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विश्व व्यवस्था को बंधक न बनाएं

युद्धोन्मादियों की बंधक न बने विश्व व्यवस्था

अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान पर हमले और युद्धविराम के बावजूद जारी रही आपसी तनातनी से विश्व व्यवस्था को खतरा। शांति और स्थिरता के लिए सक्रिय संवाद की जरूरत।


युद्धोन्मादियों की बंधक न बने विश्व व्यवस्था

राजकुमार सिंह

चाहे 28 फरवरी को ईरान पर अमेरिकी-इजरायली हमलों से युद्ध की शुरुआत हो या अब शांति समझौता तोड़कर फिर युद्ध छेड़ा गया हो, अमेरिका और खासकर उसके बड़बोले राष्ट्रपति ट्रंप मुख्य खलनायक नजर आते हैं। अक्सर संवाद के जरिए समस्या के समाधान का रास्ता बंद हो जाने पर ही संघर्ष की शुरुआत होती है, लेकिन अमेरिका और इजरायल ने 28 फरवरी को ईरान पर तब हमला बोल दिया था, जब पहले दौर में कुछ मुद्दों पर सहमति के बाद वार्ता का दूसरा दौर तय हो गया था।

मध्य पूर्व में शांति और स्थिरता की आस को फिर पलीता लग गया। यह काम किसी और ने नहीं, बल्कि उन लोगों ने ही किया है, जिनसे शांति और स्थिरता की समझदारी की उम्मीद लगाई जा रही थी। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ईरानी नेतृत्व को सनकी मानते हैं। ट्रंप के बारे में भी शेष विश्व की कमोबेश यही राय है। इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की छवि भी ऐसी ही है। दरअसल, ये तीनों मिलकर शेष विश्व की व्यवस्था को अपनी सनक का बंधक बनाते दिख रहे हैं।

युद्धविराम के बीच तनातनी के बावजूद जिस तरह अमेरिका और ईरान के बीच 60 दिन का शांति समझौता हुआ तथा उसे स्थायी बनाने को लेकर बातचीत शुरू हुई, उससे विश्व व्यवस्था बहाल होने की उम्मीद जगी थी। लेकिन अचानक फिर एक-दूसरे पर हमले शुरू हो गए। युद्ध के लिए किसी एक पक्ष को दोषी ठहराना आसान नहीं होता, लेकिन कोई कम दोषी होता है तो कोई ज्यादा।चाहे 28 फरवरी को ईरान पर अमेरिकी-इजरायली हमलों से युद्ध की शुरुआत हो या अब शांति समझौता तोड़कर फिर युद्ध छेड़ा गया हो, अमेरिका और खासकर उसके बड़बोले राष्ट्रपति ट्रंप मुख्य खलनायक नजर आते हैं। अक्सर संवाद के जरिए समस्या के समाधान का रास्ता बंद हो जाने पर ही संघर्ष की शुरुआत होती है, लेकिन अमेरिका और इजरायल ने 28 फरवरी को ईरान पर तब हमला बोल दिया था, जब पहले दौर में कुछ मुद्दों पर सहमति के बाद वार्ता का दूसरा दौर तय हो गया था।

ईरान पर हमले के पक्ष में ट्रंप और नेतन्याहू ने जो तर्क दिए, वे भी उनके समर्थक देशों के अलावा शायद ही किसी और के गले उतरे हों। पहले ही दिन सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह खामेनेई समेत तीन दर्जन से ज्यादा वरिष्ठ नेताओं और पदाधिकारियों को मार डालने तथा बाद में ईरान की सैन्य शक्ति लगभग समाप्त करने के दावों के बावजूद 7 अप्रैल को हुआ युद्धविराम बताता है कि शक्तिशाली अमेरिका और इजरायल वांछित परिणाम पाने में विफल रहे। इजरायल ने तो युद्धविराम से असहमति जताते हुए लेबनान पर हमले भी जारी रखे।तनातनी के बीच तीनों पक्षों में छिटपुट टकराव जारी रहा, पर पिछले महीने शांति समझौते पर हस्ताक्षर से उम्मीद जगी थी कि युद्धोन्माद खत्म होगा और ऊर्जा संकट के चलते आर्थिक हिचकोले झेल रही विश्व व्यवस्था धीरे-धीरे पटरी पर लौट आएगी। हालांकि ट्रंप अपनी आदत के मुताबिक बीच-बीच में धमकियां और चेतावनियां देते रहे। ट्रंप ने यहां तक कह दिया कि उन्होंने ईरान को 'एक हफ्ते की छुट्टी' दी है। उनका आशय ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह खामेनेई के अंतिम संस्कार से था, जो 28 फरवरी को अमेरिकी-इजरायली हमले में मारे जाने के बाद से लंबित था।

जाहिर है, यह बहुत सभ्य टिप्पणी नहीं थी। सच यह भी है कि 9 जुलाई को अंतिम संस्कार की रस्में पूरी होने से पहले ही 7 जुलाई को ईरान पर फिर हमले शुरू हो गए। खामेनेई के जनाजे से उनके उत्तराधिकारी बने बेटे मोजतबा सुरक्षा कारणों से दूर ही रहे। जाहिर है, जनाजे में ट्रंप विरोधी नारे भी लगे। इसी कारण अब ट्रंप खुद को ईरान का सबसे बड़ा 'टारगेट' मानते हुए अपनी सुरक्षा को लेकर अत्यधिक सतर्कता बरत रहे हैं।ट्रंप ने शांति समझौता तोड़कर फिर हमले शुरू करने के लिए ईरान द्वारा स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज में तीन कॉमर्शियल जहाजों पर फायरिंग को कारण बताया है। बेशक, जब शांति समझौता हो चुका था और उस पर अमल का रोडमैप 60 दिनों में तय करने के लिए वार्ताएं जारी थीं, तब ईरान को भी हॉर्मुज में भड़काने वाली इस कार्रवाई से बचना चाहिए था। पर क्या ट्रंप ऐसे ही किसी मौके की तलाश में थे? बिना तैयारी के वैसे जबरदस्त हमले तत्काल नहीं हो सकते, जैसे किए गए। दो दिनों में ईरान के 170 से अधिक सैन्य या उससे जुड़े ठिकानों पर हमले किए गए।

बेशक, ईरान ने भी खाड़ी में स्थित कुवैत, कतर और बहरीन जैसे अमेरिका के मित्र देशों पर पलटवार करने में देर नहीं लगाई। उसी दौरान ईरान को तेल बेचने के लिए दी गई अमेरिकी अनुमति भी रद्द करने की खबर आई। ऐसे में यह संदेह होता है कि क्या शांति वार्ता से मनमाफिक परिणाम न निकलने पर ट्रंप ने दबाव बढ़ाने के लिए हमलों का विकल्प चुना?आप सोच सकते हैं कि युद्ध कोई खेल नहीं, जिसे मनमाफिक समझौते के लिए दांव-पेंच की तरह इस्तेमाल किया जाए। पर महाशक्तियों के लिए तो युद्ध खेल भी है और मुनाफे का कारोबार भी। बेशक, इस युद्ध में अमेरिकी रक्षा विभाग पेंटागन को भारी नुकसान उठाना पड़ा है, लेकिन अमेरिकी रक्षा हथियार निर्माता कंपनियों और तेल कंपनियों की तो बल्ले-बल्ले होने की खबरें हैं। युद्ध होगा तो हथियार भी बिकेंगे ही। फिर अमेरिका कुछ छोटे देशों की सुरक्षा का ठेकेदार बनकर भी मोटी रकम वसूलता है।

मूलतः मुनाफाखोर कारोबारी ट्रंप ने खुद माना कि जब विश्व ऊर्जा खपत के 20-22 प्रतिशत हिस्से के आयात का समुद्री मार्ग हॉर्मुज बंद था, तब अमेरिका ने चोरी-छिपे वहां से भारी मात्रा में तेल निकाला। जाहिर है, वह तेल ऊंचे दामों पर बेचा भी गया। नेतन्याहू का 'ग्रेटर इजरायल' का एजेंडा भी किसी से छिपा नहीं है। ईरान के कट्टरपंथी नेतृत्व के मंसूबे भी विश्व शांति के तो हरगिज नहीं हैं।यह आईने की तरह साफ हो गया है कि तीनों ही संबंधित पक्ष अपने-अपने निहित स्वार्थों में उलझे हैं। उनका न विश्व शांति से कोई सरोकार है और न ही न्यायपूर्ण वैश्विक व्यवस्था से। इसलिए समय और समझ, दोनों का तकाजा है कि विश्व व्यवस्था को इनका बंधक बनने से बचाने के लिए शेष विश्व एकजुट होकर मुखर हो।

बेशक, कुछ छोटे देशों ने इस युद्धोन्माद के बीच शांति-समझौता वार्ताओं की पहल की, लेकिन शायद वे कोई नैतिक या कूटनीतिक दबाव बनाने की स्थिति में नहीं रहे। इसलिए अब भारत, चीन, रूस, फ्रांस और जर्मनी जैसे देशों को समान विचार वाले अन्य देशों के साथ मिलकर अमेरिका, इजरायल और ईरान पर यह दबाव बनाना चाहिए कि वे संवाद के जरिए आपसी विवादों का मनमाना नहीं, बल्कि तर्कसंगत और न्यायपूर्ण समाधान निकालें, क्योंकि उन्हें अपने निहित स्वार्थों और सनक के लिए शेष विश्व की शांति और अर्थव्यवस्था को बंधक बनाने की अनुमति नहीं दी जा सकती।

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