वेनेजुएला संकट:अंतरराष्ट्रीय कानून को कुचलती महाशक्तियां

गिरीश उपाध्याय

Update: 2026-01-06 04:45 GMT

बड़ा सवाल! क्या अंतरराष्ट्रीय कानून सभी के लिए समान हैं या केवल कमजोर देशों पर ही लागू होते हैं…

वेनेजुएला का संकट केवल एक देश की आर्थिक या राजनीतिक विफलता की कहानी नहीं है। यह दरअसल संयुक्त राष्ट्र चार्टर, अंतरराष्ट्रीय कानून और महाशक्तियों के वास्तविक आचरण के बीच के टकराव को उजागर करने वाला उदाहरण है। अमेरिका द्वारा वेनेजुएला पर लगाए गए आर्थिक प्रतिबंध, सत्ता परिवर्तन का खुला समर्थन और सैन्य हस्तक्षेप की धमकी ने पूरी दुनिया के सामने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या अंतरराष्ट्रीय कानून सभी के लिए समान हैं या वे केवल कमजोर देशों पर ही लागू होते हैं।

संयुक्त राष्ट्र की हिलती बुनियाद

संयुक्त राष्ट्र चार्टर की आत्मा ‘राज्य की संप्रभु समानता’ में निहित है। चार्टर का अनुच्छेद 2(1) स्पष्ट करता है कि हर राष्ट्र चाहे वह छोटा हो या बड़ा संप्रभु रूप से समान है। इसके बावजूद अमेरिका द्वारा वेनेजुएला के निर्वाचित शासन की वैधता पर सवाल उठाना और विपक्षी नेतृत्व को राष्ट्रपति के रूप में मान्यता देना इस मूल सिद्धांत को कमजोर करता है। यह केवल कूटनीतिक असहमति नहीं, बल्कि यह संदेश है कि संप्रभुता तब तक मान्य है, जब तक वह महाशक्ति के हितों से मेल खाती है।

आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप

संयुक्त राष्ट्र चार्टर का अनुच्छेद 2(7) किसी भी राज्य के घरेलू मामलों में हस्तक्षेप को निषिद्ध करता है। लेकिन वेनेजुएला के संदर्भ में अमेरिका द्वारा चुनाव प्रक्रिया पर टिप्पणी करना, सत्ता परिवर्तन की मांग करना और शासन को अवैध ठहराने की कोशिश करना इस प्रावधान की भावना के विपरीत है। राजनीतिक दबाव और आर्थिक घेराबंदी आज हस्तक्षेप के प्रभावी औजार बन चुके हैं।

बल प्रयोग और उसकी धमकी

अनुच्छेद 2(4) बल प्रयोग और उसकी धमकी दोनों पर रोक लगाता है। वेनेजुएला के मामले में अमेरिकी नेतृत्व समय-समय पर यह कहता रहा कि “सभी विकल्प खुले हैं।” अब यह स्पष्ट हो गया है कि ये केवल बयान नहीं थे, बल्कि खतरनाक इरादों की भूमिका थी। अंतरराष्ट्रीय कानून में धमकी भी उतनी ही गंभीर मानी जाती है जितना वास्तविक बल प्रयोग। इस दृष्टि से अमेरिका का रवैया संयुक्त राष्ट्र चार्टर की उस ‘रेड लाइन’ को पार करता है, जिसे छूने तक की मनाही है।

अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में बाध्यकारी प्रतिबंध लगाने का अधिकार केवल संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद को है, वह भी चार्टर के अध्याय-7 के अंतर्गत। अमेरिका द्वारा लगाए गए एकतरफा आर्थिक प्रतिबंध इस प्रक्रिया से बाहर हैं। इन प्रतिबंधों का सबसे अधिक असर सरकार पर नहीं, बल्कि आम नागरिकों पर पड़ा है जो भोजन, दवाइयों और स्वास्थ्य सेवाओं की कमी से जूझ रहे हैं। यह सामूहिक दंड की स्थिति है, जिसे अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून स्वीकार नहीं करता।

सत्ता परिवर्तन की कोई अनुमति नहीं

अंतरराष्ट्रीय कानून में किसी भी देश में सत्ता परिवर्तन कराने का कोई वैधानिक आधार नहीं है। फिर भी वेनेजुएला में सत्ता परिवर्तन को लक्ष्य बनाकर की गई अमेरिकी कार्रवाई यह दर्शाती है कि व्यवहार में कानून की सीमाएँ ताकत के सामने बौनी हो जाती हैं। यह न केवल चार्टर की भावना के विरुद्ध है, बल्कि उस वैश्विक व्यवस्था को भी कमजोर करता है, जो विवादों के शांतिपूर्ण समाधान का दावा करती है।

यह पूरा परिदृश्य संयुक्त राष्ट्र की एक कड़वी सच्चाई को सामने लाता है। कानूनी रूप से मजबूत दिखने वाली यह संस्था राजनीतिक रूप से उतनी ही कमजोर है। इसकी शक्ति उतनी ही है, जितनी महाशक्तियाँ इसे देना चाहें। जब सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्य आमने-सामने होते हैं, तब अंतरराष्ट्रीय कानून बेमानी हो जाते हैं।

दरअसल, वेनेजुएला में अमेरिकी कार्रवाई को केवल वैचारिक या मानवीय दृष्टि से देखना पूरी तस्वीर नहीं दिखाता। यह मामला तेल, सत्ता, व्यापारिक प्रभुत्व और अंतरराष्ट्रीय कानून की सीमाओं के आक्रामक घालमेल का है जहां अंततः उसी की चलती है, जिसके हाथ में लाठी होती है।

अमेरिका का आरोप है कि राष्ट्रपति निकोलस मादुरो मादक पदार्थ तस्करी और अंतरराष्ट्रीय अपराध नेटवर्क से जुड़े हैं और वेनेजुएला के तेल से होने वाली आय इन गतिविधियों में खप रही है। ट्रंप प्रशासन ने इसे लैटिन अमेरिका में अपराध के विरुद्ध निर्णायक प्रहार बताया, लेकिन अनेक देशों का मानना है कि यह एक तेल-संपन्न राष्ट्र पर नियंत्रण स्थापित करने का प्रयास है।

इससे पहले अमेरिका द्वारा कैरेबियन सागर में नौसैनिक नाकाबंदी, तेल टैंकरों की जब्ती और ऊर्जा प्रतिष्ठानों पर निगरानी से वेनेजुएला की अर्थव्यवस्था और विदेशी मुद्रा प्रवाह लगातार सिकुड़ता गया, जिसकी सीधी मार आम जनता पर पड़ी। रूस, चीन और ईरान ने इसे संप्रभुता का उल्लंघन बताते हुए कड़ी निंदा की है। आज वेनेजुएला केवल एक देश नहीं, बल्कि वैश्विक शक्तियों का युद्धक्षेत्र बन चुका है।

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