एक विचारशील लेख में लेखक सतीश शर्मा बताया है कि कैसे गलत सवाल सार्थक संवाद को बाधित करते हैं और क्यों सही सवाल पूछना जरूरी है।
जीवन संवादों का संगम है, पर संवाद तभी सार्थक होता है जब प्रश्न और उत्तर दोनों अपने उद्देश्य में स्पष्ट, तार्किक और अर्थपूर्ण हों। परंतु जब प्रश्न ही भ्रमित, भ्रामक या उद्देश्यहीन हो-तब उत्तर चाहे जितना भी विवेकपूर्ण क्यों न हो, वह अपनी सार्थकता खो देता है। यही भाव इस विचार में निहित है- "गलत सवालों के सही जवाब नहीं होते।" गलत सवाल क्या होते हैं? गलत सवाल वे नहीं होते जो कठिन हों या जिनके उत्तर ज्ञात न हों; बल्कि वे होते हैं जो पूर्वाग्रह से ग्रसित हों, जिनमें तथ्यों का अभाव हो, या जिनका उद्देश्य केवल अपमान, भ्रम या छल करना हो। उदाहरण के लिए, यदि कोई किसी कलाकार से पूछे- "तुम्हारे काम का क्या फायदा, इससे पेट भरता है क्या?"- तो यह न केवल असंवेदनशील प्रश्न है, बल्कि यह कला के अस्तित्व को ही प्रश्नचिह्न में डाल देता है। इस पर उत्तर देना, उस प्रश्नकर्ता की दृष्टि से स्तरहीन संवाद में उतरना हो सकता है।
क्यों नहीं होते ऐसे प्रश्नों के उत्तर? क्योंकि उत्तर तभी दिया जा सकता है जब सामने वाला सवाल समझने की, सीखने की या जानने की भावना से प्रेरित हो। एक पूर्वनिर्धारित सोच, आलोचना या हठधर्मिता से उपजा प्रश्न किसी संवाद की मांग नहीं करता- वह केवल वाद-विवाद, टकराव या अपनी श्रेष्ठता जताने का माध्यम बन जाता है। ऐसे सवालों पर मौन या मुस्कान- क्यों अक्सर सबसे उपयुक्त उत्तर होते हैं? क्योंकि कभी-कभी किसी प्रश्न का उत्तर देना, उस 'गलत सोच' को मान्यता देना होता है। ऐसे में चुप रह जाना या एक शांत मुस्कान के साथ आगे बढ़ जाना, स्वयं की गरिमा बनाए रखने और अनावश्यक ऊर्जा व्यय से बचने का श्रेष्ठ उपाय है।
यह विचार हमें क्या सिखाता है? हमें यह विचार दो स्तरों पर जागरूक करता है
1 सवाल पूछने वाले के रूप में, कि हम अपने प्रश्नों को सोच-समझकर, खुले मन और सीखने की भावना से पूछें।
2 उत्तर देने वाले के रूप में, कि हर प्रश्न उत्तर के योग्य नहीं होता; और हर उत्तर, देने योग्य नहीं होता।
समाप्ति की ओर एक आग्रह यदि हम चाहते हैं कि हमारे समाज में संवाद की संस्कृति समृद्ध हो, तो हमें ‘प्रश्न करने की कला’ और ‘मौन रखने की समझ’- दोनों को अपनाना होगा। याद रखिए, सही प्रश्न आधे उत्तर के समान होता है, और गलत प्रश्न- पूरे संवाद को दिशाहीन कर सकता है।
"प्रश्न वही पूछिए जो सोच को आगे ले जाए, न कि किसी की आत्मा को पीछे धकेले।" आप क्या सोचते हैं? क्या आपने कभी किसी ऐसे 'गलत सवाल' का सामना किया है जिसका जवाब देना व्यर्थ लगा?

सतीश शर्मा