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पर्यावरण संरक्षण आवश्यकता

पर्यावरण संरक्षण : वर्तमान की आवश्यकता, भविष्य की सुरक्षा

अखिलेश श्रीवास्तव


पर्यावरण संरक्षण  वर्तमान की आवश्यकता भविष्य की सुरक्षा

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने अपने शताब्दी वर्ष में समाज जीवन में जिस "पंच परिवर्तन" को  सामने रखा है, उनमें पर्यावरण संरक्षण एक अत्यंत महत्वपूर्ण विषय है। पर्यावरण केवल प्रकृति का विषय नहीं है, बल्कि यह मानव जीवन, स्वास्थ्य, अर्थव्यवस्था, कृषि, संस्कृति और आने वाली पीढ़ियों के अस्तित्व से भी जुड़ा हुआ है। इसी कारण संघ ने जल संरक्षण, वृक्षारोपण तथा सिंगल यूज़ प्लास्टिक के त्याग जैसे विषयों को लेकर सामाजिक जनजागरण का माध्यम बनाया है। स्वयंसेवक स्वयं इन बातों को अपने जीवन में अपनाकर समाज के सामने उदाहरण प्रस्तुत कर रहे हैं। संघ के प्रत्येक कार्यक्रम में यह बात दोहराई जा रही है।  

कार्यक्रमों को पर्यावरण अनुकूल बनाया जा रहा है। हलाकि यह काफी लम्बे समय से होता रहा है। प्लास्टिक के डिस्पोजल का उपयोग पूरी तरह से बंद है। स्वयंसेवक इसे अपने जीवन में भी उतार रहें है। अब तो कार्यक्रम इत्यादि में प्लास्टिक के फ्लेक्स के उपयोग से भी बचा जा रहा है। इसके स्थान पर कपडे के बैनर बन रहें है। प्रदर्शनीओं के लिए भी फ्लेक्स के स्थान पर नये माइक्रो कॉटन प्रिंट का उपयोग हो रहा है। जल के संरक्षण व बचत के लिए भी कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षित किया जा रहा है कि कैसे कम पानी से अपनी दिनचर्या पूरी कि जा सकती है। संघ में लम्बे प्रशिक्षण के शिविर होते है वहां इस बात का भी हिसाब रखा जाता है कि कितना पानी प्रतिदिन खपत होती है प्रतिदिन उसे घटाने का भी प्रयास होता है। पीने के लिए भी कार्यकर्ता  उतना ही पानी  लेते है जितना पीना है। कुल मिलाकर वे स्वयं भी इसे अपने व्यवहार में ले रहें है। क्योंकि पर्यावरण संकट विश्व और भारत के सामने एक चुनौती बनकर खड़ा है।

वर्तमान समय में पूरी दुनिया जलवायु परिवर्तन, जल संकट, प्रदूषण और जैव विविधता के क्षरण जैसी समस्याओं से जूझ रही है। मनुष्य की असीमित उपभोगवादी प्रवृत्ति ने प्रकृति के संतुलन को गंभीर रूप से प्रभावित कर दिया है। इसका परिणाम असामान्य वर्षा, भीषण गर्मी, सूखा, बाढ़, भूस्खलन, वायु प्रदूषण तथा अनेक प्रकार की स्वास्थ्य समस्याओं के रूप में सामने आ रहा है। भारत जैसे कृषि प्रधान देश के लिए यह संकट और भी गंभीर है क्योंकि यहाँ की बड़ी आबादी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर है। इसलिए इन तीन बातों के उपयोग दुरूपयोग को समझना समझाना होगा।

सिंगल यूज़ प्लास्टिक सुविधा भी है पर संकट भी 

सिंगल यूज़ प्लास्टिक माने उपयोग करो और फेंक दो । प्लास्टिक की थैलियाँ, डिस्पोजेबल कप, प्लेट, स्ट्रॉ, चम्मच, पानी की छोटी बोतलें, पैकेजिंग सामग्री जो आज बड़ी मात्रा में उपयोग हो रहे हैँ। विश्व में प्रतिवर्ष लगभग 40 करोड़ टन प्लास्टिक का उत्पादन होता है। अनुमान है कि उत्पादित प्लास्टिक का केवल लगभग 9 प्रतिशत ही  रीसायकल हो पाता है। प्रतिवर्ष लाखों टन प्लास्टिक समुद्रों में पहुँच रहा है। भारत प्रतिदिन हजारों टन प्लास्टिक कचरा उत्पन्न करता है, जिसमें बड़ी मात्रा सिंगल यूज़ प्लास्टिक की होती है। प्लास्टिक को पूरी तरह नष्ट होने में 100 से 500 वर्ष तक लग सकते हैं। जिससे मिट्टी की उर्वरता पर प्रभाव पड़ रहा है। प्लास्टिक भूमि में जल के प्राकृतिक प्रवाह को रोकता है, जिससे मिट्टी की गुणवत्ता प्रभावित होती है।

जल स्रोतों प्रदूषित हो रहे हैं।

नदियाँ, तालाब और समुद्र प्लास्टिक कचरे से भर रहे हैं। पशुओं की मृत्यु कारण भी प्लास्टिक बन रही है केवल गाय ही नहीं, कुत्ते और अन्य पशु भी प्लास्टिक खा लेते हैं जिससे उनकी मृत्यु तक हो जाती है।  मानव स्वास्थ्य पर तो खतरा पड़ ही रहा है। माइक्रो प्लास्टिक अब पीने के पानी, भोजन और यहाँ तक कि मानव रक्त में भी पाए जा रहे हैं। इनका शरीर पर लम्बे समय में  गंभीर प्रभाव हो सकते हैं। प्लास्टिक कहीं कहीं  जलभराव और बाढ़ की स्थिति भी उत्पन्न कर दी है। नालियों और जल निकासी मार्गों में प्लास्टिक जमा होने से शहरी क्षेत्रों में बाढ़ की समस्या बढ़ती है।

हम समाधान की तरफ जा सकते है।

कपड़े या जूट के थैले अपना ले। स्टील, कांच और मिट्टी के बर्तनों का उपयोग करे। प्लास्टिक बोतलों और डिस्पोजेबल वस्तुओं का तो पूर्णतः त्याग कर दे। सामुदायिक स्तर पर प्लास्टिक संग्रहण और पुनर्चक्रण अभियान चलाये कई नगर निकयों ने ये प्रारम्भ भी किया है। इसी प्रकार जल संरक्षण को भी जीवन का आधार बनाया जा सकता है। भारतीय संस्कृति में जल को जीवन का पर्याय माना गया है। "जल ही जीवन है" यह केवल नारा नहीं है बल्कि एक शाश्वत सत्य है। भारत में जल संकट की स्थिति भी ख़तरनाक स्तर पर है। हम जानते ही है कि पृथ्वी के कुल पानी का लगभग 97 प्रतिशत पानी खारा है। केवल  2।5 प्रतिशत के लगभग ही मीठा पानी है। उपलब्ध मीठे जल का बहुत छोटा भाग ही मनुष्य के उपयोग के लिए उपलब्ध है। भारत विश्व की लगभग 18 प्रतिशत जनसंख्या का घर है, जबकि उसके पास विश्व के केवल लगभग 4 प्रतिशत मीठे पानी के संसाधन हैं। अनेक भारतीय नगर भूजल संकट की ओर बढ़ रहे हैं। नगर निकाय पानी उपलब्ध नहीं करवा पा रहे है। ट्यूबवेल 500 से 1000 फ़ीट पर पहुंच रहे है।  कारण जल का दुरुपयोग है 

भारत में उपलब्ध जल का लगभग 80 प्रतिशत से अधिक जल कृषि में उपयोग होता है। परंपरागत सिंचाई पद्धतियों में जल की बड़ी मात्रा व्यर्थ चली जाती है। फिर घरेलू अपव्यय खुले नल, अनावश्यक जल उपयोग और रिसाव से बड़ी मात्रा में जल नष्ट होता है। अनेक उद्योग जल का अत्यधिक उपयोग करते हैं तथा प्रदूषित जल को बिना उपचार के छोड़ देते हैं। भारत में पर्याप्त वर्षा होने के बावजूद वर्षाजल का बड़ा भाग बहकर समुद्र में चला जाता है। संचयन की परम्परा हमने छोड़ दी है। पर्याप्त व्यवस्थायें हम अब तक नहीं बना पाए है। यदि हम जल संरक्षण के प्रभावी उपाय करे तो इसे रोका जा सकता है  प्रत्येक घर, विद्यालय, कार्यालय और संस्थान में रेन वाटर हार्वेस्टिंग की व्यवस्था हो।

तालाब और जलाशयों का पुनर्जीवन हो। पुराने तालाब, बावड़ियाँ और जल संरचनाएँ पुनर्जीवित की जाएँ। सोख्ता गड्ढों और रिचार्ज संरचनाओं का निर्माण हो।  सिंचाई के लिए ड्रिप और स्प्रिंकलर सिंचाई तकनीकों को बढ़ावा मिले तो काफ़ी बचत की जा सकती है ।
घरेलू एवं औद्योगिक जल के पुनर्चक्रण की व्यवस्था की जाये। हमें जल बचत को सामाजिक आंदोलन बनाना।

इसी तरह वृक्ष और वन पृथ्वी के प्राण है।

वृक्ष प्रकृति के सबसे महत्वपूर्ण घटकों में से एक हैं। वे केवल ऑक्सीजन ही नहीं देते, बल्कि जल चक्र, जैव विविधता और जलवायु संतुलन के भी आधार हैं। एक परिपक्व वृक्ष प्रतिवर्ष बड़ी मात्रा में ऑक्सीजन प्रदान करता है। वे वातावरण से कार्बन डाइऑक्साइड ग्रहण करके जलवायु परिवर्तन की गति को भी कम करते हैं। वन वर्षा चक्र को संतुलित रखने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। पेड़ों की जड़ें मिट्टी के कटाव को रोकती हैं। लाखों जीव-जंतुओं और वनस्पतियों का आश्रय होते हैं वन। वृक्ष स्थानीय तापमान कम करते हैं तथा गर्मी की तीव्रता घटाते हैं। इसलिए वनों अंधाधुंध कटाई हमारे लिए एक गंभीर संकट है।

संयुक्त राष्ट्र के अनुसार विश्व में प्रतिवर्ष लाखों हेक्टेयर वन क्षेत्र नष्ट हो रहा है। यद्यपि भारत के वन क्षेत्र में कुछ क्षेत्रों में वृद्धि हुई है, फिर भी शहरीकरण, अवैध कटाई और विकास परियोजनाओं के कारण कई क्षेत्रों में दबाव बना हुआ है। वनों की कटाई के दुष्परिणाम स्वरुप वर्षा में असंतुलन पैदा हो रहा है, भूजल स्तर में गिरावट आ रही है।मिट्टी का कटाव हो रहा है। वन्यजीव संकट में है। तापमान में वृद्धि हो रही है। बाढ़ और सूखे की घटनाये बढ़ रही है। हमें विचार करना होगा वृक्षारोपण क्यों आवश्यक है? प्रत्येक व्यक्ति अपने जीवनकाल में अनेक वृक्षों से मिलने वाले संसाधनों का उपयोग करता है। बढ़ती जनसंख्या और शहरीकरण के कारण हरित क्षेत्र कम हो रहे हैं। जलवायु परिवर्तन से लड़ने का सबसे सरल और प्रभावी उपाय वृक्षारोपण है। वृक्ष आने वाली पीढ़ियों के लिए पर्यावरणीय सुरक्षा कवच हैं। केवल वृक्ष लगाना पर्याप्त नहीं है; उनका संरक्षण और पालन-पोषण भी उतना ही आवश्यक है। इसलिए संघ घर घर जाकर पर्यावरण  संरक्षण से समाज को होने वाले लाभ बता रहा है। क्योंकि स्वच्छ वायु, शुद्ध जल और हरित वातावरण से बीमारियाँ कम होंगी।

जल संरक्षण और वन संवर्धन से कृषि उत्पादन बढ़ेगा।

प्राकृतिक आपदाओं से होने वाली क्षति कम होगी तथा स्वास्थ्य पर होने वाला खर्च घटेगा।भविष्य की पीढ़ियों के लिए पर्याप्त जल उपलब्ध रहेगा। तापमान वृद्धि और  मौसम की घटनाओं को नियंत्रित करने में सहायता मिलेगी। पशु-पक्षियों और वनस्पतियों की विविधता सुरक्षित रहेगी। पर्यावरण संरक्षण समाज को सामूहिक दायित्व और कर्तव्यबोध की ओर प्रेरित करता है।

भारतीय दृष्टि में पर्यावरण का बहुत महत्त्व है

भारतीय संस्कृति सदैव प्रकृति को पूजनीय मानती रही है। हमारे यहाँ नदियों को माता, पृथ्वी को धरती माता, वृक्षों को देवतुल्य और समस्त सृष्टि को एक परिवार माना गया है। "माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः" जैसी अवधारणाएँ पर्यावरण के प्रति हमारी सांस्कृतिक चेतना को प्रकट करती हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा पंच परिवर्तन के अंतर्गत पर्यावरण संरक्षण का आह्वान इसी भारतीय दृष्टि का आधुनिक स्वरूप है। जब प्रत्येक नागरिक जल बचाएगा, वृक्ष लगाएगा, प्लास्टिक का त्याग करेगा और प्रकृति के प्रति उत्तरदायी व्यवहार अपनाएगा, तब ही पर्यावरण संरक्षण केवल एक कार्यक्रम न रहकर जनआंदोलन बन जाएगा।

पर्यावरण संरक्षण आज विकल्प नहीं, आवश्यकता है। जल, जंगल और जमीन के संरक्षण के बिना मानव सभ्यता का सुरक्षित भविष्य संभव नहीं है। सिंगल यूज़ प्लास्टिक का त्याग, जल संरक्षण और वृक्षारोपण ऐसे सरल कार्य हैं जिन्हें प्रत्येक व्यक्ति अपने जीवन में अपना सकता है। यदि समाज संगठित होकर इन विषयों पर कार्य करे तो न केवल पर्यावरण सुरक्षित होगा, बल्कि एक स्वस्थ, समृद्ध, आत्मनिर्भर और संतुलित भारत का निर्माण भी संभव होगा। यही भाव पंच परिवर्तन के पर्यावरण संबंधी आयाम का मूल संदेश है।

लेखक अखिलेश श्रीवास्तव वरिष्ठ पत्रकार एवं सामाजिक कार्यकर्त्ता हैं।

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