और गैस से हुई कमाई को देश ने केवल राजस्व तक सीमित नहीं रखा, बल्कि शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक सुरक्षा जैसी योजनाओं में बड़े स्तर पर निवेश किया। इसी मॉडल की वजह से नॉर्वे लगातार विश्व खुशहाली सूचकांक और मानव विकास सूचकांक में शीर्ष देशों में बना हुआ है।
भारत के लिए क्यों अहम हो गया नॉर्वे
पश्चिम एशिया में अमेरिका-ईरान तनाव और होर्मुज स्ट्रेट से प्रभावित सप्लाई के कारण भारत वैकल्पिक ऊर्जा साझेदारों पर फोकस बढ़ा रहा है। नॉर्वे तेल और प्राकृतिक गैस का बड़ा निर्यातक देश है। ऐसे में भारत के लिए यह साझेदारी सिर्फ व्यापार नहीं बल्कि ऊर्जा सुरक्षा का भी हिस्सा बनती जा रही है। इसके अलावा दोनों देश ग्रीन हाइड्रोजन, ऑफशोर विंड एनर्जी, बैटरी टेक्नोलॉजी और कार्बन कैप्चर जैसे भविष्य के सेक्टरों में भी सहयोग बढ़ाने पर काम कर रहे हैं।
EFTA-TEPA समझौते से खुलेंगे नए रास्ते
भारत और यूरोपीय मुक्त व्यापार संघ यानी EFTA के बीच हुआ TEPA समझौता अब लागू हो चुका है। इसमें नॉर्वे समेत चार यूरोपीय देश शामिल हैं। इस समझौते के तहत अगले 15 वर्षों में भारत में बड़े निवेश और लाखों रोजगार अवसर पैदा होने की संभावना जताई जा रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह समझौता भारत को यूरोप के हाई-टेक और ग्रीन इंडस्ट्री नेटवर्क से जोड़ने में मदद करेगा।
छोटा देश, लेकिन वैश्विक प्रभाव बड़ा
करीब 56 लाख आबादी वाला नॉर्वे क्षेत्रफल में बड़ा लेकिन जनसंख्या के लिहाज से छोटा देश है। इसके बावजूद मजबूत अर्थव्यवस्था, कम बेरोजगारी और उच्च जीवन स्तर ने इसे दुनिया के सबसे विकसित देशों में शामिल कर दिया है। नॉर्वे का मॉडल इस बात की मिसाल माना जाता है कि प्राकृतिक संसाधनों का संतुलित उपयोग किसी देश की सामाजिक और आर्थिक तस्वीर पूरी तरह बदल सकता है। अब भारत और नॉर्वे के रिश्ते सिर्फ कूटनीति तक सीमित नहीं रहे, बल्कि ऊर्जा, तकनीक और भविष्य की अर्थव्यवस्था के बड़े साझेदारी मॉडल की ओर बढ़ते दिखाई दे रहे हैं।