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सिनेमा में राष्ट्रवाद पर शशांक दुबे की राय

क्या सच में राष्ट्रवादी हो रहा है सिनेमा? शशांक दुबे ने खोलकर रख दी पूरी तस्वीर

वरिष्ठ व्यंगकार शशांक दुबे ने बताया सिनेमा में बढ़ते राष्ट्रवाद, बॉक्स ऑफिस ट्रेंड और दर्शकों के बदलते स्वाद का पूरा विश्लेषण।


 क्या सच में राष्ट्रवादी हो रहा है सिनेमा शशांक दुबे ने खोलकर रख दी पूरी तस्वीर

 हिंदी सिनेमा में इन दिनों राष्ट्रवाद एक बड़ा विषय बनकर उभरा है। लगातार ऐसी फिल्में सामने आ रही हैं जिनमें देशभक्ति, राजनीतिक संदर्भ और ऐतिहासिक घटनाएं प्रमुखता से दिखाई जा रही हैं। लेकिन क्या यह बदलाव अचानक आया है या इसके पीछे कोई लंबी प्रक्रिया काम कर रही है? इसी मुद्दे पर स्वदेश ने वरिष्ठ व्यंगकार और फिल्म समीक्षक शशांक दुबे से खास बातचीत की।

वीडियो में देखिए पूरा साक्षात्कार- 

ये बदलाव अचानक नहीं, प्रतिक्रिया है

शशांक दुबे का साफ कहना है सिनेमा में जो राष्ट्रवादी रुझान दिख रहा है, वह अचानक पैदा नहीं हुआ। उनके मुताबिक, बरसों तक एक अलग तरह की विचारधारा का सिनेमा चलता रहा। अब जो हो रहा है, उसे आप उसी की प्रतिक्रिया मान सकते हैं। यानी, यह बदलाव धीरे-धीरे पनपा और अब खुलकर सामने आ रहा है।

ट्रेंड या बॉक्स ऑफिस का खेल?

दरअसल, सिनेमा सिर्फ विचारधारा नहीं, एक बड़ा व्यापार भी है। दुबे कहते हैं, जहां फिल्में हिट होती हैं, वहीं इंडस्ट्री का रुख मुड़ जाता है। हाल के वर्षों में देशभक्ति से जुड़ी कई फिल्मों को सफलता मिली। ऐसे में फिल्ममेकर उसी फॉर्मूले को अपनाने लगे। लेकिन वे यह भी चेतावनी देते हैं कि अगर इसे सिर्फ फॉर्मूला बना लिया गया, तो यह ज्यादा दिन नहीं चलेगा।

सेंसिटिव बनाम आक्रामक राष्ट्रवाद

यही सवाल सबसे दिलचस्प है क्या हर राष्ट्रवादी फिल्म एक जैसी होती है? दुबे इसका जवाब उदाहरण देकर समझाते हैं। उनके अनुसार, कुछ फिल्में भावनात्मक और संतुलित तरीके से राष्ट्रवाद दिखाती हैं, जबकि कुछ आक्रामक अंदाज अपनाती हैं। वे मानते हैं कि सेंसिटिव अप्रोच वाली फिल्में ज्यादा प्रभावी होती हैं, क्योंकि उनमें कहानी और मानवीय पहलू मजबूत होता है।  वे कहते हैं सिर्फ आक्रामकता से फिल्म की गुणवत्ता प्रभावित हो जाती है।

क्या सिनेमा समाज को बदलता है?

अब समझिए एक बड़ा सवाल क्या फिल्मों से समाज बदलता है? इस पर दुबे का नजरिया थोड़ा अलग है। उनका मानना है कि सिनेमा समाज का आईना है, न कि उसे पूरी तरह बदलने वाला माध्यम। फिल्म देखकर लोग सड़क पर वैसा करने नहीं लगते। सिनेमा सिर्फ भावनाओं और सोच को दिखाता है, वे स्पष्ट करते हैं।

दर्शक अब पहले जैसे नहीं रहे

आज का दर्शक पहले से कहीं ज्यादा जागरूक हो गया है। दुबे बताते हैं कि अब लोग कंटेंट को क्रिटिकली देखते हैं। यही वजह है कि बड़ी-बड़ी फिल्में भी फ्लॉप हो रही हैं। करीब 90-95% फिल्में आज असफल हो रही हैं। लोग वही देखना चाहते हैं जिसमें नई बात हो, वे कहते हैं। 

साउथ सिनेमा क्यों आगे निकल गया?

बात यहां साउथ फिल्मों तक भी पहुंचती है। दुबे मानते हैं कि साउथ सिनेमा की सफलता का एक बड़ा कारण उसकी साफ-सुथरी कहानी और संवाद हैं। वहीं हिंदी कंटेंट में कई बार भाषा और प्रस्तुति दर्शकों से कनेक्ट नहीं कर पाती—खासकर ओटीटी पर, जहां अंग्रेजी का ज्यादा इस्तेमाल देखने को मिलता है।

प्रोपेगेंडा बनाम देशभक्ति पुराना विवाद

सिनेमा पर प्रोपेगेंडा के आरोप भी नए नहीं हैं। दुबे याद दिलाते हैं कि पहले भी फिल्मों में राजनीतिक या वैचारिक संदेश होते थे, लेकिन तब उन्हें अलग नजर से देखा जाता था। वे कहते हैं आज जिसे प्रोपेगेंडा कहा जा रहा है, पहले उसे लोग देशभक्ति मानते थे 

आगे कैसा होगा सिनेमा?

आने वाले समय को लेकर उनका आकलन साफ है मुख्यधारा का सिनेमा हमेशा कमर्शियल ही रहेगा। भले ही विषय बदलते रहें, लेकिन अंत में फिल्म इंडस्ट्री का फोकस कमाई पर ही रहेगा। 300-400 करोड़ की फिल्म में सबसे पहले यही देखा जाएगा कि पैसा कैसे वापस आए, वे साफ तौर पर कहते हैं।

रामायण जैसी फिल्मों पर क्या उम्मीद?

हाल ही में धार्मिक और पौराणिक फिल्मों पर भी चर्चा तेज हुई है। दुबे मानते हैं कि पिछली कुछ फिल्मों से दर्शकों को निराशा मिली, लेकिन आने वाले प्रोजेक्ट्स में सुधार की उम्मीद है। हालांकि वे यह भी जोड़ते हैं कि पुराने क्लासिक कंटेंट—खासकर टीवी पर दिखी रामायण से तुलना होना तय है, और वही सबसे बड़ी चुनौती होगी। 

इस पूरी बातचीत से एक बात साफ निकलकर आती है सिनेमा बदल रहा है, लेकिन दर्शक उससे भी तेजी से बदल रहे हैं। और शायद यही असली कहानी है।

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