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नेहरू का आत्मचिंतन और मोदी की प्रशंसा

मैं जवाहरलाल नेहरू बोल रहा हूं...

जवाहरलाल नेहरू ने वर्तमान भारत की प्रगति पर विचार करते हुए माना कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उन कार्यों को पूरा किया है जो उन्हें पहले कर लेना चाहिए था।


मैं जवाहरलाल नेहरू बोल रहा हूं

पंकज झा

इतिहास बड़ा निष्ठुर होता है। वह नीर-क्षीर विवेकी भी होता है, बशर्ते उसके दूध में सायास पानी न मिला दिया गया हो। इतिहास के कालखंड में सात-आठ दशक कोई बहुत लंबा समय नहीं होते। स्वतंत्रता का समय भी उसके लिए मानो कल की ही बात है। इतिहास के इसी कारागार में विश्राम करते हुए मैं, जवाहरलाल नेहरू, आज नए भारत को देख रहा हूं। कभी फ्रांसिस फुकुयामा ने इतिहास की समाप्ति की बात कही थी, किंतु भारतीय दृष्टि से देखें तो स्वयं इतिहास का इतिहास ही इतना विशाल है कि उसके जनक माने जाने वाले हेरोडोटस भी मानो अभी-अभी आए हों। ऐसे में अस्सी वर्ष का अंतर तो पलक झपकने जितना ही है।

इतिहास के इसी शिकंजे में बैठा मैं स्वयं से पूछता हूं क्या यह वही भारत है, जिसके लिए हमने नियति से करार किया था? क्या वह संकल्प पूरा हुआ? आज बिना किसी दुराग्रह के मैं स्वीकार करता हूं कि भारत के वर्तमान प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने उन अनेक कार्यों को पूरा किया है, जिन्हें मुझे अथवा मेरे बाद आने वालों को बहुत पहले कर लेना चाहिए था। आज जब मेरी और मोदीजी की तुलना होती है, तो मैं संकोच के बिना कह सकता हूं कि अनेक मामलों में उन्होंने भारत को वहां पहुंचाया है, जहां पहुंचाने का स्वप्न हमारे समय ने देखा था। बापू का भारत, हजारों स्वतंत्रता सेनानियों का भारत, गुमनाम-अनाम बलिदानियों का भारत उस दिशा में उन्होंने निर्णायक कदम बढ़ाए हैं।

इतिहास के झरोखे से वर्तमान को देखता हूं तो मन में बार-बार यही विचार आता है कि काश, समय को पीछे मोड़ने वाली कोई यंत्रणा होती और मैं उन निर्णयों को बदल पाता, जिन्हें आज अपनी सबसे बड़ी भूल मानता हूं। वर्तमान का मूल्यांकन करते हुए मेरे सामने पश्चाताप के अनेक अवसर खड़े हैं। उन सबका एक ही प्रायश्चित मुझे दिखाई देता है यह स्वीकार करना कि भारत के चौदहवें प्रधानमंत्री ने अनेक विषयों में अपने पूर्ववर्तियों से कहीं अधिक दूरदृष्टि और दृढ़ता का परिचय दिया है।

अब आत्मचिंतन का समय है। इसलिए मुझे यह स्वीकार करने में कोई संकोच नहीं कि नरेंद्र मोदी ने अपनी महानता किसी वंश, विशेषाधिकार या प्रचार से नहीं, बल्कि अपने कर्म से अर्जित की है। हमने तत्कालीन राजनीति के कारण अनेक कर्मयोगियों को उनका उचित सम्मान नहीं दिया। गांव, किसान और देहात में बसने वाले भारत की समझ भी हममें उतनी नहीं थी, जितनी होनी चाहिए थी। हमने भारत को पुस्तकों, विचारधाराओं और पाश्चात्य दृष्टि से पढ़ा, जबकि वास्तविक भारत खेतों, गांवों, तीर्थों, परंपराओं और जनजीवन में सांस लेता था। पढ़ा हुआ भारत और जिया हुआ भारत—दोनों में कितना अंतर होता है, यह अब अधिक स्पष्ट दिखाई देता है।

मैं मूलतः कश्मीरी था, किंतु कश्मीर के दर्द को उस गहराई से नहीं समझ पाया, जैसी एक भारतीय प्रधानमंत्री को समझनी चाहिए थी। अनुच्छेद 370 और 35-ए जैसे प्रावधान तात्कालिक राजनीति और तुष्टीकरण की नीति का परिणाम थे। अपने मंत्रिमंडलीय सहयोगी डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की आशंकाओं को भी मैंने पर्याप्त महत्व नहीं दिया। आज इतिहास के कटघरे में खड़ा होकर यह स्वीकार करने में मुझे संकोच नहीं कि उन निर्णयों के दूरगामी परिणाम देश ने भुगते। हजारों कश्मीरी पंडितों का विस्थापन, उनका अपने ही देश में शरणार्थी बन जाना और दशकों तक कश्मीर का असामान्य बने रहना मेरे अंतर्मन को आज भी व्यथित करता है। नरेंद्र मोदी ने उस अनुच्छेद को समाप्त कर वह निर्णय लिया, जिसे लेने का साहस हम नहीं जुटा सके। इसलिए मैं मानता हूं कि उन्होंने मेरे अधूरे संकल्प को पूर्ण किया।

जब मैं अपने कहे जाने वाले राजनीतिक दल की वर्तमान स्थिति देखता हूं तो एक और पश्चाताप सामने आता है। महात्मा गांधी चाहते थे कि स्वतंत्रता के बाद कांग्रेस का रूपांतरण लोक सेवक संघ में हो जाए। यदि उस समय मैंने उनकी बात मान ली होती, तो शायद भारतीय राजनीति की दिशा कुछ और होती। वंशवाद को बढ़ावा देना भी मेरी बड़ी भूल रही। आज पीछे मुड़कर देखता हूं तो अनुभव होता है कि लोकतंत्र में किसी परिवार का नहीं, केवल राष्ट्र का स्थायी स्थान होना चाहिए।

भारत के विभाजन, सरदार वल्लभभाई पटेल को उनके समुचित स्थान से वंचित रखने, डॉ. राजेंद्र प्रसाद के प्रति अनावश्यक कटुता और सोमनाथ मंदिर के पुनरुद्धार जैसे प्रसंगों पर भी आज आत्मग्लानि होती है। प्रसन्नता इस बात की है कि आज वही सोमनाथ अपने वैभव के साथ खड़ा है और उसके गौरव के पुनर्स्थापन में नरेंद्र मोदी की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। इतिहास अंततः उसी को स्मरण रखता है, जो निर्माण करता है, केवल विमर्श नहीं।

विदेश नीति के क्षेत्र में भी मेरी अनेक धारणाएं समय की कसौटी पर पूर्णतः सफल सिद्ध नहीं हुईं। गुटनिरपेक्षता का उद्देश्य उचित था, पर उसका व्यवहारिक स्वरूप सीमित रह गया। आज भारत सभी प्रमुख शक्तियों से समान निकटता रखते हुए अपने राष्ट्रीय हितों को सर्वोपरि रखता है। यही वास्तविक रणनीतिक संतुलन है। चीन के प्रति मेरे अत्यधिक विश्वास, 'हिंदी-चीनी भाई-भाई' की भावना, सुरक्षा संबंधी तैयारियों की उपेक्षा और 1962 के कटु अनुभव की स्मृति आज भी मुझे विचलित करती है। इसके विपरीत, आज का भारत गलवान से लेकर डोकलाम तक अपने राष्ट्रीय स्वाभिमान की रक्षा करते हुए दिखाई देता है। यह परिवर्तन भारत के आत्मविश्वास का प्रतीक है।

जब मैं अपने परिवार की बाद की पीढ़ियों को देखता हूं तो राजा इंद्रद्युम्न की कथा स्मरण आती है, जिन्होंने यह वरदान मांगा था कि वे निर्वंश हों, ताकि उनके कार्यों का श्रेय लेने कोई वंशज न आए। अब समझ आता है कि महात्मा गांधी भी वंशवादी राजनीति के प्रति क्यों सजग थे। लोकतंत्र में वंश-परंपरा नहीं, योग्यता ही नेतृत्व का आधार होनी चाहिए। यदि मेरे निर्णयों ने उस प्रवृत्ति को बढ़ावा दिया, तो उसका दायित्व मुझसे अलग नहीं किया जा सकता।

आज मुझे लगता है कि मेरी अनेक भूलों का मूल कारण यह था कि विशेषाधिकारों से भरा जीवन भारत की वास्तविक संवेदना को पूरी तरह समझ नहीं पाया। भारत को जानने के लिए भारत जैसा जीवन जीना पड़ता है। अब यदि सनातन मान्यताओं के अनुसार मुझे पुनर्जन्म का अवसर मिले, तो मैं किसी साधारण भारतीय परिवार में जन्म लेना चाहूंगा, ताकि इस देश को पुस्तकों से नहीं, जीवन से समझ सकूं। तभी भारत की आत्मा को पहचाना जा सकता है।

माफी मांग लेने से कोई छोटा नहीं हो जाता। अपने जीवन में मैंने अनेक ऐसे निर्णय लिए, जिनका बोझ इतिहास आज भी मेरे नाम के साथ जोड़ता है। यदि मेरे कारण राष्ट्र को पीड़ा पहुंची, यदि मेरे निर्णयों से भविष्य की पीढ़ियों को कठिनाइयों का सामना करना पड़ा, तो उस दायित्व से मैं स्वयं को अलग नहीं कर सकता। प्रयागराज की धरती में विलीन मेरी राख का प्रत्येक कण आज यही कहना चाहता है कि राष्ट्र किसी व्यक्ति से बड़ा होता है। यदि किसी उत्तराधिकारी ने राष्ट्रहित में उन भूलों को सुधारा है, तो उसके योगदान का सम्मान होना ही चाहिए।

भारतीय गणतंत्र के सबसे लंबे समय तक प्रधानमंत्री रहने का जो रिकॉर्ड कभी मेरे नाम था, उसके आगे निकलने पर मैं श्री नरेंद्र मोदी को बधाई देता हूं। इतिहास अंततः पदों की अवधि नहीं, निर्णयों की गुणवत्ता का मूल्यांकन करता है। मेरी कामना है कि भारत निरंतर प्रगति करे, अपनी सभ्यता, संस्कृति और आत्मविश्वास के साथ विश्व का नेतृत्व करे। और यदि मेरी भूलों से भविष्य के नेतृत्व को कोई सीख मिलती है, तो वही मेरे आत्मस्वीकार का सबसे बड़ा प्रतिफल होगा।

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