बांग्लादेश को हर हाल में जवाब देना होगा: भारत की सुरक्षा और हित सर्वोपरि
पड़ोसी मुल्क बांग्लादेश से इस समय जो खबरें आ रही है, वह भारत में रहने वालों के लिए झकझोर देने वाली तो है ही साथ ही चिंताजनक भी है।
पिछले तीन हफ्तों में यहां पांच हिन्दू लोगों को मार डाला गया है। हद ती तब हुई जब एक विधवा महिला के साथ सामूहिक दुष्कर्म कर उसे पेड़ से बांधकर पीटा गया। बांग्लादेश में हो रही इन घटनाओं को आकस्मिक घटना नहीं कहा जा सकता है। यह एक सोची-समझी रणनीति के तहत किया गया राजनीतिक कृत्य है, जिसका मुख्य उद्देश्य भारत के
प्रभाव को बांग्लादेश से सीमित करना और अंततः बाहर करना है। भारत भले ही फिलहाल वैट एंड वाँच की नीति पर चल रहा हो, लेकिन जमीनी हालात यह संकेत दे रहे है कि बांग्लादेश की मौजूदा सत्ता भारत को मित्र राष्ट्र के रूप में देखने के लिए तैयार नहीं है। इतिहास के पन्नों को पलटे तो बांग्लादेश के गठन के समय से ही वहां भारत-विरोधी तत्व मौजूद रहे हैं, जिनका वैचारिक झुकाव पाकिस्तान की और अधिक रहा है। हालांकि शेख हसीना के शासनकाल में इन तत्वों को कड़े प्रशासनिक और राजनीतिक नियंत्रण में रखा गया। भारत-बांग्लादेश संबंध उस दौर में रणनीतिक साझेदारी की दिशा में आगे बढ़े और सुरक्षा सहयोग मजबूत हुआ। 2024 में जब शेख हसीना ने देश छोड़ा, तभी से वहां हालात बदले हुए हैं। भारत विरोधी माहौल लगातार आ होता गया। बांग्लादेश में हो रही हिंसात्मक घटनाएं उसी का परिणाम है। बांग्ला देश में हिन्दुओं के उत्पीड़न के पीछे कौन है, यह सर्वविदित है। पाकिस्तान और चीन लंबे समय से बांग्लादेश में अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश करते रहे हैं, लेकिन शेख हसीना सरकार और भारत के साथ मजबूत संबंधों के चलते उनके प्रयास सीमित रहे। यूनुस सरकार के सत्ता संभालते ही उनके नेतृत्व में बांग्लादेश ने भारत से दूरी बनानी शुरू कर दी। अब उसी रणनीति के तहत दोबारा हिंसक भीड़ का इस्तेमाल किया जा रहा है। बांग्लादेशी छात्र नेता शरीफ उस्मान हादी की हत्या की कोशिश का आरोप भारत पर मढ़ने की कोशिश भी इसी साजिश का हिस्सा माना जा रहा है, ताकि जनभावनाओं को भड़काया जा सके और भारत विरोधी हिंसा को जायज ठहराया जा सके। वर्तमान में बांग्लादेश राजनीतिक रूप से अस्थिर है। सुरक्षा तंत्र कमजोर पड़ा हुआ है और
इस्लामी कट्टरपंथी समूह फिर सक्रिय होते दिख रहे हैं। इन समूहों को अमेरिकी डीप स्टेट की रणनीतिक अनदेखी और पाकिस्तान की मौके का फायदा उठाने वाली नीति से बल मिल रहा है। भारत विरोधी नैरेटिव अब छिपा हुआ नहीं रहा। बांग्लादेश चीन और अमेरिका की भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का खुला मैदान बन चुका है, जहां भारत के हितों को व्यवस्थित रूप से चुनौती दी जा रही है। भारत के लिए यह महज पड़ोसी देश का आंतरिक मामला नहीं है, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा गंभीर मुद्दा है। भारत और बांग्लादेश के बीच चार हजार से
अधिक किलोमीटर लंबी खुली सीमा है। बांग्लादेश पूर्वोत्तर भारत की जीवनरेखा है और अतीत में यह इलाका कट्टरपंथी नेटवर्क का पारंपरिक रूट रहा है। अवैध घुसपैठ, जनसाख्यिकीय दबाव और सिलिगुडी कॉरिडोर का खतरा वास्तविक चिता का विषय है। यदि बांग्लादेश रणनीतिक रूप से शत्रुतापूर्ण या लंबे समय तक अस्थिर रहता है, तो इसका सीधा असर भारत के पूर्वोत्तर राज्यों पर पड़ेगा। भारत की सबसे पहले कूटनीतिक स्तर पर सख्ती दिखानी होगी और स्पष्ट संदेश देना होगा कि यह बांग्लादेश की आंतरिक अराजकता की कीमत नहीं चुकाएगा। हिंसा, अल्पसंख्यकों पर हमले और भारत-विरोधी गतिविधियों पर खुलकर आपत्ति दर्ज करानी होगी। सुरक्षा के मोर्चे पर सीमा पर जीरो टॉलरेंस घुसपैठ नीति लागू करनी होगी।
खुफिया एजेंसियों को पूर्ण अलर्ट पर रखा जाए और कट्टरपंथी नेटवर्क से जुड़े लिक पर सक्रिय कार्रवाई की जाए। कूटनीति केवल यूनुस प्रशासन तक सीमित न रहे। बांग्लादेशी सेना, प्रशासन, सामाजिक नेतृत्व और विपक्ष सभी से समानांतर संवाद कायम किया जाए। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत को स्पष्ट नैरेटिव रखना होगा।