पश्चिम बंगाल में चुनावी हार के बाद TMC के भीतर असंतोष खुलकर सामने आने लगा है। ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व में उभरे बागी गुट के दावों ने पार्टी की अंदरूनी राजनीति को नई दिशा दे दी है।
पश्चिम बंगाल की राजनीति में इस समय मुकाबला सिर्फ सत्ता और विपक्ष के बीच नहीं, बल्कि तृणमूल कांग्रेस के भीतर भी दिखाई दे रहा है। चुनावी झटके के बाद पार्टी में असंतोष की आवाजें तेज हुई हैं और अब कुछ नेता खुलकर नेतृत्व पर सवाल उठाने लगे हैं। इस पूरे घटनाक्रम के केंद्र में ऋतब्रत बनर्जी का नाम है।
कभी पार्टी नेतृत्व के भरोसेमंद चेहरों में गिने जाने वाले ऋतब्रत अब ऐसे गुट का चेहरा बनकर उभरे हैं जो संगठन के भीतर बड़े बदलाव की मांग कर रहा है। स्थिति इसलिए भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि बागी खेमे की गतिविधियों ने विधानसभा में संभावित शक्ति संतुलन को लेकर नई चर्चाएं शुरू कर दी हैं।
छात्र राजनीति से संसद तक का सफर
ऋतब्रत बनर्जी का राजनीतिक सफर छात्र राजनीति से शुरू हुआ था। उन्होंने वामपंथी छात्र संगठन एसएफआई के जरिए सक्रिय राजनीति में कदम रखा और बाद में तृणमूल कांग्रेस का हिस्सा बने। पार्टी में शामिल होने के बाद उनका कद लगातार बढ़ता गया। उन्हें संगठनात्मक जिम्मेदारियां मिलीं और बाद में राज्यसभा भेजा गया। इसके बाद उन्होंने विधानसभा चुनाव भी जीता और पार्टी के प्रमुख नेताओं में शामिल हो गए। यही वजह है कि उनकी बगावत को सामान्य असहमति नहीं बल्कि संगठन के भीतर उभरती गंभीर चुनौती के रूप में देखा जा रहा है।
समीक्षा बैठक से बढ़ा असंतोष
चुनावी नतीजों के बाद हुई समीक्षा बैठकों में पार्टी की रणनीति और नेतृत्व को लेकर कई सवाल उठे। सूत्रों के अनुसार कई नेताओं ने चुनावी हार के कारणों पर खुलकर चर्चा की और कुछ फैसलों पर असहमति भी जताई। इसी दौरान ऋतब्रत बनर्जी ने कुछ स्थानीय नेताओं और संगठनात्मक फैसलों को लेकर सवाल खड़े किए। इन मुद्दों पर स्पष्ट जवाब नहीं मिलने से असंतोष और बढ़ता गया। राजनीतिक जानकार मानते हैं कि चुनावी हार के बाद दबे हुए मतभेद अब खुलकर सामने आने लगे हैं।
जाली हस्ताक्षर विवाद ने बढ़ाया टकराव
विवाद उस समय और गहरा गया जब ऋतब्रत बनर्जी और संदीपान साहा ने दावा किया कि पार्टी की ओर से भेजे गए एक पत्र में उनके हस्ताक्षर कथित तौर पर गलत तरीके से इस्तेमाल किए गए। दोनों नेताओं ने इस मामले को विधानसभा अध्यक्ष के सामने उठाया। इसके बाद पार्टी नेतृत्व ने कड़ा रुख अपनाते हुए दोनों नेताओं के खिलाफ कार्रवाई की। यहीं से बागी खेमे की गतिविधियां तेज हुईं और कई विधायकों के संपर्क में होने की खबरें सामने आने लगीं।
विधायकों की संख्या को लेकर बड़ा दावा
बागी गुट से जुड़े नेताओं का दावा है कि उनके साथ बड़ी संख्या में विधायक संपर्क में हैं। इसी आधार पर वे संगठन के भीतर अपनी वैधता साबित करने की कोशिश कर रहे हैं। दावा किया जा रहा है कि विधानसभा में अलग पहचान और नेतृत्व को लेकर जल्द औपचारिक कदम उठाए जा सकते हैं। हालांकि इन दावों की आधिकारिक पुष्टि अभी नहीं हुई है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि संख्या बल को लेकर किए जा रहे दावे सही साबित होते हैं, तो पार्टी के भीतर शक्ति संतुलन पर असर पड़ सकता है।
अभिषेक बनर्जी की भूमिका पर उठे सवाल
बागी नेताओं का एक वर्ग चुनावी हार के लिए संगठनात्मक फैसलों और चुनाव प्रबंधन को जिम्मेदार ठहरा रहा है। इसी क्रम में अभिषेक बनर्जी की भूमिका पर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। नेताओं का कहना है कि चुनाव अभियान के दौरान लिए गए कुछ फैसलों की समीक्षा जरूरी है। वहीं पार्टी का आधिकारिक नेतृत्व अब तक इन आरोपों पर सार्वजनिक रूप से विस्तृत प्रतिक्रिया देने से बचता नजर आया है।
बंगाल की राजनीति में आगे क्या होगा, यह आने वाले दिनों में स्पष्ट होगा, लेकिन इतना तय है कि तृणमूल कांग्रेस के भीतर चल रही यह खींचतान अब सिर्फ संगठनात्मक विवाद नहीं रह गई है। इसका असर विधानसभा की राजनीति से लेकर विपक्ष की रणनीति तक दिखाई दे सकता है।