श्रम-सेतु @2047: भारत की श्रम-सुधार प्रक्रिया का भारतीय सभ्यतागत चेतना से पुनःसंयोजन
अमन डी. वशिष्ठ, कार्यकारी निदेशक, भारतीय नीति संवाद केंद्र
भारतीय ज्ञान परंपरा में ‘श्रम’ शारीरिक परिश्रम की सीमा को लांघते हुए मानवीय गरिमा, आत्मसम्मान और सामाजिक समन्वय की प्रतिष्ठा स्थापित करने वाला शब्द है। भारतीय सभ्यतागत चेतना में श्रम को आर्थिक क्रिया मात्र से परे जाकर यज्ञ के रूप में स्वीकार किया गया है । श्रम यज्ञ में रत मनुष्य अपने सचेत कर्म करते हुए स्वयं को पोषित करता है। ऋग्वेद में मानव श्रम को सृष्टि को एक सुव्यवस्थित ढाँचे में संयोजित- संवर्धित करने वाली शक्ति के रूप में प्रतिष्ठित किया गया है, दूसरी ओर भगवद्गीता में कर्म श्रम को मानवीय उद्देश्य एवं कर्तव्य-बोध के रूप में जीवन के केंद्र में स्थापित करती है। श्रम से जुड़े विविध कौशल, शिल्प और सृजन को भारतीय शास्त्रीय और लोकमानस में विश्वकर्मा के रुप में देवता का दर्जा प्राप्त है। स्पष्ट है कि भारतीय चिंतन पंरपरा और दृष्टिकोण में श्रम को नैतिकता, समुदाय और सामाजिक समरसता से पृथक नहीं किया जा सकता। किन्तु आधुनिक काल में नीति-भाषा ने इस सभ्यतागत विरासत से धीरे-धीरे दूरी बना ली है। आज श्रम पर विमर्श प्रायः अनुपालन, पंजीकरण, आँकड़ा-पटल और सांख्यिकीय सूचकों तक सीमित हो गया है। श्रमिक, अपने अनुभव और सामाजिक अस्तित्व सहित मानव न रहकर, आँकड़ों की एक सूचनागत इकाई बनता जा रहा है। सभ्यता और प्रशासन के मध्य बढ़ती इसी खाई की गहराई कम करने में श्रम संवाद संगम–2026 की सार्थकता निहित है। वी. वी. गिरि राष्ट्रीय श्रम संस्थान, नोएडा में भारतीय नीति संवाद केंद्र के सहयोग से आयोजित यह संगम केवल श्रम संहिताओं पर केंद्रित एक तकनीकी चर्चा मात्र नहीं था। यह शासन प्रशासन को "श्रम" को उसके भारतीय जड़ों से पुनः जोड़ने का प्रयास के साथ ही एक डिजिटल और आकांक्षी भारत की यथार्थ आवश्यकताओं से ईमानदार संवाद के रूप में भी देखें जाने का प्रस्ताव स्वीकार किया जा सकता है। भारतीय मजदूर संघ के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष, सी. के. साजी नारायणन; डॉ. अरविंद, महानिदेशक, वी. वी. गिरी राष्ट्रीय श्रम संस्थान; प्रो. के. जी. सुरेश, निदेशक, इंडिया हैबिटैट सेंटर, नई दिल्ली के मार्गदर्शन में यह संवाद भारत के सबसे व्यापक श्रमिक आंदोलन की नैतिक परंपरा से अनुप्राणित रहा ।इस आयोजन में संघर्ष और टकराव की औद्योगिक संस्कृति के स्थान पर गरिमा, संवाद और राष्ट्रीय उत्तरदायित्व की परंपरा को प्राथमिकता दिया है। संगम में उपस्थित प्रो. संजीव कुमार, देबाशीष सत्पथी, प्रो. मोनिका सूरी, डॉ. बी. भावना राव, अरुण चौहान तथा डॉ. दीपेंदर चहर जैसे सार्वजनिक बुद्धिजीवियों की उपस्थिति ने इस साझा समझ को सुदृढ़ किया ।
भारत सरकार द्वारा 29 श्रम कानूनों को चार श्रम संहिताओं में समेकित करना निस्संदेह कानून से लोक तक: सुधार का वास्तविक मापदंड स्थापित करने वाला एक महत्त्वाकांक्षी और दूरदर्शी कदम है। पंजीकरण, सामाजिक सुरक्षा और अनुपालन के लिए विकसित यह डिजिटल मंच संकेत देता हैं कि नीति के स्तर पर गंभीर इच्छाशक्ति मौजूद है। परंतु ज़मीनी सच्चाई यह भी है कि सुधार काग़ज़ों पर नहीं, जीवन में परखे जाते हैं। बार-बार यह बात सामने आई कि श्रम सुधार तभी सार्थक होते हैं, जब उनका असर श्रमिक के कार्यस्थल, बस्ती, परिवार और भविष्य की चिंता से जुड़ कर उनके जीवन में वास्तविक बदलाव लाते हैं। भारतीय राजनीतिक सोच में शासन वैधता अंत्योदय, यानी समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुँच कर अपनी वैधता ग्रहण करता है। यह कोई दार्शनिक आदर्श भर नहीं, बल्कि व्यवहारिक शासन का मापदंड है। श्रम का समवर्ती सूची में होना यह स्पष्ट करता है कि केंद्र और राज्य - दोनों - जमीनी परिणामों के लिए बराबर जिम्मेदार हैं। फिर भी वर्तमान परिदृश्य में श्रम संबंधी अधिकांश प्रयास बिखरे हुए दिखाई देते हैं। कहीं अनुसंधान हो रहा है, कहीं नियम बन रहे हैं, कहीं उद्योग उन्हें लागू कर रहे हैं। श्रमिक इन बिखरे हुए प्रयासों के दुष्प्रभाव झेलते हुए अपना जीवन बिता रहा है और नागरिक समाज टूटे तंत्र को जोड़ने की कोशिश कर रहा है। इन सबके बीच आपसी तालमेल और संवाद की सबसे अधिक कमी है। श्रम-संगम से मूल भाव यह निकला कि भारत को किसी और केंद्रीयकृत योजना की नहीं, बल्कि एक साथ काम करने की संस्कृति की आवश्यकता है। ऐसे सहयोग की, जहाँ पदानुक्रम से अधिक साझेदारी हो, नियंत्रण से अधिक विश्वास हो, और नीति से अधिक मानवीय समझ हो। जब संस्थाएँ एक-दूसरे के साथ नहीं, बल्कि एक-दूसरे के लिए काम करेंगी, तभी श्रम सुधार वास्तव में श्रमिकों के जीवन को बेहतर बना पाएँगे।
श्रम संवाद संगम–2026 से निकला सबसे महत्त्वपूर्ण विचार BNSK-भारत द्वारा प्रतिपादित श्रम-सेतु @2047 रहा। यह कोई सरकारी अधिसूचना या योजनाओं का नया पैकेज नहीं है। यह शासन को काग़ज़ से निकालकर मानव जीवन के अनुभव से जोड़ने वाली सोच का नाम है। एक गहरे भारतीय बोध से इसकी आत्मा जन्म लेती और अपना रुप पाती है । समुदायों का वास्तविक और स्थायी रूपांतरण, बदलाव बाहर से थोपे जाने के बजाय अंदर से उगने पर ही होता है। संगम में साझा किए गए अनुभवों ने इस विश्वास को जीवंत किया। विशेषकर विश्व-भारती विश्वविद्यालय के शोध विशेषज्ञ प्रोफेसर बिप्लब लोहाचौधरी द्वारा क्रियान्वित किए गए असम के सिलचर मॉडल में यह स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। इस माडल से जुड़े लोगों ने प्रशासनिक प्रतीक्षा किए बिना नहरों को पुनर्जीवित किया, पुलों का निर्माण किया, कृषि को सँभाला और बच्चों के लिए विद्यालय स्थापित किए। यह सहायता या अनुदान का उदाहरण नहीं है, बल्कि जन-शक्ति के आत्मविश्वास का प्रकटीकरण है। इस मानवीय ऊर्जा को श्रम-सेतु @2047 पहचान देता है। उसे ऐसा ढाँचा प्रदान करता है, जो विकेन्द्रीकृत होने के बाद भी आपस में जुड़ा हुआ है। इस ढांचे में जिले , ब्लॉक और पंचायत स्तर पर ऐसे श्रम शक्ति केंद्र को वास्तविक धरातल पर विकसित करने का प्रयास है, जहां श्रमिक और उसके जीवन को सांख्यिकी की गणनाओं से बाहर निकाल कर व्यक्ति के रूप में देखा जाएगा।इन केंद्रों में शहरी बस्तियों में बस्ती सभाओं में असंगठित श्रम, प्रवासन, आवास और गिग श्रमिकों की रोज़मर्रा की चिंताओं पर सीधी बात हो सकेगी। ग्रामीण क्षेत्रों में ग्राम सभा और पल्लि सभा में श्रम अधिकार काग़ज़ी न रहकर पंचायती परंपरा का हिस्सा बनाने का स्थायी प्यास धरातल पर उतारा जाएगा । श्रमिक, प्रशासन और नीति-निर्माता एक-दूसरे को सुनने सकेंगे ।इन केंद्रों में संवाद केवल ऊपर से नीचे नहीं, बल्कि दोनों दिशाओं में; सामुदायिक नेतृत्व पर आधारित कल्याण और शिकायत निवारण, जहाँ विधिक और डिजिटल सहायता भरोसे के साथ उपलब्ध होगा। केंद्र, राज्य व स्थानीय स्तरों का ऐसा संगम, जिससे सुधार सचमुच अंतिम व्यक्ति तक पहुँचे। दरअसल यह राष्ट्र और समाज के बीच विश्वास का मॉडल है—जहाँ राष्ट्र रास्ता बनाता है, समाज साथ चलता है और समुदाय नेतृत्व करता है। श्रम-सेतु @2047 किसी लक्ष्य-तिथि का नहीं, बल्कि उस मानवीय यात्रा का नाम है। इस यात्रा में श्रम को गरिमा मिलती है और शासन जीवन के निकट आता है।
नैतिक दिशा के अधीन तकनीक
श्रम संवाद संगम–2026 ने तकनीक बनाम मानवता के बीच आधुनिक विमर्श में अनावश्यक रूप से खड़ा किए गए कृत्रिम द्वंद्व को स्पष्ट रूप से अस्वीकार किया गया है। भारतीय सभ्यतागत दृष्टि में तकनीक कभी भय का विषय नहीं रही; उसका मूल आग्रह सदैव उपकरण विवेक, नैतिकता और मानवीय उद्देश्य के अधीन संचालित करना रहा है । इसी निरंतरता में संगम के विमर्श ने यह रेखांकित किया कि आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस और डिजिटल श्रम-शासन सही दिशा में आगे बढ़ कर तेज़ और पारदर्शी शिकायत निवारण, सामाजिक सुरक्षा के व्यापक विस्तार तथा लाभों के अधिक सटीक और न्यायपूर्ण वितरण जैसे ठोस अवसर प्रदान कर सकते हैं। साथ ही संगम ने स्पष्ट चेतावनी भी दी कि नैतिक दिशा से रहित तकनीक,सशक्तिकरण का साधन नहीं बल्कि शोषण के नए रूपों को जन्म देने वाली होती है। इसी संदर्भ में एक “ह्यूमेनोटिक मॉडल” (Human-Centric Robotics & AI Model) की आवश्यकता रेखांकित की गई , जिसमें स्वचालन और एल्गोरिदम, मानव विवेक के सहायक बनकर निर्णय करने का कार्य करते हैं। इस दृष्टिकोण में तकनीक का उद्देश्य श्रमिक को प्रतिस्थापित करना नहीं, बल्कि उसकी सुरक्षा, गरिमा और क्षमताओं को सुदृढ़ करना होता है। भारतीय बोध में यंत्र को सदैव मंत्र के अधीन रहना चाहिए - अर्थात् तकनीक का संचालन नैतिक संकल्प और मानवीय उत्तरदायित्व द्वारा निर्देशित हो। शासन-व्यवस्था का अंतिम उद्देश्य दक्षता और कुशलता के साथ मानव गरिमा की रक्षा और विस्तार होना चाहिए। जब तकनीक इस मानवीय ढाँचे में कार्य करते हुए प्रगति का साधन बनती है। ऐसा न होने पर समाज को क्षति पहुँचाने लगती है।
नेतृत्व, दृष्टि और निरंतरता
श्रम-सेतु @2047 स्वाभाविक रूप से माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी के उस व्यापक दृष्टिकोण से जुड़ता है, जिसमें श्रम-सुधार केवल विधायी या प्रशासनिक अभ्यास सहित गरिमा, कौशल और आत्मनिर्भरता के माध्यम से विकसित भारत के निर्माण का आधार माना गया हैं। इस व्यापक विमर्श में श्री मुकुल कानिटकर, राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य, RSS; श्री विवेक दाधकर, राष्ट्रीय संघटक, भारतीय जनता पार्टी (BJP) जैसे प्रख्यात विचारकों और सर्वश्रुत बुद्धिजीवियों के मार्गदर्शन ने इस साझा समझ को सुदृढ़ किया । किसी भी तरह के श्रम-सुधार सांस्कृतिक रूप से जड़ित, सामाजिक रूप से स्वीकृत और संस्थागत रूप से जुड़ कर ही सतत और प्रभावी होंगे।
जो सभ्यता विश्वकर्मा को पूजती है, वह अपने श्रमिकों को अदृश्य नहीं रहने दे सकती। विश्वकर्मा की गरिमा का पुनर्स्मरण और सम्मान है ।निर्माण श्रमिक, स्वच्छता कर्मी, गिग श्रमिक, कारखाना श्रमिक और कारीगर—ये किसी योजना के मात्र लाभार्थी नहीं, बल्कि राष्ट्र-निर्माण की सक्रिय इकाइयाँ हैं।
अपने मूल में, श्रम संवाद संगम–2026 श्रम की गरिमा—उसके नैतिक सम्मान—को पुनः सार्वजनिक चेतना के केंद्र में लाने का आह्वान था। आज हम हर क्षेत्र में 'भारत 2047' की ओर अग्रसर है। यहां मूल प्रश्न यह नहीं है कि हम कितनी तीव्र गति से आगे बढ़ते हैं, बल्कि यह है कि हम किस दिशा में और किन मूल्यों के साथ आगे बढ़ते हैं। श्रम-सेतु @2047 नीति और जन, परंपरा और तकनीक, राष्ट्र और समाज के बीच एक जीवंत सेतु का निर्माण करता है। यह कोई तात्कालिक नवाचार नहीं, बल्कि सहानुभूति, उत्तरदायित्व और साझा उद्देश्य के साथ शासन करने की भारत की ऐतिहासिक स्मृति का एक गहन स्मरण है। यह स्मरण उस गौरवशाली मानवीय परंपरा को पुनः स्थापित करने की दिशा में आगे बढ़ने का प्रयास है।