पश्चिम बंगाल में चुनावी हार के बाद ममता बनर्जी विपक्षी दलों को एकजुट करने में जुटीं, लेकिन कांग्रेस और वामदलों ने टीएमसी के साथ आने से साफ इनकार कर दिया।
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों में हार के बाद की राजनीतिक परिस्थितियों के बीच तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) प्रमुख ममता बनर्जी पूरी तरह अलग-थलग पड़ गई हैं। कांग्रेस और वामदलों ने भाजपा के खिलाफ विपक्षी एकता की उनकी अपील को ठुकराते हुए दो टूक मना कर दिया है। वहीं, बंगाल में शुभेंदु सरकार ने पहली ही कैबिनेट बैठक में कई बड़े निर्णय लेकर अपने इरादे जाहिर कर दिए हैं।
वैसे भी बंगाल में 15 वर्षों तक सत्ता में रहकर मनमानी करने से जनता ममता बनर्जी से परेशान थी। इस दौरान उन्होंने अपने विपक्षी सहयोगी कांग्रेस और वामपंथी दलों को भी कमजोर करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। यही कारण है कि अब जब सत्ता हाथ से जा चुकी है, तब ममता दीदी को कांग्रेस और वामदल याद आ रहे हैं। इसलिए कांग्रेस और वामपंथियों ने टीएमसी के साथ किसी भी तरह के गठबंधन की संभावना से साफ इनकार कर दिया है। ममता की स्थिति अब अरविंद केजरीवाल जैसी हो गई है।
वामपंथी नेताओं ने टीएमसी पर दमनकारी शासन, भ्रष्टाचार और अपराधियों को बढ़ावा देने का आरोप लगाया है। कांग्रेस ने ममता बनर्जी पर इंडिया गठबंधन को कमजोर करने और बंगाल में भाजपा के बढ़ने का मार्ग प्रशस्त करने का आरोप लगाया है। वामदलों ने ममता बनर्जी की विश्वसनीयता पर भी सवाल उठाए हैं।यह स्थिति ममता बनर्जी के लिए बड़ा झटका मानी जा रही है, जो 2026 के विधानसभा चुनाव में हार के बाद भाजपा के खिलाफ विपक्षी ताकतों को एकजुट करने की कोशिश कर रही थीं।
ममता ने कहा था, “मैं बंगाल के सभी विपक्षी दलों, छात्र संगठनों और गैर-सरकारी संगठनों से भाजपा के खिलाफ एकजुट होने की अपील करती हूं। राष्ट्रीय दलों के साथ-साथ मैं वामपंथी और अति-वामपंथी दलों से भी बंगाल और दिल्ली में साथ आने का आग्रह करती हूं। अगर कोई राजनीतिक दल मुझसे बात करना चाहता है, तो मैं उपलब्ध हूं। हमें याद रखना चाहिए कि हमारी पहली दुश्मन भाजपा है।”
ममता बनर्जी की अपील पर प्रतिक्रिया देते हुए माकपा के राज्य सचिव मोहम्मद सलीम ने कहा, “बिलकुल नहीं। हम किसी ऐसे व्यक्ति को स्वीकार नहीं करेंगे जिसकी पहचान अपराध, उगाही, भ्रष्टाचार और सांप्रदायिक राजनीति से जुड़ी हो। हम जनता और हाशिये पर खड़े लोगों के साथ रहेंगे।”
कांग्रेस प्रवक्ता सौम्य आइच रॉय ने ममता बनर्जी के बयान पर सवाल उठाते हुए कहा, “हमें अपने कानों पर विश्वास नहीं हो रहा। आपने राष्ट्रीय दलों, वामपंथियों और अति-वामपंथियों को साथ आने को कहा। अति-वामपंथी से आपका क्या मतलब है? क्या आप माओवादियों की बात कर रही हैं, जिन्होंने 25 मई 2013 को छत्तीसगढ़ में कांग्रेस के 18 नेताओं और कार्यकर्ताओं की हत्या कर दी थी?”
उन्होंने कहा, “कांग्रेस पूरे देश में भाजपा के खिलाफ लड़ रही है, लेकिन ममता बनर्जी ने वर्षों तक कांग्रेस और वाम दलों को खत्म करने की कोशिश की। अब आप चाहती हैं कि हम आपके साथ खड़े हों। यह संभव नहीं है।”वहीं भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के राज्य सचिव स्वपन बनर्जी ने कहा, “ममता बनर्जी के साथ हाथ मिलाने का सवाल ही नहीं उठता। उनके शासनकाल में लोकतंत्र खतरे में था। उनकी कार्यशैली इतनी तानाशाही रही कि चुनाव हारने के बाद भी उन्होंने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा नहीं दिया।”
सीपीआई के राज्य सचिव अभिजीत मजूमदार ने कहा कि ममता बनर्जी हमेशा दक्षिणपंथी राजनीति का प्रतिनिधित्व करती रही हैं और उनका शासन दमनकारी रहा है।उधर, पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ लेने के बाद शुभेंदु अधिकारी ने अपनी पहली कैबिनेट बैठक की अध्यक्षता की। इस बैठक में ‘सोनार बांग्ला’ के संकल्प के साथ कई ऐतिहासिक और बड़े निर्णय लिए गए हैं। शुभेंदु सरकार ने सीमा सुरक्षा और घुसपैठ पर लगाम लगाने के लिए बांग्लादेश सीमा पर बाड़बंदी हेतु बीएसएफ को जमीन हस्तांतरित करने का बड़ा फैसला लिया है।