पूरा सार एक शब्द में निहित होता है पर वो शब्द हर कंठ के योग्य नहीं होता-कुछ लोग अर्थ नहीं उठाते वे केवल ध्वनि से काम चला लेते है-मित्रता कोई भावनात्मक उत्सव नही जहाँ बिना आमंत्रण, बिना योग्यता हर कोई प्रवेश पा ले! ये एक मौन अनुबंध है जिसे निभाने से पहले पढ़ा नहीं, समझा जाता है-कहते है-प्रेम और मित्रता परखी नहीं जाती हाँ, नहीं परखी जाती पर केवल तब जब सामने आत्मा हो व्यापारी नही-कलयुग में समस्या ये नहीं कि लोग बुरे है समस्या ये है कि वे अधूरे है और अधूरे लोग पूर्ण भावनाओं को या तो तोड़ते है या इस्तेमाल करते है!
जो बहुत शीघ्र निकटता माँगे वो भीतर शून्य लिए चलता है जो हर समय अधिकार जताए वो उत्तरदायित्व से भागने की तैयारी में होता है मित्र वही नहीं जो साथ बैठे, मित्र वो है जो मौन में भी तुम्हारी गरिमा बचाए और जो तुम्हारी अनुपस्थिति में तुम्हें हल्का कर दे वो उपस्थित रहते हुए भी अनुपयुक्त है! इसलिए परख शब्दों की नही विरामों की करो जहाँ तुम्हारा मौन असहज लगे समझ लेना-वहाँ सत्य सुरक्षित नहीं-हर द्वार सबके लिए नहीं खुलता और हर हृदय कोई सराय नही कुछ को दूरी देना अहंकार नही आत्म-संरक्षण है क्योंकि जो गहराई में उतरने का साहस नहीं रखते वे ऊपर से ही पत्थर फेंकते है और उसे “अपनापन” कह देते है!!

सतीश शर्मा