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कोठी महल का नया अध्याय

इतिहास बताने को तैयार शताब्दी पुराना कोठी महल, आपस में ही उलझी कांग्रेस

उज्जैन स्थित कोठी महल, जिसे सिंधिया रियासत ने बनवाया था, अब वीर भारत संग्रहालय के रूप में विकसित हो रहा है। इसमें भारत के इतिहास की विभिन्न झलकियां प्रदर्शित की जाएंगी।


इतिहास बताने को तैयार शताब्दी पुराना कोठी महल आपस में ही उलझी कांग्रेस

अनुराग उपाध्याय, भोपाल

मेरा इतिहास एक सौ अड़तीस साल से दस्तावेजों में इबारत की शक्ल में दर्ज है और मैं एक कोठी महल के रूप में चर्चित हूँ। भूतभावन भगवान महाकाल की कृपा से मेरे अस्तित्व को लेकर इन दिनों खूब चर्चा हो रही है। एक समय सिंधिया राजवंश ने मुझे उज्जैन में बनवाया था। अब मैं मध्यप्रदेश सरकार के वीर भारत न्यास का हिस्सा हूँ। मैंने शिप्रा के जल से खुद को सींचा है। महाकाल की कृपा मुझ पर भी बरसती रही है। लेकिन कुछ राजनीतिक व्यक्तियों ने मुझे राजनीति के केंद्र में ला दिया है। कहा गया कि मुझे मात्र एक रुपये में बेच दिया गया है, लेकिन यह पूर्णतः असत्य और भ्रामक है। जबकि मैं पहले भी मध्यप्रदेश सरकार का हिस्सा था और आज भी हूँ। लोग मुझे तब भी कोठी महल कहते थे और मेरी अब भी यही पहचान है।

बाबा महाकाल की नगरी में कई प्रसिद्ध चीजें हैं। उनमें मैं भी शामिल हूँ। 138 साल का वैभव मुझमें समाया हुआ है। मेरी सुंदरता को बढ़ाने के साथ-साथ मुझे नए सिरे से संवारने का काम तेजी से चल रहा है। अब वीर भारत संग्रहालय मुझमें आकार ले रहा है। मेरे भीतर एक संग्रहालय के रूप में भगवान श्रीराम की 96 पीढ़ियों के साथ 30 हजार साल पुराने इतिहास की झलक नजर आएगी। मुझमें युगों के बदलाव तथा पूर्व वैदिक और उत्तर वैदिक नायकों का चित्रण होगा, जो बदलते भारत को उसके इतिहास से परिचित कराएगा।

वैसे भी मैं कोठी महल, उज्जैन की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहर का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हूँ। सिंधिया रियासत के समय 1888 में मेरा निर्माण तत्कालीन महाराज माधवराव सिंधिया (प्रथम) ने करवाया था। मेरे भीतर राजसी इतिहास की भव्यता के साथ सनातन संस्कृति करवटें बदलती रही है। मेरा स्थापत्य प्राचीन भारत की समृद्ध संस्कृति को प्रदर्शित करता है। मेरी वास्तुकला बेहद भव्य और आकर्षक है। पारंपरिक भारतीय राजसी वास्तुकला के साथ-साथ ब्रिटिश औपनिवेशिक शैली का भी मिश्रण मुझमें समाया है। मेरी दीवारों की नक्काशी, सुंदर स्तंभ और ऊंची छतें मुझे एक अद्वितीय शाही स्थल बनाती हैं। मैं सिर्फ कोठी महल या सिर्फ एक इमारत नहीं, बल्कि भारत की अनकही गाथा हूँ।

देश आजाद हुआ। मेरा राजसी वैभव तब भी कायम रहा। रियासतों के विलय के बाद पहले मैं मध्यभारत प्रांत का हिस्सा बना और फिर 1 नवम्बर 1956 को मध्यप्रदेश बनने के बाद मेरा स्वामित्व आधिकारिक तौर पर उज्जैन के राजस्व विभाग के पास आ गया। उज्जैन में लंबे समय तक जिलाधीश कार्यालय और जिला अदालत की चहल-पहल का मैं साक्षी रहा। इस शताब्दी के 24वें वर्ष में, 1 मार्च को, राजस्व विभाग से मुझे सरकार के वीर भारत न्यास को सौंप दिया गया। अब मुझमें वीर भारत संग्रहालय आकार ले रहा है। एक बार फिर मेरा वैभव लौटाने का काम चल रहा है, ताकि मैं त्रेता, द्वापर और कलयुग तक की कथाओं को कहने के साथ इतिहास की कई परतें खोल सकूँ।

वक्त चलता है और इतिहास का निर्माण होता रहता है। इस बार राजनीति करने वालों ने मुझे विवादास्पद बनाने का कुचक्र रचा। कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी ने आरोप लगाया कि मेरी 500 करोड़ रुपये की संपत्ति को मात्र एक रुपये में कुछ लोगों, अर्थात वीर भारत न्यास, को कौड़ियों के दाम बेच दिया गया है। उनकी आधी-अधूरी जानकारी पर पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने कहा कि कोठी महल सरकार से सरकार के पास ही गया है, इसमें कुछ भी गलत नहीं है। दलाल लोग ऐसे आरोप लगाते रहते हैं। इसके बाद मध्यप्रदेश की राजनीति में बवंडर खड़ा होना स्वाभाविक था। मुझसे पैदा हुआ विवाद कांग्रेस के लिए गले की फांस बन गया है। मुझसे बेवजह शुरू किया गया विवाद अब न्यायालय की ड्योढ़ी पर है। अब समय सबके सही-गलत का हिसाब लिखकर नई नजीर पेश करेगा, ताकि गलतबयानी करने वालों को सौ बार सोचना पड़े।

कोठी महल में क्या होगा

कोठी महल में वीर भारत संग्रहालय के पहले चरण में कुल 80 करोड़ रुपये से काम कराने की योजना मंजूर की गई है। इस न्यास के सचिव मुख्यमंत्री के सांस्कृतिक सलाहकार श्रीराम तिवारी हैं। यहां इतिहास के नायकों की प्रेरक कथाओं को विभिन्न माध्यमों से लोगों के सामने प्रदर्शित किया जाएगा। इस महल को दो चरणों में विकसित किया जाएगा। दूसरे चरण में संग्रहालय में परिवर्तित होने के बाद यह महल देश-दुनिया की एक ऐतिहासिक धरोहर कहलाएगा।

कोठी महल की मरम्मत कर उसे चमकाने पर 45 करोड़ रुपये उज्जैन स्मार्ट सिटी कंपनी खर्च करेगी, जबकि शेष राशि वीर भारत न्यास लगाएगा। पहले चरण में महल का जीर्णोद्धार कार्य चल रहा है। इसके बाद दूसरे चरण में वीर भारत संग्रहालय में देश के नायकों और महापुरुषों की प्रेरक कथाओं को विभिन्न माध्यमों से प्रस्तुत किया जाएगा। नायकों के चरित्र को पेंटिंग, उत्कीर्णन और शिल्पांकन के जरिए प्रदर्शित किया जाएगा। न्यास की कोशिश है कि सिंहस्थ 2028 से पहले इस संग्रहालय को लोगों के लिए खोल दिया जाए।

इसमें भारत का परिचय गैलरी, छह इमर्सिव एक्सपीरियंस गैलरी, पांच डिजिटल गैलरी, थीमैटिक पैनल गैलरी, फिजिकल कनेक्टिविटी कॉरिडोर, बच्चों के लिए इंटरैक्टिव लर्निंग जोन, फोटो गैलरी, स्वतंत्रता सेनानियों के लिए थीम आधारित डिजाइन, कैफेटेरिया, एमईपी कार्य, ऑटोमेशन सिस्टम, एआर-वीआर अनुभव, इंटरैक्टिव एवं डिजिटल स्क्रीन, सांस्कृतिक क्षेत्रों का विकास, डिजिटल टूर तथा संग्रहालय के प्रबंधन और रखरखाव जैसे कार्य किए जाएंगे। इसका उद्देश्य उज्जैन की समृद्ध विरासत को विश्वस्तरीय पहचान दिलाना है।

कुंभ एक्सपीरियंस सेंटर को रिसर्च सेंटर के रूप में तैयार किया जाना है, जिसमें समुद्र मंथन की कहानी, कुंभ के ज्योतिषीय महत्व का वर्णन, नीलकंठ का चित्रण, कुंभ यात्रा, अखाड़ों, नागा साधुओं, तीर्थ स्नान की परंपरा, शिप्रा आरती, प्रवचन, कीर्तन और शास्त्रार्थ जैसे विषयों पर शोध किया जा सकेगा।

क्या है वीर भारत न्यास

वीर भारत न्यास, मध्यप्रदेश शासन के संस्कृति विभाग द्वारा अप्रैल 2013 में रवीन्द्र भवन परिसर, भोपाल में स्थापित पूर्णतः सार्वजनिक न्यास है। न्यास का गठन युग-युगीन भारत की गौरवशाली परंपरा तथा भारतीय सभ्यता के विकास क्रम के अध्ययन पर केंद्रित करने, उसे व्यापक रूप से लोक-प्रचारित करने तथा वर्तमान और भावी पीढ़ियों को उससे सुपरिचित कराने के संकल्प के साथ किया गया है।

उज्जैन में न्यास द्वारा स्थापित किए जा रहे वीर भारत संग्रहालय में भारतवर्ष की गौरवगाथा को अभिव्यक्त करने के लिए देश के पुरापाषाण काल, पूर्व वैदिक, वैदिक, उत्तर वैदिक, उपनिषद, रामायण, महाभारत, महाजनपद, चाणक्य, चंद्रगुप्त मौर्य, सम्राट विक्रमादित्य, समुद्रगुप्त, चोल, पल्लव, राजा भोजदेव, भक्तिकाल से लेकर भारतीय स्वाधीनता संग्राम तक के गौरव चरित्रों तथा भारतीय सभ्यता के समस्त विकास क्रम को केंद्र में रखा जाएगा।

कोठी महल परिसर, जो कि शासकीय भवन परिसर है, को पूर्ण रूप से शासकीय न्यास को उपलब्ध कराया गया है। न्यास में किसी भी निजी व्यक्ति विशेष का कोई अंश नहीं है। वीर भारत न्यास के पदेन अध्यक्ष मुख्यमंत्री होते हैं, जबकि न्यासी सचिव आयुक्त/संचालक, स्वराज संचालनालय पदेन हो सकते हैं या संस्कृति के क्षेत्र में सक्रिय कोई विशेषज्ञ। वीर भारत न्यास के गठन (2013) से ही यह प्रावधान है कि संस्कृति विशेषज्ञ न्यासी सचिव के लिए आयु का कोई बंधन नहीं होगा। वर्तमान में इसके न्यासी सचिव श्रीराम तिवारी हैं।

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