राष्ट्रपति ट्रंप की धमकी, फिर भी ईरान पर हमला क्यों नहीं कर सकता अमेरिका, जानें मजबूरी
अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप की ईरान पर सैन्य कार्रवाई की धमकी दी थी। हालांकि अभी तक ऐसा कुछ नहीं क्या आखिर इसकी वजह क्या है।
नई दिल्लीः ईरान में मौजूदा सरकार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन लगातार जारी है। वहां हालात बेकाबू होते जा रहे हैं। इस बीच अमेरिका के राष्ट्रपति ने हस्तक्षेप करने जैसा बयान दिया था। जानिए क्या अमेरिका ऐसा कर सकता है और उसका क्या प्रभाव पड़ेगा।
दरअसल, वेनेजुएला के पूर्व राष्ट्रपति निकोलस मादुरो की गिरफ्तारी से उत्साहित अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अब ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई की धमकी दे रहे हैं। यह बयान ऐसे समय पर आया है, जब ईरान में पहले से ही सत्ता विरोधी प्रदर्शन जारी हैं। हालांकि, बड़ा सवाल यह है कि क्या अमेरिका ईरान में हस्तक्षेप करेगा। यदि ऐसा हो तो वास्तव में कैसा होगा।
क्या है अमेरिका की धमकी की जमीनी हकीकत
ट्रंप की आक्रामक बयानबाजी के बावजूद जमीन पर हालात कुछ और ही कहानी बयां करते हैं। फिलहाल अमेरिका ने ईरान के खिलाफ किसी भी एयरक्राफ्ट कैरियर की तैनाती नहीं की है। इतना ही नहीं, अमेरिका के खाड़ी क्षेत्र के सहयोगी देशों ने भी ईरान पर संभावित हमले की मेजबानी को लेकर खास रुचि नहीं दिखाई है।
सैन्य कार्रवाई से ईरान को क्या फायदा
एक्सपर्ट का मानना है कि अगर अमेरिका ईरान पर सैन्य हमला करता है, तो इससे सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई और मौजूदा सरकार को घरेलू समर्थन जुटाने में मदद मिल सकती है। बाहरी खतरे का हवाला देकर ईरानी शासन न सिर्फ अंदरूनी विरोध प्रदर्शनों को दबा सकता है, बल्कि क्षेत्रीय गठबंधनों को भी मजबूत कर सकता है।
हालांकि अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ईरानी शासन के खिलाफ सैन्य हस्तक्षेप की बात कर रहे हैं, लेकिन मध्य पूर्व में अमेरिका की सैन्य मौजूदगी पहले के मुकाबले कम हुई है। द गार्जियन की रिपोर्ट के अनुसार, बीते कुछ महीनों में अमेरिका ने इस क्षेत्र से अपनी सैन्य तैनाती घटाई है, जिससे सैन्य विकल्प और सीमित हो गए हैं।
मिडिल ईस्ट में नहीं है कोई अमेरिकी बेस
इसके अलावा अक्टूबर के बाद से मिडिल ईस्ट में अमेरिका का कोई भी एयरक्राफ्ट कैरियर तैनात नहीं है। गर्मियों में यूएसएस गेराल्ड आर. फोर्ड को कैरिबियन भेजा गया था, जबकि पतझड़ में यूएसएस निमित्ज को अमेरिका के वेस्ट कोस्ट के एक पोर्ट पर ट्रांसफर कर दिया गया। ऐसे में अगर ईरान पर हवाई या मिसाइल हमला होता है, तो इसके लिए मिडिल ईस्ट में मौजूद अमेरिकी या सहयोगी देशों के एयरबेस का ही इस्तेमाल करना पड़ेगा।
टारगेट तय करना सबसे बड़ी चुनौती
अमेरिका के सामने एक और बड़ी समस्या हमले के टारगेट की पहचान को लेकर है। ईरानी शासन द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली सैन्य और नागरिक साइट्स की पहचान करना भले ही आसान हो, लेकिन पूरे देश में चल रहे विरोध प्रदर्शनों और उन पर की जा रही कार्रवाई के बीच सटीक निशाना साधना बेहद मुश्किल होगा। इससे आम नागरिकों के हताहत होने का गंभीर खतरा बना रहेगा।
विशेषज्ञों का कहना है कि अमेरिकी हमलों को ईरानी शासन अपने बचे-खुचे समर्थकों को एकजुट करने के लिए आसानी से इस्तेमाल कर सकता है। भले ही इस वक्त खामेनेई के खिलाफ जनता का गुस्सा दिख रहा हो, लेकिन उनकी सरकार कमजोर नहीं मानी जा रही है। जून 2025 में इजरायल के लगातार हमलों से बच निकलना इसका उदाहरण है।
खामेनेई पर सीधा हमला भी जोखिम भरा
अमेरिका खामेनेई पर सीधे हमले का विकल्प भी सोच सकता है, लेकिन किसी दूसरे देश के शीर्ष नेता की हत्या उसे गंभीर कानूनी विवादों में फंसा सकती है। इसके अलावा इससे जवाबी सैन्य कार्रवाई का खतरा भी बढ़ जाएगा। सत्ता परिवर्तन की संभावना भी सीमित मानी जा रही है, क्योंकि ईरानी सुप्रीम लीडर पहले ही अपने संभावित उत्तराधिकारी के रूप में तीन वरिष्ठ धर्मगुरुओं के नाम तय कर चुके हैं।