अनिश्चितता को स्वीकार कर उसके साथ जीने की तैयारी कर रही दुनिया
इक्कीसवीं सदी का तीसरा दशक मानव इतिहास के उन विरल कालखंडों में शामिल होता जा रहा है, जब युद्ध केवल सीमाओं पर लड़ी जाने वाली लड़ाइयों का नाम नहीं रह गया है। आज युद्ध शहरों की बिजली में है, बाजारों की कीमतों में है, इंटरनेट की गति में है, अनाज की बाली में है और बच्चों के भविष्य की अनिश्चितता में है। यह वह दौर है, जिसमें गोलियां भले ही कहीं दूर चल रही हों, लेकिन उनकी गूंज हर घर की दीवारों में सुनाई दे रही है।
जब वैश्विक सैन्य खर्च 2.72 ट्रिलियन डॉलर के ऐतिहासिक स्तर पर पहुंच जाता है, तो यह केवल हथियारों की खरीद नहीं होती, बल्कि उस भय का मूल्य होता है जो राष्ट्रों के मानस पर छाया हुआ है। यह आंकड़ा बताता है कि दुनिया शांति में निवेश नहीं कर रही, बल्कि अनिश्चितता को स्वीकार कर उसके साथ जीने की तैयारी कर रही है। अमेरिका, चीन और रूस जैसी महाशक्तियां अपने सैन्य बजट को ऐसे बढ़ा रही हैं, जैसे आने वाला समय सहयोग का नहीं, बल्कि टकराव का हो।
यह भी संयोग नहीं है कि एक ही वर्ष में 61 राज्य-आधारित संघर्ष दर्ज किए गए। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद पहली बार मानवता इतनी व्यापक रूप से हिंसा के घेरे में आई है। ये संघर्ष केवल सीमाओं को नहीं तोड़ते, बल्कि समाजों की नसों में जहर घोलते हैं। यूक्रेन की धरती पर गिरता हर मिसाइल का टुकड़ा यूरोप की ऊर्जा नीति को बदल देता है। गाजा की हर विस्फोटक रात पश्चिम एशिया के संतुलन को हिला देती है। अफ्रीका में उठती हर चिंगारी वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं में दरार पैदा करती है।
ग्लोबल पीस इंडेक्स का गिरता हुआ ग्राफ दरअसल मानव सभ्यता की अस्थिरता का मानचित्र है। जब सबसे अशांत क्षेत्र मध्य पूर्व और उत्तर अफ्रीका घोषित होते हैं और उसके बाद दक्षिण एशिया, तो यह केवल भूगोल नहीं, बल्कि भविष्य की चेतावनी होती है। भारत जैसे देश का 115वें स्थान पर होना यह दर्शाता है कि भले ही हम युद्ध के केंद्र में नहीं हैं, लेकिन उसकी छाया हमारे ऊपर भी है। सीमा तनाव, आर्थिक दबाव, सूचना युद्ध और कूटनीतिक उलझनें हमें भी उसी वैश्विक तूफान का हिस्सा बना चुकी हैं।
युद्ध का सबसे क्रूर चेहरा तब दिखता है, जब नागरिक उसके शिकार बनते हैं। यूक्रेन में हर महीने सैकड़ों निर्दोष लोग मारे जा रहे हैं और हजारों घायल हो रहे हैं। ये केवल आंकड़े नहीं हैं, ये उजड़े हुए घर हैं, टूटे हुए सपने हैं और अनाथ हुए बच्चे हैं। आधुनिक युद्ध में कोई भी सुरक्षित नहीं है। अस्पताल, स्कूल, बिजलीघर और अनाज के गोदाम भी अब युद्धभूमि बन चुके हैं।
लेकिन इस युद्ध की सबसे खतरनाक विशेषता यह है कि यह अदृश्य भी है। साइबर हमलों से देशों की बैंकिंग प्रणालियां हिलाई जा रही हैं। आर्थिक प्रतिबंधों से पूरी आबादियों को घुटनों पर लाया जा रहा है। सूचना युद्ध के जरिए समाजों को भीतर से तोड़ा जा रहा है। सोशल मीडिया पर फैलाई जाने वाली झूठी कहानियां अब मिसाइलों जितनी ही घातक हो चुकी हैं।
इस वैश्विक अशांति का एक और पक्ष है रक्षा उद्योग का फलना-फूलना। हथियार कंपनियों का बढ़ता हुआ राजस्व इस बात का प्रमाण है कि भय एक लाभदायक व्यवसाय बन चुका है। जितनी अधिक अस्थिरता, उतनी अधिक मांग। यह एक ऐसा चक्र है, जिसमें शांति सबसे बड़ा घाटे का सौदा बनती जा रही है।
विरोधाभास में जी रही दुनिया
आज की दुनिया एक विचित्र विरोधाभास में जी रही है। तकनीक हमें जोड़ रही है, लेकिन राजनीति हमें तोड़ रही है। वैश्विक व्यापार हमें एक-दूसरे पर निर्भर बना रहा है, लेकिन भू-राजनीति हमें दुश्मन बना रही है। यही कारण है कि यह युग युद्ध का युग है, भले ही वह पारंपरिक मोर्चों पर न लड़ा जा रहा हो। इसलिए यह कहना अधिक सटीक है कि हम युद्ध की प्रतीक्षा नहीं कर रहे, बल्कि उसके भीतर सांस ले रहे हैं। यह युद्ध हमारी अर्थव्यवस्थाओं में है, हमारी राजनीति में है और हमारे बच्चों के भविष्य में है।
यदि मानवता को इस चक्र से बाहर निकलना है, तो उसे केवल हथियारों की दौड़ ही नहीं, बल्कि भय और अविश्वास की संस्कृति को भी पराजित करना होगा। अन्यथा आने वाली पीढ़ियां हमें उस समय के रूप में याद करेंगी, जब दुनिया ने शांति को नहीं, बल्कि युद्ध को अपना स्थायी घर बना लिया था।