जितने पुरुष, उतनी ही महिलाएं हैं संघ में

Update: 2026-01-03 04:38 GMT

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में महिलाओं की भूमिका

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में महिलाओं की भूमिका को लेकर अक्सर सवाल उठाए जाते हैं। सवाल उठाने वाले लोग भारत की जड़ों के साथ महिला विमर्श को नहीं जोड़ते; वे विदेशी दृष्टि से नारी सशक्तिकरण की दलीलें देते हैं। संघ हमेशा से मातृशक्ति के समान अधिकार, उनके सशक्तिकरण और अवसरों की समानता की बात करता रहा है।

भोपाल में आयोजित शक्ति संवाद संघ और समाज में महिलाओं की भूमिका को अधोरेखित करने वाली परंपरा और मान्यता का एक आयोजन है। यहां हम सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत के कुछ आधिकारिक वक्तव्यों को प्रकाशित कर रहे हैं, जो उन्होंने समय-समय पर सार्वजनिक रूप से इस विषय में दिए हैं।

अगर समाज को बदलना है, तो आधी आबादी को अलग नहीं रखा जा सकता। समाज में सुधार और बदलाव लाने के लिए महिलाओं की भागीदारी बेहद जरूरी है। हम कई फैसले राष्ट्र सेविका समिति से बातचीत करके लेते हैं। संघ कई मुद्दों पर फैसले महिला संगठन राष्ट्र सेविका समिति से विचार-विमर्श और समन्वय करके करता है।

महिलाओं को पिछड़ी परंपराओं और रूढ़ियों से मुक्त करना बेहद जरूरी है। पुरुष और महिला दोनों जीवनभर काम करते हैं, लेकिन महिला काम के साथ भावी पीढ़ियों को भी प्रेरित करती है। बच्चों के विकास में उनका स्नेह और मार्गदर्शन अहम भूमिका निभाता है।

संघ की शाखा का कार्यक्रम पुरुषों के लिए है। उन कार्यक्रमों को देखने के लिए महिलाएं आ सकती हैं और आती भी हैं। परंतु संघ का कार्य केवल कार्यकर्ताओं के भरोसे नहीं चलता। हमारी माताओं और बहनों का हाथ लगे बिना संघ नहीं चल सकता। संघ के स्वयंसेवक के घर में जितनी भी महिलाएं हैं, उतनी महिलाएं संघ में भी हैं। विभिन्न संगठनों में भी महिलाएं संघ के स्वयंसेवकों के साथ मिलकर काम करती हैं। संघ की अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा की बैठक में भी उनका प्रतिनिधित्व और सक्रिय सहभागिता है।

हम यह मानते हैं कि महिलाओं का उदार पुरुष नहीं कर सकते। महिलाएं स्वयं अपना उदार करेंगी, उसमें सबका उदार हो जाएगा। इसलिए हम उन्हीं को प्रमुखता देते हैं और जो वे करना चाहती हैं, उसके लिए उन्हें सशक्त बनाते हैं।

पुरुषों को यह बड़प्पन नहीं दिखाना चाहिए कि वे महिलाओं के उदार कार्य कर रहे हैं। महिलाएं जो काम कर सकती हैं, वह पुरुष नहीं कर सकते। इसलिए महिलाओं को उनकी इच्छा के अनुसार काम करने की स्वतंत्रता देनी चाहिए और उन्हें अनुचित रूढ़ियों के बंधन से मुक्त करना चाहिए।

सम्पूर्ण हिंदू समाज को संगठित करते समय महिलाओं का क्या? यह प्रश्न डॉ. हेडगेवार से एक महिला ने 1931 में पूछा। महिला ने कहा, “आप बात कर रहे हैं हिंदू समाज के संगठन की, लेकिन 50 प्रतिशत महिलाओं को तो वैसे ही छोड़ दिया आपने।”

डॉ. हेडगेवार ने उत्तर दिया कि “आपकी बात बिल्कुल ठीक है, परंतु उस समय वातावरण ऐसा नहीं था कि पुरुष जाकर महिलाओं में काम करें। इससे कई प्रकार की गलतफहमियों को मौका मिलता है। कोई महिला अगर काम करना चाहती है, तो हम उसकी पूरी मदद करेंगे।”

तब उस महिला ने इसी प्रकार चलने वाला एक ‘राष्ट्र सेविका समिति’ नामक संगठन चलाया। आज वह भी भारतव्यापी संगठन बन गया है। संघ के संस्कारों की कार्यपद्धति इस प्रकार है:

पुरुषों के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ,

महिलाओं के लिए राष्ट्र सेविका समिति,

ये दोनों समानांतर चलेंगे।

एक-दूसरे के कार्यक्षेत्र में काम नहीं करेंगे, लेकिन एक-दूसरे की हमेशा मदद करेंगे।

यदि इसे बदलना है, तो दोनों तरफ सहमति होनी चाहिए। संघ के स्वयंसेवक जो अन्य काम करते हैं, छोटे-बड़े सेवा प्रकल्प चलते हैं, उसमें महिला और पुरुष सभी काम करते हैं। संघ कोई संन्यासियों का संगठन नहीं है; अधिकांश स्वयंसेवक गृहस्थ कार्यकर्ता हैं। घरों में आना-जाना रहता है। हमारी माताएँ और बहनें अपनी-अपनी जगह से सीधे संघ के कार्य में बहुत मदद करती हैं। इतने सारे विविध कार्यों में महिलाएं आई हैं और आगे भी आती रहेंगी।


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