सुप्रीम कोर्ट: स्कूलों में लड़कियों के लिए फ्री पैड और अलग टॉयलेट जरूरी, वरना मान्यता रद्द
सुप्रीम कोर्ट के साफ आदेश, सरकारी और प्राइवेट स्कूलों मे लड़कियों के लिए फ्री में सैनेटरी पैड बांटना अनिवार्य, नहीं तो रद्द हो जायेगी मान्यता।
शुक्रवार 30 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट ने एक बड़ा ही अहम फैसला लिया है। अब देश के सभी स्कूलों में लड़कियों को फ्री में सैनेटरी पैड बांटना अनिवार्य होगा। लड़के और लड़कियों के लिए अलग-अलग वॉशरूम बनाने होंगे। अगर किसी स्कूल ने आदेश नहीं माना, तो उसकी मान्यता रद्द कर दी जायेगी। इसके साथ ही कोर्ट ने सभी प्रदेशों को निर्देश दिया है कि हर स्कूल में दिव्यांगों के हिसाब से टॉयलेट (डिसेबल फ्रेंडली) बनाए जाएं।
सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को देशभर के सरकारी और प्राइवेट स्कूलों को निर्देश दिया है कि सभी स्कूलों में लड़कियों को फ्री में सैनेटरी पैड उपलब्ध (Available) कराना अनिवार्य होगा। इसके साथ ही लड़कों और लड़कियों के लिए अलग-अलग वॉशरूम बनाने होंगे। जो स्कूल इन निर्देशों का पालन नहीं करेंगे। उनकी मान्यता रद्द की जा सकती है।
दिव्यांगों के अनुसार टॉयलेट
साथ ही कोर्ट ने दिव्यांगों को ध्यान मे रखते हुए। उनके हिसाब से टॉयलेट (डिसेबल-फ्रेंडली) बनाने का आदेश दिया है। जिससे टॉयलेट जाते वक्त उन्हें परेशानी न हो।
यह फैसला केंद्र सरकार की मासिक धर्म स्वच्छता नीति (Menstrual Hygiene Policy) को पूरे देश में लागू करने की मांग पर चार साल से चल रही सुनवाई के बाद आया है। जानकारी के लिए आपको बता दें, सोशल वर्कर जया ठाकुर ने 2022 में जनहित याचिका दाखिल की थी। जिसमें उन्होंने देशभर के स्कूलों में मासिक धर्म स्वच्छता नीति को लागू करने की मांग की थी।
कोर्ट के दो मुख्य बिंदु
- अलग टॉयलेट का अधिकार: अगर स्कूलों में लड़कियों के लिए अलग टॉयलेट नहीं हैं, तो यह संविधान के अनुच्छेद 14 (बराबरी का अधिकार) का उल्लंघन है।
- फ्री पैड और गरिमा: लड़कियों को सैनिटरी पैड न मिलना उनकी पढ़ाई और स्कूल गतिविधियों में बराबरी से भाग लेने के अधिकार को प्रभावित करता है। मासिक धर्म के दौरान सम्मानजनक सुविधा मिलना अनुच्छेद 21 (जीवन और गरिमा का अधिकार) का हिस्सा है।
कोर्ट ने कहा कि लड़कियों के शरीर को अक्सर बोझ की तरह देखा जाता है, जबकि इसमें उनकी कोई गलती नहीं है। यह आदेश केवल कानूनी दृष्टिकोण से नहीं, बल्कि सामाजिक और शैक्षणिक दृष्टिकोण से भी जरूरी है। जया ठाकुर ने याचिका में बताया कि मासिक धर्म के दौरान कई लड़कियां स्कूल छोड़ देती हैं। उनके परिवार पैड खरीदने की आर्थिक स्थिति नहीं रखते, और कपड़े का उपयोग करने पर स्कूल जाना कठिन हो जाता है।