इतिहास कभी केवल तारीख़ों में दर्ज नहीं होता। वह कई बार एक मां की कांपती उंगलियों में, एक बहन की रुंधी हुई आवाज़ में और एक टूटे हुए परिवार की खामोशी में सांस लेता है। आपातकाल के वे काले दिन भी ऐसे ही थे। तब तानाशाही ने केवल संविधान की हत्या नहीं की थी, उसने घरों के दीपक बुझाए थे, मांओं की गोद सूनी की थी और बहनों की हंसी को हमेशा के लिए मौन में बदल दिया था।
ग्वालियर के सोड़ा का कुआं इलाके के एक घर में आज भी वह पीड़ा जीवित है। वहां आज भी एक नाम लिया जाता है तो आंखें भर आती हैं.सुबोध गोयल। जी हां, वही सुबोध, जिसने अपनी मां से कहा था
“मां, आपने बचपन में क्रांतिकारियों की गाथाएं सुनाकर मुझे जो सिखाया था, अब उस राह पर चलने से मुझे मत रोको।”
ग्वालियर के हुजरात थाने में उस दिन उस युवा को कपड़े उतरवाकर बर्फ की सिल्लियों पर जबरन लिटाया गया। लाठियों और बूटों से इतना पीटा गया कि पूरा शरीर नीला पड़ गया। सिर पर ऐसी चोट लगी कि कुछ ही महीनों में मानसिक संतुलन डगमगा गया। सात साल तक असहनीय पीड़ा भोगने के बाद आखिरकार उनकी सांसें थम गईं।
यह बताते हुए स्व. सुबोध गोयल की बहन श्रीमती सरोज अग्रवाल का गला भर आता है और आंखों से आंसुओं की धार बह निकलती है। शब्द रुक-रुक कर निकलते हैं, मानो हर वाक्य के साथ बीते वर्षों का बोझ उतर रहा हो। वे कहती हैं कि आपातकाल के बुरे दिन हमारा परिवार कभी भूल नहीं पाया, क्योंकि संविधान की हत्या के साथ ही उसने हम पांच बहनों के इकलौते भाई को भी हमसे छीन लिया।
ब्रह्मकुमारी सुधा गोयल, समाजसेवी सुमन अग्रवाल, सरोज अग्रवाल, ऊषा गुप्ता और शशि गोयल पांच बहनें थीं और उन सबके सिर पर छाया एक ही आकाश था, उनका बड़ा भाई सुबोध गोयल। वही परिवार का दीपक, वही संबल, वही भरोसा।
सुबोध गोयल, जिन्हें घर में प्यार से मुन्ना कहा जाता था, उस समय मात्र 21 वर्ष के थे। वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के ग्वालियर नगर कार्यवाह थे और बादलगढ़ स्थित सिंधिया एजुकेशन सोसायटी स्कूल में शिक्षक के रूप में पढ़ाते थे। आपातकाल के दौरान जब अखबारों पर पहरा बैठा दिया गया, सच बोलना अपराध बना दिया गया, तब सुबोध चुप नहीं बैठे। वे गुप्त रूप से पर्चे बांटते थे, रात के अंधेरे में साथियों के साथ दीवारों पर लेखन करते थे, पोस्टर चिपकाते थे।
संघ के वरिष्ठ अधिकारियों की योजना के अनुसार उन्होंने तय किया कि अब खुला सत्याग्रह किया जाएगा तत्कालीन मुख्यमंत्री प्रकाशचंद्र सेठी के सामने।
उस दिन वे घर आए। मां श्रीमती प्रभावती गोयल के चरण छुए। स्वर में दृढ़ता थी, आंखों में चमक। कहा-
“मां, आशीर्वाद दो। आपका बेटा आज भगत सिंह की तरह भारत माता को तानाशाही से मुक्त कराने जा रहा है।”
मां की ममता टूट पड़ी। आंसू थामते हुए बोलीं- “बेटा, तू पांच बहनों का इकलौता भाई है। परिवार का दीपक है। इस आग में क्यों कूद रहा है?”
सुबोध ने मां को वही याद दिलाया जो हर मां अपने बच्चे को सिखाती है। कहा- “मां, आपने ही तो मुझे भगत सिंह, चंद्रशेखर आज़ाद, राजगुरु, वीर शिवाजी और महाराणा प्रताप की गाथाएं सुनाई थीं। आपने ही तो सिखाया था कि अन्याय के सामने झुकना नहीं चाहिए। हर मां चाहती है कि देश में भगत सिंह पैदा हों, लेकिन अपने घर में नहीं—पड़ोसी के घर में। मां, आज आपको अपने घर से भगत सिंह देना होगा।
यह कहकर वे सत्याग्रह की राह पर चल दिए। पीछे मां और बड़ी बहन सुधा गोयल भी दौड़ पड़ीं।
आठ दिसंबर 1976
स्थान-ग्वालियर का तानसेन संगीत समारोह।
मुख्यमंत्री प्रकाशचंद्र सेठी सबसे आगे बैठे थे। सुबोध गोयल अपने साथी संतोष पांडेय के साथ पहुंचे। अचानक दोनों मंच पर चढ़ गए। नारे गूंज उठे.
“आपातकाल मुर्दाबाद”,
“इंदिरा गांधी मुर्दाबाद”,
“तानाशाही नहीं चलेगी”,
“भारत माता की जय”,
“वंदे मातरम”,
“इंकलाब ज़िंदाबाद।”
मुख्यमंत्री तिलमिला उठे। पुलिस को आदेश मिला। दोनों को आनन-फानन में पकड़कर हुजरात थाने ले जाया गया। रास्ते भर नारे जारी रहे। यह पूरा दृश्य मां प्रभावती गोयल और बड़ी बहन सुधा गोयल ने अपनी आंखों से देखा। दोनों समझ गईं कि अब क्या होने वाला है। वे रोती हुई पैदल घर लौट आईं।
हुजरात थाने में जो हुआ, वह मानवता पर कलंक था। करंट लगाए गए। पैर बांधकर उल्टा लटकाया गया।