युवाओं को हिंदुत्व की शक्ति पहचानने की ज़रूरत

प्रमोद भार्गव

Update: 2026-01-06 03:50 GMT

डॉ.मोहन भागवत ने कहा, हमको जोड़ती है हिंदू पहचान

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शताब्दी यात्रा एक उत्तेजक वैचारिक यात्रा रही है। मनुष्य की शारीरिक खुराक रोटी, पानी और हर हाथ को रोजगार के बाद जो सर्वाधिक ज़रूरी है, वह है मानसिक-वैचारिक खुराक। इस खुराक में वे सभी अस्मिताएँ दर्ज हैं, जो किसी भी राष्ट्र के जीवंत रहने को प्रमाणित करती हैं। इसमें राष्ट्र की सीमाएं और उसके भीतर आलोड़ित धर्म एवं संस्कृति के वे मूल्य अंतर्निहित रहते हैं, जिनमें भाषा, वेशभूषा, खान-पान और रीति-रिवाज पारंपरिक रूप में गतिशील रहते हैं।

इन भारतीय अस्मितावादी मूल्यों पर सबसे पहला बड़ा प्रहार इस्लामी आक्रांताओं ने किया, जबकि दूसरा प्रहार अंग्रेज़ों ने। इन प्रहारों ने सनातन संस्कृति के उन सभी मूल्यों पर गहरा आघात किया, जो वैदिक काल से लेकर वर्तमान तक न केवल वर्चस्व बनाए हुए हैं, बल्कि आज भी अपनी संस्कृति के मूल स्रोतों से आंदोलित हो रहे हैं। सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के यही अक्षुण्ण मूल्य भारत की अखंडता के आधार-स्तंभ हैं।

इसी संदर्भ में विशिष्ट उपलब्धियां प्राप्त कर चुके युवाओं को भोपाल में संदेश देते हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने कहा कि, “विश्व सत्य नहीं, शक्ति की सुनता है। दुर्बल व्यक्ति सत्य भी बोले, तो उसे कोई नहीं सुनता। ताकतवर की बात सही-गलत का विचार किए बिना सभी सुनते हैं। अतएव हमारे मत, पंथ, संप्रदाय, भाषा और जाति भले ही अलग हों, लेकिन वह हिंदुत्व की पहचान ही है, जो हमें जोड़ती है। हमारी संस्कृति, धर्म और पूर्वज समान हैं।

वास्तव में यही समरस शक्ति हमें विश्व-शक्ति के रूप में स्थापित करने की सामर्थ्य रखती है। जैसे-जैसे हम इस गुरुत्वीय बल की एकरूपता में ढलते जा रहे हैं, वैश्विक स्तर पर हमारी शक्ति की स्वीकार्यता बढ़ती जा रही है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ आज अपनी शताब्दी यात्रा पर है। एक सदी की यह यात्रा केवल संगठन और उसके अनुषांगिक संगठनों के विस्तार या लोगों को कट्टर हिंदू बनाना नहीं है, बल्कि भारत में रहने वाले सभी जाति और धर्म समुदायों के बीच समावेशी सद्भाव विकसित करना है। यह यात्रा सामाजिक जीवन में रचनात्मक बदलाव के लिए राष्ट्रीय चेतना का पुनर्जागरण है।

यही वह भाव है, जिसका उद्घोष जी.एम. सैयद ने किया था और जिसे अब गुलाम नबी आज़ाद तथा बलूच नेता मीर यार आगे बढ़ा रहे हैं। इसी समावेशी भाव को पुरातत्वशास्त्री के.के. मोहम्मद ने समझते हुए, इस्लामिक कट्टरता का परिचय दिए बिना, अयोध्या के विवादित ढांचे के गर्भ में समाए अवशेषों को आक्रांताओं द्वारा तोड़े गए राम मंदिर का साक्ष्य बताया।

उनका मानना है कि हिंदू आस्था के स्रोत काशी की ज्ञानवापी मस्जिद और मथुरा की शाही ईदगाह हिंदुओं को सौंप दिए जाने चाहिए, क्योंकि इन स्थलों से मुस्लिमों की कोई धार्मिक भावना नहीं जुड़ी है। राष्ट्रपति ए.पी.जे. अब्दुल कलाम भी इसी समावेशी भाव के अनुगामी थे।

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