लालकिले से प्रधानमंत्री ने नक्सलवाद के खिलाफ बोलते हुए 'दिमागी नक्सलियों' को आधुनिक चुनौती बताया। इस विचारधारा का विरोध और मुकाबला जरूरी है।
लालकिले की प्राचीर से देश को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि 21वीं सदी में उन दशकों पुरानी चुनौतियों को खत्म करना जरूरी है, जिन्होंने देश को पीछे रखा। उनके मुताबिक, नक्सलवाद और माओवाद ने लाखों युवाओं का भविष्य बर्बाद किया, अनगिनत माताओं के युवा बेटों को छीन लिया और देशभर के परिवारों के सपनों को चकनाचूर किया।
लालकिले की प्राचीर से होने वाले प्रधानमंत्री के सालाना संबोधन पर चर्चाएं और बहसें होना कोई नई बात नहीं है। लेकिन इस बार प्रधानमंत्री द्वारा प्रयुक्त दो शब्दों ‘दिमागी नक्सल’ ने इन चर्चाओं की तासीर जरूर बढ़ा दी है। ऐसा नहीं कि प्रधानमंत्री इन शब्दों के संजीदापन से अनजान होंगे। इनके इस्तेमाल के पीछे दो वजहें साफ नजर आती हैं। पहली, प्रधानमंत्री देश के उस वर्ग की ओर ध्यान दिलाना चाहते हैं, जिसकी नजर में उनकी और उनकी सरकार की हर पहल गलत और दकियानूसी है। दूसरी, अपने समर्थकों और पार्टी कार्यकर्ताओं को नए उत्साह से भरना, जो हालिया कुछ घटनाओं से किंचित निराश हैं।
लालकिले की प्राचीर से देश को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि 21वीं सदी में उन दशकों पुरानी चुनौतियों को खत्म करना जरूरी है, जिन्होंने देश को पीछे रखा। उनके मुताबिक, नक्सलवाद और माओवाद ने लाखों युवाओं का भविष्य बर्बाद किया, अनगिनत माताओं के युवा बेटों को छीन लिया और देशभर के परिवारों के सपनों को चकनाचूर किया। लगभग चार दशकों तक नक्सलवाद ने भारत के बड़े हिस्से और उसकी आबादी के एक बड़े हिस्से को अपनी गिरफ्त में रखा, बंदूक के दम पर शासन किया और संविधान की धज्जियां उड़ाईं। प्रधानमंत्री ने कहा कि आज हथियार वाले नक्सल से बड़ी चुनौती ‘दिमागी नक्सली’ हैं और देश को उनसे भी बचाना होगा।
कभी देश का एक तिहाई हिस्सा लाल गलियारे के रूप में जाना जाता था। माओवादियों और नक्सलियों की समानांतर सत्ता का असर नेपाल से लेकर आंध्र प्रदेश तक महसूस किया जाता था और उनके प्रभाव वाले इलाकों को ‘पशुपति से तिरुपति तक’ कहा जाता था। देश के गृहमंत्री की कमान संभालने के बाद अमित शाह ने 31 मार्च तक देश को लाल गलियारे से मुक्त कराने का लक्ष्य रखा था।
अमित शाह की दोहरी रणनीति के चलते यह गलियारा अब नक्सली हिंसा और आतंक से काफी हद तक मुक्त हो चुका है। इसे संयोग कहें या कुछ और कि जिस वक्त लालकिले से प्रधानमंत्री देश को संबोधित कर रहे थे, उसी वक्त लाल गलियारे वाले ओडिशा के मलकानगिरी और छत्तीसगढ़ के बस्तर के कई गांवों में पहली बार तिरंगा लहरा रहा था। उन तिरंगों को सलामी देने वालों में भारतीय संविधान के तहत पुलिस या होमगार्ड की वर्दी पहने वे लोग भी शामिल थे, जो हाल तक इन इलाकों में संविधान को नहीं मानते थे और मानते थे कि सत्ता बारूद से निकलती है। अब भी उनके हाथों में बंदूकें हैं और ट्रिगर पर उनकी ही उंगलियां हैं, लेकिन अब वे भारतीय संविधान की मर्यादा से बंध चुकी हैं।
प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन में इस बदलाव को रेखांकित किया है। लेकिन उन्हें आशंका है कि समाज के खासकर बौद्धिक वर्ग में मौजूद नक्सलवादी मानस वाले लोगों से निपटना आसान नहीं होगा।वैसे ‘दिमागी नक्सली’ कोई बिल्कुल नया शब्द नहीं है। करीब एक दशक पहले फिल्मकार विवेक अग्निहोत्री ने इसी तरह ‘अर्बन नक्सल’ शब्द का इस्तेमाल किया था। तब से वामपंथी हिंसा के विरोधी मानस वाले लोग इन शब्दों का खुलकर इस्तेमाल करते रहे हैं। उनका मानना रहा है कि देश में जब भी अराजक परिस्थितियां बनती हैं, उनके पीछे अर्बन नक्सलियों की सोच काम करती है। इस लिहाज से ‘दिमागी नक्सली’ उन्हीं शब्दों को नई पहचान देने की कोशिश है।
देश का अधिसंख्य बौद्धिक समाज शायद ही इससे इत्तेफाक रखता हो, लेकिन इस वर्ग पर अतीत में ‘दबाव समूह’ की तरह काम करने के आरोप लगते रहे हैं। नक्सली हिंसा के दौर में विश्वविद्यालयों और दूसरे संस्थानों में वामपंथी उग्रवाद के समर्थन और विरोध को लेकर तीखी बहसें भी होती रही हैं। सुरक्षा बलों पर हुए बड़े हमलों और राजनीतिक हिंसा ने इस बहस को कई बार और उग्र बनाया। दंतेवाड़ा और झीरम घाटी जैसी घटनाओं ने देश को झकझोरा, लेकिन लंबे समय तक नक्सलवाद से निपटने की रणनीति को लेकर केंद्र और राज्यों के बीच मतभेद भी बने रहे।
मनमोहन सरकार के दौर में नक्सली हिंसा के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जरूरत महसूस की गई, लेकिन व्यापक राजनीतिक और सामाजिक विरोध के बीच सैनिक कार्रवाई जैसी रणनीति आगे नहीं बढ़ सकी। झीरम घाटी में नक्सलियों ने छत्तीसगढ़ कांग्रेस के लगभग समूचे नेतृत्व को निशाना बनाया। इसके बावजूद नक्सलवाद से निपटने के लिए ऐसी ठोस और निर्णायक रणनीति सामने नहीं आ सकी, जो समस्या को जड़ से खत्म करने की दिशा में बढ़ती।
बाद में अमित शाह के नेतृत्व में रणनीति में बदलाव आया। ‘वामपंथी उग्रवाद’ के प्रति ‘जीरो टॉलरेंस’ की नीति अपनाई गई। देश को नक्सल मुक्त करने के राष्ट्रीय लक्ष्य के तहत संवाद, सुरक्षा और समन्वय पर जोर दिया गया। खुफिया जानकारी पर आधारित ऑपरेशन किए गए, केंद्रीय और राज्य बलों के बीच बेहतर तालमेल बनाया गया और जरूरत के मुताबिक वित्तीय मदद उपलब्ध कराई गई। साथ ही मुख्यधारा में लौटने वाले नक्सलियों के पुनर्वास की व्यवस्था भी जारी रही। सुरक्षा बलों के लगातार दबाव के चलते छत्तीसगढ़, तेलंगाना और महाराष्ट्र में बड़े पैमाने पर आत्मसमर्पण हुए। इसका असर नक्सली हिंसा, जवानों की मौत और आम नागरिकों के शिकार बनने की घटनाओं में कमी के रूप में दिखाई दिया। नक्सल प्रभावित जिलों की संख्या भी लगातार घटती गई। सुरक्षा और विकास की साझा रणनीति के तहत पुलिसिंग, कनेक्टिविटी, वित्तीय समावेश और आजीविका के अवसर बढ़ाए गए। नक्सल इलाकों में थाने, सुरक्षा कैंप और सड़कें बनीं। संचार कनेक्टिविटी, बैंकिंग ढांचा, डाकघर, आईटीआई, कौशल विकास केंद्र और पुनर्वास योजनाओं के विस्तार ने राज्य की मौजूदगी को मजबूत किया। इससे आर्थिक अवसर पैदा हुए और पूर्व माओवादी कैडरों को मुख्यधारा में लौटने का रास्ता मिला।
लालकिले की प्राचीर से प्रधानमंत्री ने इसे अपनी सरकार की उपलब्धि के रूप में गिनाया भी। लेकिन इसी के साथ ‘दिमागी नक्सली’ शब्द का इस्तेमाल एक नए राजनीतिक विवाद को जन्म देता दिख रहा है। हाल की कुछ राजनीतिक गतिविधियों और संसद मार्च के दौरान हुई हिंसा के पीछे वामपंथी उग्रवाद समर्थक ताकतों की भूमिका की चर्चाएं सामने आई हैं। सरकार का मानना है कि हथियारबंद नक्सलियों को पहचानना और उनका मुकाबला करना आसान है, लेकिन समाज के बीच मौजूद उसी मानसिकता से निपटना कहीं अधिक कठिन है। विपक्षी दलों को इसी बात पर एतराज है। उनका तर्क है कि प्रधानमंत्री और उनकी सरकार का विरोध करने वालों को ‘दिमागी नक्सली’ कहकर किनारे करने की कोशिश हो सकती है। लोकतंत्र में असहमति और विरोध का अधिकार अगर ऐसे विशेषणों के जरिए संदिग्ध बनाया जाएगा तो लोकतंत्र की बुनियादी भावना ही प्रभावित होगी।
कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने जिस तरह इन शब्दों को लेकर सरकार पर जवाबी हमला बोला है, उससे साफ है कि ‘दिमागी नक्सली’ आने वाले दिनों में सिर्फ बहस का विषय नहीं रहने वाले। ये शब्द सियासी तापमान बढ़ाने का एक नया जरिया भी बन सकते हैं। हथियार वाले नक्सलवाद के खिलाफ लड़ाई का एक अध्याय भले ही निर्णायक मोड़ पर पहुंच गया हो, लेकिन ‘दिमागी नक्सल’ की परिभाषा और उसके दायरे को लेकर शुरू हुई राजनीतिक लड़ाई अभी लंबी चलने वाली है।

उमेश चतुर्वेदी
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक समीक्षक हैं।)