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केजरीवाल की रामधुन पर सियासत

रामजी लगाएंगे बेड़ा पार

केजरीवाल ने अमित शाह से राम मंदिर के दर्शन न करने के बावजूद उसका उल्लेख किए जाने पर सवाल उठाया, पंजाब में हिंदू मतदाताओं को आकर्षित करने की कोशिश की।


रामजी लगाएंगे बेड़ा पार

उमेश चतुर्वेदी

केजरीवाल की इस रामधुन पर विचार करने से पहले पंजाब के मतदाता समुदाय की संरचना को समझना आवश्यक है। 117 विधानसभा सीटों वाले पंजाब की आबादी में 57.69 प्रतिशत हिस्सेदारी के साथ सिख समुदाय सबसे बड़ा है। दूसरे स्थान पर लगभग 39.49 प्रतिशत आबादी वाला हिंदू समुदाय है।

टेलीविजन के व्यापक प्रसार से पहले की सुबहें कुछ खास होती थीं। लगभग हर गली-मोहल्ले में मधुर धुन में एक भजन गूंजता रहता था— 'तेरा रामजी करेंगे बेड़ा पार, उदासी मन काहे को करे।' जन-जन तक इन शब्दों को अपने सुरों के माध्यम से पहुंचाने वाले हरिओम शरण पांच नदियों वाले प्रदेश पंजाब की माटी की उपज थे। इसे संयोग ही कहेंगे कि आज इसी पंजाब की धरती पर दोबारा राजनीतिक कब्जे की कोशिश में जुटे आम आदमी पार्टी के प्रमुख अरविंद केजरीवाल भी कुछ इसी अंदाज में रामधुन गा रहे हैं। गृहमंत्री अमित शाह से राम मंदिर के दर्शन न करने को लेकर उनका सवाल पूछना इसी रामधुन का विस्तार है।

अरविंद केजरीवाल की रामधुन कुछ अलग किस्म की है। भारतीय जनता पार्टी की तरह उन्होंने स्वयं को सीधे-सीधे रामभक्त बताने से परहेज किया है, लेकिन वे भारतीय जनता पार्टी के दूसरे सबसे प्रभावशाली नेता अमित शाह को कठघरे में खड़ा करने का प्रयास कर रहे हैं। उनका कहना है कि राम मंदिर की प्राण-प्रतिष्ठा के बाद अमित शाह ने अपने भाषणों और साक्षात्कारों में भगवान राम और राम मंदिर का 42 बार उल्लेख किया, लेकिन ढाई वर्ष बीत जाने के बावजूद वे अब तक राम मंदिर क्यों नहीं गए। ऐसा कहकर केजरीवाल एक तरह से यह स्थापित करने का प्रयास कर रहे हैं कि भारतीय जनता पार्टी के लिए राम श्रद्धा का विषय नहीं, बल्कि वोट हासिल करने का माध्यम हैं। इसके साथ ही उन्होंने अमित शाह से पांच सवाल भी पूछे हैं। उनका कहना है कि कई बार राम मंदिर के नाम पर वोट मांगने के बावजूद अमित शाह का राम मंदिर न जाना अनेक सवाल खड़े करता है।

केजरीवाल की इस रामधुन पर विचार करने से पहले पंजाब के मतदाता समुदाय की संरचना को समझना आवश्यक है। 117 विधानसभा सीटों वाले पंजाब की आबादी में 57.69 प्रतिशत हिस्सेदारी के साथ सिख समुदाय सबसे बड़ा है। दूसरे स्थान पर लगभग 39.49 प्रतिशत आबादी वाला हिंदू समुदाय है। 1.93 प्रतिशत आबादी के साथ मुस्लिम समुदाय तीसरे और 1.26 प्रतिशत आबादी वाला ईसाई समुदाय चौथे स्थान पर है। माना जाता है कि 2022 के विधानसभा चुनाव में सिख संगत के बड़े हिस्से ने आम आदमी पार्टी का साथ दिया था। इसके साथ ही लगभग 11 प्रतिशत हिस्सेदारी वाले दलित समाज का भी झाड़ू चुनाव चिह्न को भरपूर समर्थन मिला था। लेकिन इस बार बेअदबी कानून और मुख्यमंत्री भगवंत मान पर लगे कथित बेअदबी के आरोपों के कारण आम आदमी पार्टी बैकफुट पर दिखाई दे रही है।

इसी बीच भगवंत मान के कथित वायरल वीडियो को लेकर भी सियासी और पंथिक घमासान मचा हुआ है। इस वीडियो में उन्हें गुरु ग्रंथ साहिब की बेअदबी करते हुए दिखाया गया है। हालांकि मुख्यमंत्री भगवंत मान इसे उनकी छवि खराब करने की सोची-समझी साजिश बता रहे हैं। उनका दावा है कि वीडियो में दिखाई देने वाला व्यक्ति वे नहीं हैं। उनका कहना है कि चुनाव से ठीक पहले उनकी पार्टी, उनकी सरकार और उनकी व्यक्तिगत छवि को नुकसान पहुंचाने के उद्देश्य से यह वीडियो प्रसारित किया गया है। मान का कहना है कि उनके कार्यकाल में लागू की गई जन-कल्याणकारी नीतियों और व्यापक जनहित के फैसलों को कमजोर करने के लिए यह फर्जी वीडियो बनाया गया है। आम आदमी पार्टी लगातार इसकी फोरेंसिक जांच की मांग करती रही है। हालांकि अकाल तख्त ने इस सफाई को स्वीकार नहीं किया। इस मामले में अकाल तख्त ने भगवंत मान को तलब भी किया। वहां भी उन्होंने अपनी पूर्ववत सफाई दोहराई। लेकिन अकाल तख्त के जत्थेदार कुलदीप सिंह गरज्ज का कहना है कि मान ने तख्त के समक्ष असत्य कहा, क्योंकि अकाल तख्त द्वारा कराई गई फोरेंसिक जांच में वीडियो सही पाया गया है।

मुख्यमंत्री मान भले ही यह कहते रहें कि उन्होंने पंथ के प्रति कोई अपमानजनक व्यवहार नहीं किया, लेकिन सामान्य सिख समुदाय उनकी इस सफाई को स्वीकार करता नहीं दिख रहा है। स्पष्ट है कि आगामी चुनावों में इसका असर दिखाई दे सकता है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि अमित शाह से राम मंदिर को लेकर सवाल उठाना, दरअसल केजरीवाल की एक सोची-समझी रणनीति है। उन्हें आशंका है कि राज्य का बहुसंख्यक सिख समुदाय इस बार आम आदमी पार्टी से दूर जा सकता है। इसलिए उन्होंने राम का मुद्दा प्रमुखता से उठाना शुरू किया है। इसके माध्यम से वे एक ओर भारतीय जनता पार्टी को घेरने का प्रयास कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर यह संदेश देने की कोशिश कर रहे हैं कि उनकी पार्टी ही हिंदू समुदाय के हितों की वास्तविक पक्षधर है। इस बहाने वे हिंदू वोट बैंक को अपनी ओर आकर्षित करना चाहते हैं।

वैसे यह पहला अवसर नहीं है, जब आम आदमी पार्टी के नेतृत्व ने चुनाव से पहले हिंदू प्रतीकों और देवी-देवताओं की शरण ली हो। दिल्ली विधानसभा चुनाव 2020 से ठीक पहले अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसोदिया ने कनॉट प्लेस स्थित प्रसिद्ध हनुमान मंदिर में दर्शन किए थे। उनके वहां जाने के बाद आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ताओं में भी मंदिर जाने की होड़-सी लग गई थी। यह अलग बात है कि उनकी सरकार मस्जिदों के इमामों और मौलानाओं के मानदेय की घोषणा कर चुकी थी, जबकि मंदिरों के पुजारियों के लिए ऐसी कोई ठोस और प्रभावी योजना सामने नहीं आई। इसी कारण उनकी आलोचना भी हुई थी। हालांकि हनुमान मंदिर में दर्शन के बाद 2020 के विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी को बड़ी जीत मिली।

बंटवारे के दौरान पंजाब की हिंदू और सिख आबादी ने भारी कीमत चुकाई थी। उन दिनों पंजाब में राष्ट्रीय विचार का संगठन काफी सक्रिय था। ऐसे में माना जाता था कि राज्य में भारतीय जनता पार्टी का मजबूत उभार होना चाहिए था, लेकिन पंथिक राजनीति के कारण ऐसा नहीं हो सका। अकाली दल के साथ लंबे समय तक गठबंधन रहने के बावजूद भारतीय जनता पार्टी का प्रभाव मुख्यतः शहरी क्षेत्रों तक सीमित रहा, जहां उसे हिंदुओं की पार्टी के रूप में देखा जाता था। राज्य की बहुसंख्यक सिख आबादी पर अकाली दल और कांग्रेस का प्रभाव बना रहा। गठबंधन के दौरान भारतीय जनता पार्टी छोटे सहयोगी की भूमिका में रही। अकाली दल के नेतृत्व ने उसे ग्रामीण क्षेत्रों और अन्य समुदायों में विस्तार का पर्याप्त अवसर नहीं दिया तथा उसे सीमित सहयोगी बनाकर रखा। कृषि कानूनों के बाद दोनों दलों का गठबंधन टूट गया और तब से दोनों की राजनीतिक राहें अलग हैं। इस बीच भारतीय जनता पार्टी ने भी अपनी रणनीति बदली है। वह अब राज्य में प्रमुख राजनीतिक शक्ति बनने की कोशिश कर रही है। सुनील जाखड़, कैप्टन अमरिंदर सिंह और रवनीत सिंह बिट्टू जैसे दिग्गज नेताओं को साथ लेकर वह स्वयं को एक मजबूत विकल्प के रूप में स्थापित करने का प्रयास कर रही है। इस रणनीति की बुनियाद राज्य का हिंदू समुदाय है। ऐसे में केजरीवाल की रामधुन भी इसी कोर वोट बैंक को साधने का प्रयास मानी जा रही है। उन्हें आशंका है कि पिछले चुनाव में उनका प्रमुख समर्थक रहा सिख समुदाय इस बार उनसे दूर हो सकता है।

वैसे तो आज समूची राजनीति ही पैंतराबाजी की उस्ताद बन चुकी है, लेकिन केजरीवाल और उनकी पार्टी ने इसमें विशेष दक्षता हासिल कर ली है। राजनीतिक आवश्यकता के अनुसार वह स्वयं को कभी सेकुलर, कभी अल्पसंख्यकों की हितैषी और अवसर आने पर धार्मिक प्रतीकों से जुड़ा हुआ भी प्रस्तुत करती है। अमित शाह से राम मंदिर को लेकर सवाल पूछना भी इसी बदलती राजनीतिक रणनीति का उदाहरण माना जा सकता है। पंजाब के लगभग 39 प्रतिशत हिंदू मतदाताओं का भरोसा जीतने की कोशिश के रूप में भी केजरीवाल के इन सवालों को देखा और समझा जा सकता है।

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