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युवा पीढ़ी की करियर की होड़

करियर की अंधी दौड़ में हांफती युवा पीढ़ी!

भारत में युवा पीढ़ी करियर की अंधी दौड़ में हांफ रही है, जिसमें शिक्षा, रोजगार के अवसरों की कमी और सोशल मीडिया के प्रभाव से तनाव और अवसाद बढ़ रहे हैं।


करियर की अंधी दौड़ में हांफती युवा पीढ़ी

भारत युवाओं का देश है। जाहिर है, ऐसे देश की चिंताएं बहुत अलग होती हैं। उसकी ज्यादातर आबादी को शिक्षा, रोजगार और सुंदर जीवन की कामना होती है। उनकी महत्वाकांक्षाएं, अवसरों की होड़ और दौड़। पाने की खुशी और न मिलने का आक्रोश सब साझा होते हैं। करियर में सफल होने, जल्दी और ज्यादा पाने की कामनाएं इस दौर का मूल्य हैं। ऐसे में शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य दोनों को गहरी चुनौती है। संकट के बादल गहरे हैं। समाधान के सूत्र न्यूनतम।

बदलती कार्य संस्कृति: सरकारों में नौकरियों के दरवाजे सिकुड़ रहे हैं। ज्यादातर नौकरियां निजी क्षेत्रों में ही हैं। नौ से पांच बजे की पक्की नौकरियां अब स्वप्न ही हैं। उनकी जगह गिग इकोनॉमी (फ्रीलांस, कॉन्ट्रैक्ट वर्क) ने ले ली है। आर्थिक स्वतंत्रता की तो छोड़िए, यह मॉडल भविष्य की अनिश्चितता और वित्तीय अस्थिरता भी ला रहा है, जिसके नाते बढ़ता मानसिक तनाव और अवसाद संकट को गहरा कर रहा है। हिंदुस्तान अलग तरह से चलता रहा है। परिवार इसकी प्राणवायु रहे हैं। परिवार का कोई एक आदमी नौकरी पर रहता था, शेष अपने घर-इलाके, गांव में बैठकर स्थानीय स्तर पर जो कर सकते थे, करते थे। परिवार की छाया में सुरक्षा थी, संरक्षण था, बच्चों को संस्कारित करने के पारिवारिक उपक्रम थे। नई व्यवस्था ने एक परिवार में कई परिवार खड़े कर दिए हैं। इससे एक की जगह अब चार परिवार, चार चूल्हे और चार व्यवस्थाएं खड़ी करनी पड़ रही हैं। आप कितना भी कमा रहे हैं, वह कम ही है। इसने नई पीढ़ी को ईएमआई के दुष्चक्र में फंसा कर नई व्यवस्थाओं का गुलाम बना दिया है। परिवार व्यवस्था भारत की संस्कृति का आधार रही है। वह संस्कारशाला भी है।

कार्य और जीवन का संतुलन: कृत्रिम बुद्धिमत्ता ने हमारे सामने नई चुनौतियां पेश की हैं। वे बेहतर सहायक से ज्यादा तनाव के वाहक हैं। युवाओं में एआई के कारण नौकरियां जाने और खुद के अप्रासंगिक हो जाने का भय बैठ गया है। वे इस पूरे दृश्य को बहुत चिंता से देख रहे हैं। री-स्किलिंग का दबाव उन्हें गहरे भय में डाल रहा है। इससे मानसिक थकान होना स्वाभाविक ही है। इस समय सबसे बड़ी चिंता कार्य और जीवन संतुलन की है। वर्क फ्रॉम होम और डिजिटल कनेक्टिविटी ने सारा कुछ बदलकर रख दिया है। काम के घंटे अब प्रायः 24 घंटे ही हैं। देर रात तक ई-मेल, रिपोर्ट्स और मैसेज का जवाब देते हुए युवा 'ऑलवेज ऑन' मोड में रहते हैं, जिससे पारिवारिक जीवन, व्यक्तिगत समय और नींद सब प्रभावित हो रहे हैं। बर्नआउट की बढ़ती दर, काम के अनिश्चित घंटे, स्पर्धा का वातावरण और टारगेट पूरे करने का दबाव साथ चलता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने बर्नआउट को प्रोफेशनल बीमारी मान लिया है। यह अब भारतीय कॉरपोरेट जगत में एक अनिवार्य समस्या बन गई है।

सोशल मीडिया से बनती छवियां: सोशल मीडिया ने समाज में अलग तरह की स्पर्धा की छवियां प्रस्तुत की हैं। अपने सुखद, आनंद के क्षणों को वायरल करने की बीमारी दूसरे की पीड़ा का कारण बन जाती है। किसी की बड़ी पदस्थापना, उसकी पार्टियां, रील्स, पर्यटन की तस्वीरें, महंगी जीवनशैली का विज्ञापन करना, सफलताओं के हाईलाइट्स देखकर तुलना और स्पर्धा की बातें तेज होती हैं। इससे हीनभावना और तनाव का जन्म भी होता है। परिजन और बच्चे भी अपने पालकों से ऐसी ही जीवनशैली की अपेक्षा करते हैं। ऐसे समय में युवाओं के लिए तनाव प्रबंधन की विधियां समझने और उन्हें जीवन की ठोस सच्चाइयों से जोड़ने की जरूरत है। योग, ध्यान के अनेक अभ्यास जीवन में शांति ला सकते हैं। जिंदगी के हमारे दृष्टिकोण में परिवर्तन ला सकते हैं। रील्स की तुरंतवादी जीवनशैली और जीवन के सतत संघर्ष को समझने की जरूरत है। सोशल मीडिया से प्रक्षेपित हो रही छवियों से प्रभावित होने के बजाय, लोगों के संघर्ष और उससे उपजी सफलताओं के पाठ भी पढ़े जाने चाहिए।

उद्यमिता और उसके जोखिम: नए समय ने युवाओं को उद्यमिता के गुर दिए हैं। यह पीढ़ी जोखिम उठाने और सफलताओं के नए शिखर छूने वाली पीढ़ी है। इसके मंत्र अलग हैं। वे जल्दी से सफलताओं के नए क्षितिज को छूना चाहते हैं। छू भी रहे हैं। कम आयु में उनकी सफलताएं विस्मित करने वाली हैं। उनके स्टार्टअप धूम मचा रहे हैं। सफलता की बड़ी कहानियां लिख रहे हैं। प्रेरित कर रहे हैं। इसके दूसरे पक्ष का विचार भी जरूरी है। हमें पता है कि 90 प्रतिशत से अधिक स्टार्टअप शुरुआती सालों में ही अन्यान्य कारणों से विफल हो जाते हैं। विफलता का डर, निवेशकों का दबाव, फंडिंग का संकट संस्थापकों और शुरुआती कर्मचारियों में मानसिक तनाव पैदा कर ही देता है।

इतने बड़े देश में हर साल लाखों युवा हाथ काम मांगने के लिए खड़े हो जाते हैं। उनके पास डिग्रियां भी होती हैं। किंतु वे कौशलयुक्त नहीं होते। वे डिग्रीधारी हैं, किंतु किसी काम के नहीं हैं। बाजार की जरूरतें अलग हैं, उनके कौशल अलग हैं। ऐसे में बहुत योग्य लोगों को भी अपेक्षित नौकरी नहीं मिल पाती, अच्छे वेतन की तो जाने ही दीजिए। युवाओं के ज्यादातर संकट वास्तविक हैं। वे जानकारी से भरपूर हैं, उनके पास अवसरों का जनतंत्र है। आकांक्षाओं की बाढ़ है। वे सूचनाओं से लदे-फंदे हैं। यह ज्यादा सूचनाएं भी दुख और भ्रम का कारण बन रही हैं। आकांक्षाओं का बड़ा आकाश उतनी ही गहरी निराशा लेकर लाता है। यह साधारण नहीं है कि आईआईटी के विद्यार्थी आत्महत्या कर रहे हैं। ऐसे प्रतिभाशाली विद्यार्थियों का अवसान उनके परिवार, देश और समाज के लिए भी बड़ी क्षति है। परीक्षाओं में मिलती असफलताएं, लीक होते प्रश्नपत्र, परीक्षाओं की नष्ट होती शुचिता, सरकारी-प्रशासनिक तंत्र की कदाचार रोकने की विफलताओं ने युवाओं को गहरी चिंताएं दी हैं। शिक्षा के निजीकरण और उससे उपजे बाजारीकरण ने हालात बहुत बदल दिए हैं।

महंगी शिक्षा के लिए परिवार कर्ज में डूब रहे हैं। प्रतिभा पलायन का संकट तो है ही। समाज में यह बात बहुत गहरे पैठ रही है कि इस देश में प्रतिभाशाली युवाओं की जगह नहीं बची है। यह तथ्य नहीं, किंतु गहराई से फैलती धारणा है। आप बिना जुगाड़ के इस व्यवस्था में सफल नहीं हो सकते। किसी राष्ट्र जीवन में ऐसी धारणाएं ठीक नहीं हैं। हमें समझना होगा कि राष्ट्र से हम सबकी सामूहिक आकांक्षाएं, साझे प्रयासों से ही फलीभूत होंगी। भारत की आजादी के आठ दशक अभूतपूर्व प्रगति, एकत्व और जीवंत लोकतंत्र के प्रमाण हैं। हर राष्ट्र जीवन में चुनौतियां होती हैं, उनसे जूझकर हम अपने संकटों का हल खोजते हैं। देश की युवा पीढ़ी भी अपने संकटों के बीच इस राष्ट्र जीवन के समक्ष उपस्थित प्रश्नों के ठोस और वाजिब हल जरूर तलाशेगी। युवा शक्ति की तेजस्विता, नवाचारों और आत्मविश्वास को देखकर यह विश्वास सहज ही होता है।


प्रो. संजय द्विवेदी
(लेखक माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में जनसंचार विभाग के अध्यक्ष हैं।)

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