दुनिया को टैरिफ से डराने वाले ट्रम्प यूरोप के आगे झुके? 27 देशों की ‘ट्रेड बाजूका’ धमकी से बदला रुख

यूरोप की ‘ट्रेड बाजूका’ धमकी के बाद ट्रम्प ने 10% टैरिफ हटाया। जानिए क्या है एंटी-कोएर्शन इंस्ट्रूमेंट और कैसे EU ने अमेरिका को झुकाया।

Update: 2026-01-27 07:34 GMT

नई दल्ली। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प जिस अंदाज़ में दुनिया को टैरिफ से डराते आए हैं उसमें यूरोप हमेशा उनकी प्राथमिक सूची में नीचे रहा है। स्विट्जरलैंड के दावोस में वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम के दौरान उन्होंने यूरोपीय देशों की खिल्ली उड़ाई. लेकिन इसी दावोस से यूरोप ने एक ऐसा सबक सीखा जिसने इस बार ट्रम्प को कदम पीछे खींचने पर मजबूर कर दिया।

जब यूरोप ने एकजुटता दिखाई

दावोस बैठक ने यूरोप को यह सिखाया कि अगर 27 देश एक साथ खड़े हों सीमाओं और संप्रभुता की रक्षा को लेकर एक सुर में बोलें, तो दुनिया की सबसे बड़ी ताकत भी दबाव नहीं बना सकती । जब ट्रम्प ने 1 फरवरी से यूरोपीय देशों पर 10% टैरिफ लगाने की धमकी दी, तो यूरोप ने भी जवाब में अमेरिका पर ‘ट्रेड बाजूका’ चलाने की चेतावनी दे दी, यहीं पर कहानी पलट गई।

दुनिया को डराने वाले ट्रम्प, खुद घबरा गए?

टैरिफ के नाम से देशों को डराने वाले ट्रम्प को शायद अंदाज़ा नहीं था कि इस बार सामने वाला खाली बयान नहीं दे रहा। यूरोपीय यूनियन के 27 देशों ने साफ कर दिया कि अगर अमेरिका ने टैरिफ लगाया, तो EU पूरी ताकत से आर्थिक जवाब देगा। नतीजा यह हुआ कि ट्रम्प को न सिर्फ 10% टैरिफ के ऐलान से पीछे हटना पड़ा, बल्कि ग्रीनलैंड को लेकर भी उनकी भाषा अचानक नरम हो गई। उन्होंने कहा कि इस पर कब्जा करने के लिए ताकत का इस्तेमाल नहीं किया जाएगा। यह वही ट्रम्प हैं, जो कुछ हफ्ते पहले तक किसी भी दबाव के आगे झुकने को कमजोरी मानते थे।

मैक्रों की चेतावनी ने बदला खेल

20 जनवरी को दावोस इकोनॉमिक फोरम में फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने अमेरिका को खुली चेतावनी दी थी। उन्होंने कहा था कि जरूरत पड़ी तो यूरोप ‘ट्रेड बाजूका’ का इस्तेमाल करेगा। उस समय यह बयान कूटनीतिक भाषा का हिस्सा लग रहा था, लेकिन अब साफ है कि यह सिर्फ चेतावनी नहीं थी।

आखिर क्या है यह ‘ट्रेड बाजूका’

‘ट्रेड बाजूका’ दरअसल कोई प्रतीकात्मक शब्द नहीं, बल्कि यूरोपीय यूनियन का एक ठोस कानून है। इसका असली नाम है एंटी-कोएर्शन इंस्ट्रूमेंट। इस कानून का मकसद यह है कि अगर कोई देश EU या उसकी कंपनियों पर टैरिफ, व्यापार रोकने या निवेश रोकने जैसे हथकंडों से दबाव बनाता है, तो EU उसके खिलाफ सख्त आर्थिक कार्रवाई कर सके। इसके तहत यूरोपीय यूनियन उस देश के सामान का इम्पोर्ट-एक्सपोर्ट रोक सकती है उसकी कंपनियों को EU के सरकारी टेंडर से बाहर कर सकती है उस देश के निवेश पर पाबंदी लगा सकती है सीधे शब्दों में कहें तो EU अपने 45 करोड़ उपभोक्ताओं वाले विशाल बाजार का दरवाज़ा बंद कर सकता है। और यह किसी भी देश की कंपनियों के लिए अरबों डॉलर के नुकसान का सौदा हो सकता है।

अमेरिका को क्यों लगा झटका

अगर यह कानून लागू होता, तो इसका सीधा असर अमेरिकी कंपनियों पर पड़ता। टेक, ऑटोमोबाइल, फार्मा और डिफेंस सेक्टर को भारी नुकसान झेलना पड़ सकता था यही वजह है कि ट्रम्प, जो आमतौर पर आखिरी दम तक दबाव बनाए रखते हैं, इस बार पीछे हट गए। इस कानून की जड़ें चीन के साथ हुए एक पुराने विवाद में हैं। साल 2021 में लिथुआनिया ने ताइवान को अपनी राजधानी विल्नियस में रिप्रेजेंटेटिव ऑफिस खोलने की इजाजत दी थी। चीन भड़क गया। चीन ताइवान को अपना ही एक प्रांत मानता है और इस कदम को उसने वन चाइना पॉलिसी का उल्लंघन माना। इसके बाद चीन ने लिथुआनिया और उससे जुड़े EU उत्पादों के व्यापार पर रोक लगा दी। यहीं से यूरोप को एहसास हुआ कि भविष्य में कोई भी बड़ा देश इसी तरह दबाव बना सकता है।  

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