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Anil Ambani Loan Fraud Case

अनिल अंबानी ग्रुप पर ₹150 करोड़ लोन केस में शिकंजा, फर्जी दस्तावेज और फंड डायवर्जन के आरोप

अनिल अंबानी ग्रुप से जुड़ी कंपनियों पर ₹150 करोड़ लोन धोखाधड़ी का केस दर्ज हुआ है। आरोप है कि फर्जी दस्तावेजों के जरिए लोन लेकर रकम दूसरी कंपनियों में ट्रांसफर की गई।


 अनिल अंबानी ग्रुप पर ₹150 करोड़ लोन केस में शिकंजा फर्जी दस्तावेज और फंड डायवर्जन के आरोप

Anil Ambani news |

अनिल अंबानी ग्रुप से जुड़ी कंपनियां एक बार फिर जांच एजेंसियों के निशाने पर आ गई हैं। मुंबई पुलिस की इकोनॉमिक ऑफेंसेज विंग (EOW) ने ₹150 करोड़ के कथित लोन फ्रॉड मामले में नई FIR दर्ज की है। आरोप है कि बैंक से फर्जी दस्तावेजों और भ्रामक जानकारी के जरिए बड़ा लोन हासिल किया गया। बाद में वही रकम ग्रुप से जुड़ी दूसरी कंपनियों में ट्रांसफर कर दी गई और लोन का भुगतान नहीं किया गया।

यह कार्रवाई एक्सिस बैंक की शिकायत के बाद हुई है। मामले ने कॉरपोरेट गवर्नेंस, बैंकिंग निगरानी और लोन डाइवर्जन पर फिर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं।

एक्सिस बैंक की शिकायत पर दर्ज हुई FIR

EOW सूत्रों के अनुसार, यह मामला एक्सिस बैंक के वाइस प्रेसिडेंट प्रकाश प्रभाकर राव की शिकायत पर दर्ज किया गया है। शिकायत में आरोप लगाया गया कि कंपनियों ने बैंक को वित्तीय नुकसान पहुंचाने की साजिश रची। मुंबई के कफ परेड पुलिस स्टेशन में दर्ज FIR में अनिल धीरुभाई अंबानी ग्रुप यानी ADAG से जुड़ी कंपनियों के तत्कालीन निदेशकों और अधिकारियों को आरोपी बनाया गया है। यह पहली बार नहीं है जब ग्रुप पर इस तरह के आरोप लगे हों। इससे पहले मार्च 2026 में भी इसी तरह के आरोपों पर एक और FIR दर्ज की गई थी।

कैसे हुआ कथित लोन डाइवर्जन

जांच एजेंसियों के अनुसार, जनवरी 2010 से नवंबर 2019 के बीच यह पूरा मामला सामने आया। आरोप है कि रिलायंस होम फाइनेंस लिमिटेड (RHFL) के तत्कालीन अधिकारियों और लाभार्थी कंपनियों के निदेशकों ने मिलकर बैंक से लोन हासिल किया। पुलिस सूत्रों का दावा है कि लोन मंजूरी के लिए बैंक में फर्जी दस्तावेज जमा किए गए। कंपनी की वित्तीय स्थिति को लेकर भी गलत और भ्रामक जानकारियां दी गईं।  जब बैंक ने ₹150 करोड़ का लोन जारी कर दिया, तब रकम को तय कारोबारी इस्तेमाल की बजाय दूसरी संबंधित कंपनियों के खातों में भेज दिया गया। बाद में लोन डिफॉल्ट हो गया।

बैंकिंग सिस्टम पर फिर उठे सवाल

इस मामले ने एक बार फिर बड़े कॉरपोरेट लोन की मॉनिटरिंग पर सवाल खड़े कर दिए हैं। विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर शुरुआती स्तर पर वित्तीय दस्तावेजों की गहन जांच होती, तो इस तरह के मामलों को रोका जा सकता था। लोन डाइवर्जन के मामलों में अक्सर बैंकिंग सिस्टम की निगरानी क्षमता पर बहस होती रही है। खासतौर पर तब, जब रकम सहयोगी कंपनियों या ग्रुप संस्थाओं में ट्रांसफर की जाती है। वित्तीय अपराधों के ऐसे मामलों का असर केवल बैंक तक सीमित नहीं रहता। इससे निवेशकों का भरोसा, शेयर बाजार की धारणा और कॉरपोरेट सेक्टर की विश्वसनीयता भी प्रभावित होती है।

मार्च में भी हुई थी कार्रवाई

EOW ने इसी साल 12 मार्च को भी अनिल अंबानी ग्रुप से जुड़ी कंपनियों के खिलाफ मामला दर्ज किया था। उस केस में भी एक्सिस बैंक की शिकायत के आधार पर जांच शुरू हुई थी। मार्च वाली शिकायत में भी आरोप था कि कंपनियों ने गलत जानकारियों के आधार पर वित्तीय फायदा उठाया। अब दूसरी FIR दर्ज होने के बाद जांच का दायरा और बढ़ सकता है। फिलहाल EOW मामले से जुड़े दस्तावेजों, बैंकिंग ट्रांजैक्शन और फंड फ्लो की जांच कर रही है। आने वाले दिनों में कई पूर्व अधिकारियों से पूछताछ भी हो सकती है।

क्या है EOW और लोन डाइवर्जन

इकोनॉमिक ऑफेंस विंग यानी EOW पुलिस की वह विशेष शाखा होती है, जो बड़े आर्थिक अपराधों की जांच करती है। इसमें बैंक फ्रॉड, कॉरपोरेट धोखाधड़ी, टैक्स चोरी और वित्तीय घोटाले जैसे मामले शामिल होते हैं। वहीं, लोन डाइवर्जन का मतलब है कि बैंक से किसी खास कारोबारी उद्देश्य के लिए लिया गया पैसा तय काम में इस्तेमाल न होकर दूसरी जगह ट्रांसफर कर दिया जाए। कई मामलों में रकम सहयोगी कंपनियों या निजी खातों में भेजी जाती है, जिससे बैंक का जोखिम बढ़ जाता है।

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