बांग्लादेश में हिंदुओं पर हमले, भारत में विपक्ष मौन

Update: 2026-01-08 04:06 GMT

बांग्लादेश में हिंदू अल्पसंख्यकों के खिलाफ बढ़ती हिंसा अब किसी एक घटना या स्थानीय अपराध की खबर नहीं रह गई है। यह एक सुनियोजित डर, लगातार टूटती सुरक्षा और राज्य की विफलता की कहानी बन चुकी है। महज 18 दिनों में 6 हिंदुओं की हत्याएं और वह भी खुले बाजारों, घरों और सार्वजनिक स्थलों पर, इस बात का संकेत है कि देश में अल्पसंख्यकों की पहचान ही उनके लिए खतरा बनती जा रही है। नरसिंदी के वारसिंदूर बाजार में किराना व्यापारी मणि चक्रवर्ती की हत्या हो या जशोर के कोपालिया बाजार में राणा प्रताप को मारी गई गोली, हर वार सीधा उस भरोसे पर है, जो लोकतंत्र और कानून-व्यवस्था पर टिका होता है। बांग्लादेश में लोकतंत्र और कानून व्यवस्था नाम की चीज अब बची ही नहीं है। इन हत्याओं का पैटर्न डरावना है।

कोई व्यक्तिगत रंजिश नहीं, कोई स्पष्ट विवाद नहीं बस पहचान। दीपूचंद्र दास को कथित ईशनिंदा के नाम पर पीट-पीटकर मार दिया गया। खोकनचंद्र दास को भीड़ ने पहले चाकू मारा, फिर आग लगा दी। बजेंद्र बिस्वास और राणा प्रताप को गोली मार दी गई। मणि चक्रवतीं अपनी दुकान पर बैठे थे, जहां रोजी रोटी चलती है, वहीं मौत आ गई। सवाल यह नहीं कि हत्यारे कौन थे, सवाल यह है कि उन्हें यह भरोसा कहां से मिला कि वे बच निकलेंगे? इस पूरी तस्वीर में सबसे चिंताजनक है वहां की सरकार की प्रतिक्रिया। बांग्लादेश सरकार के बयान आते हैं, संवेदनाएं जताई जाती हैं, जांच के आदेश दिए जाते हैं, लेकिन जमीन पर हिंदू समुदाय आज भी वही सवाल पूछ रह्य है कि 'क्या हम सुरक्षित हैं?' जब बाजार असुरक्षित हो जाए, तो समझ लीजिए समाज की धड़कन लड़खड़ा रही है।

लेकिन इस त्रासदी पर सिर्फ ढाका ही नहीं, दिल्ली भी कटघरे में है, खासतौर पर भारत का विपक्ष। बांग्लादेश में हिंदुओं की हत्या पर कांग्रेस और तमाम विपक्षी दलों की चुप्पी उतनी ही कर्कश है जितनी इन हत्याओं की खबरें। यहीं कांग्रेस, जो भारत में शरजील इमाम या खालिद उमर को जमानत न मिलने पर सरकार को लोकतंत्र का हत्यारा बताने लगती है, वहीं कांग्रेस बांग्लादेश में हिंदुओं के खून पर एक शब्द नहीं बोलती। यह चयनित नैतिकता नहीं तो और क्या है? यह विडंबना नहीं, बल्कि राजनीतिक पाखंड है कि बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों की हत्या पर कांग्रेस के वरिष्ठ नेता जयराम रमेश और केसी वेणुगोपाल प्रेस कॉन्फ्रेंस छोड़कर चले जाते हैं। सवाल सुनते ही मंब से उठ जाना, क्या यह स्वीकारोक्ति नहीं कि इस मुद्दे पर बोलना उनके राजनीतिक एजेंडे के अनुकूल नहीं? क्या मानवाधिकार सिर्फ कुछ नामों और कुछ समुदायों तक सीमित हैं? जब बात भारत में किसी एक समुदाय की होती है, तो विपक्ष अंतरराष्ट्रीय मंचों तक आवाज उठाता है। लेकिन पड़ोसी देश में हिंदुओं की हत्या पर वही विपक्ष आंतरिक मामला बताकर चुप्पी ओढ़ लेता है। यह दोहरा मापदंड न सिर्फ नैतिक रूप से गलत है, बल्कि भारत की वैश्विक भूमिका को भी कमजोर करता है। आज सवाल सिर्फ बांग्लादेश सरकार से नहीं है कि वह दोषियों को कब सजा देगी।

सवाल भारतीय राजनीति से भी है कि क्या हिंदू होना सीमा पार करते ही मानवाधिकार से बाहर हो जाता है? अगर बाजार में खून बहता रहेगा और संसद में चुप्पी छाई रहेगी, तो भरोसा सिर्फ बांग्लादेश के हिंदुओं का ही नहीं, लोकतांत्रिक मूल्यों का भी मरता जाएगा। अब वक्त बयानों का नहीं, स्पष्टता का है ढाका में सुरक्षा की स्पष्टता और दिल्ली में ईमानदारी की। क्योंकि जब पहचान ही अपराध बन जाए, तो चुप्पी भी अपराध मणि जाती है।

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