बृजेश कुमार त्रिपाठी के अनुसार, जौहर को कायरता के रूप में देखना गलत है। ऐतिहासिक घटनाओं की तुलना करते हुए उन्होंने इसे नारी सम्मान का प्रतीक बताया।
मोहतरमा जब जौहर को कायराना बता रही थीं, तब उन्हें 1739 में नादिर शाह के हमले के समय दिल्ली के मुस्लिम खानदानों की महिलाओं के कुओं में छलांग लगाकर मौत को गले लगाने की कोई खबर नहीं है। तो 1857 में अंग्रेज सैनिकों के अत्याचारों से बचने के लिए मुस्लिम औरतों की आत्महत्याओं का भी कोई भान नहीं है। न ही 1617 में असम में अहोम से युद्ध के दौरान मुगल सेना के शिविर में कासिम खान चिश्ती के कैंप की महिलाओं की सामूहिक आत्महत्या की कोई जानकारी होगी। अन्यथा वह जानती-समझतीं कि नर-पिशाचों के आगे बिछना और फिर तिल-तिल कर गुलामी, यौन दासता का जीवन जीना महिला आत्मसम्मान के लिए कितना नारकीय होता है..!
मोहतरमा को तो आक्रांता मोहम्मद बिन कासिम की क्रूरता के आगे बेबस राजा दाहिर की दोनों बेटियों की दुर्दशा में या चित्तौड़, रायसेन, चंदेरी, गुजरात और ओरछा में जैसी हजारों-लाखों रानियों-महिलाओं के इस्लाम कबूल करके अपना जीवन बचा नहीं लेने का भारी मलाल है या इन बलिदानी रानियों-महारानियों के दुष्ट आक्रमणकारियों, राक्षसों के हरम में जाकर बलात्कारियों की सेवा नहीं कर पाने का घोर कष्ट है..!मोहतरमा दुखी हैं कि आखिर इन प्राण त्यागने वाली राजघरानों की महिलाओं ने गजवा-ए-हिंद के मूवमेंट के दीनी गाजियों की सेवा करने का शबाब क्यों नहीं उठाया। इन हुतात्माओं ने खुद को सेवा में प्रस्तुत नहीं करने की गुस्ताखी करके हरम की सजावट बनने से इनकार करके मोमिन आबादी बढ़ाने वाले आक्रांताओं के दीनी मकाम को पूरा क्यों नहीं किया..!
यदि किसी को मोहतरमा के नास्तिक होने का भ्रम है तो वह उन्हें मुंबई की गलियों में उनके नारा-ए-इलेक्शन की तकरीर के वीडियो में हुक्म तामिली की हुंकार भरते देख-सुन सकते हैं। लेफ्टिस्ट नास्तिक हो, यह शर्त यहां एप्लाई नहीं करती..!इन मैडम को दाऊद इब्राहिम अंडरवर्ल्ड के आगे आत्महत्याएं करतीं उत्पीड़ित बॉलीवुड महिला कलाकार भी कायर ही लगती होंगी, क्योंकि उन्होंने भी व्यभिचारीय आत्मसमर्पण नहीं किया। दरअसल, टीआरपी की भूखी और माले-गनीमत के हुक्म की अवहेलना से नाराज इन मोहतरमा को गुजरात की रानी कमला और उसकी अभागी बेटी देवल की एक ही जीवन में मोमिन सुल्तान खिलजी की बेटी, बहू, समधन, सास बनने की घृणित व्यथा से कोई मतलब नहीं है, बल्कि उन्हें इस मां-बेटी का यौन दासी का दीनी जीवन ज्यादा कुबूल होता..!
यही नहीं, इन कथित प्रगतिशील कलाकार को शेरशाह द्वारा रायसेन के राजा की फूल-सी बेटी को कुरान की शपथ तोड़कर गुलाम बनाकर नट के हाथ में बेच देना संतोषप्रद लगा तो ओरछा के जुझार सिंह के परिवार की कुलीन महिलाओं को शाहजहां के हरम में सौंप देना भी वीरतापूर्ण दिखा..!वीर रानी दुर्गावती जी के वीरतापूर्ण आत्मोत्सर्ग के बाद राजघराने की रानी एवं भावी पुत्रवधू को अकबर के आगरा के हरम में धर्म परिवर्तन करके नारकीय जीवन जीना भी इन मोहतरमा के लिए ज्यादा वीरतापूर्ण था, क्योंकि इससे दीन की सेवा-मदद मिल रही थी..!
अपनी जड़ों से कटने का अनर्थ क्या होता है, इसकी जीती-जागती गवाही जौहर को कायरतापूर्ण बताने वाली बेगम की शेखी है। दरअसल, वह जन्म-पश्चात आज जिस जीवन-विचारधारा को जी रही हैं, उसमें कण-कण में भगवान, आत्मा में परमात्मा का कोई स्थान नहीं होने से करुणा, दया जैसी मानवीय संवेदनाओं के आत्मसम्मान के ऊपर यौन गुलामी, दासता जैसी बर्बरता की कबीलाई शारीरिक व्याधियों का प्रकोप ज्यादा हो जाता है, जिससे उनकी शब्दावली-सोच में व्यक्तिगत गरिमा से ज्यादा पशुता पूर्ण जीवन जीना कहीं अधिक सुविधा लगता है..!
वीरांगनाओं की गौरवपूर्ण श्रृंखला में खिलजीकालीन जैसलमेर, रणथंभौर के जौहर की वीरांगनाएं, दक्षिण में तुगलक के विरुद्ध कम्पली की वीर रानी 1326, वीर रानी दुर्गावती जी 1564 का आत्मबलिदान, वीरांगना रानी अवंतीबाई लोधी 1858 का अंग्रेजों के विरुद्ध आत्मबलिदान, वीरांगना प्रीतिलता वाडेदार 1932 का अंग्रेजों के विरुद्ध सायनाइड द्वारा आत्मबलिदान, वीरांगना रानी कर्णावती 1535 चित्तौड़ जौहर की आत्मबलिदानी, वीरांगना रानी लाली मेवाणी 1423 गागरोन जौहर की हुतात्मा हो या अंग्रेजों के विरुद्ध अमर बलिदानी रानी लक्ष्मीबाई जी इन सभी ने जीते-जी शत्रु के कलंकित, पापी हाथों में पड़ने की अपेक्षा वीरांगना के रूप में जीवन कुर्बान कर दिया। जो भी वीरांगनाओं के साहसिक बलिदान को कायरता दिखाने के रूप में कलंकित कर रहा है, वह मातृभूमि के प्रति कृतघ्नता का परिचय दे रहा है..!
मोहतरमा के लिए उनके व्यक्तिगत जीवन की स्वतंत्रता, खुशी का पूर्ण सम्मान है, परंतु कृपया वह इस आजादी का सार्वजनिक जीवन में वीरांगनाओं के अपमान से अशांतकारी वातावरण के लिए दुरुपयोग नहीं करें तो मानवता के लिए, महिला सशक्तीकरण के लिए यही ज्यादा कल्याणकारी रहेगा। इस प्रकार सस्तेपन से अपनी मार्केटिंग बढ़ाना वास्तविक कायरता है..!
इस मातृभूमि की बलिवेदी पर मातृशक्ति के त्याग-बलिदान को सभी हुतात्माओं की आत्मा की शांति के लिए क्षमा सहित, उनके श्रीचरणों में विनम्र श्रद्धांजलि के साथ सादर नमन। हे देवियों, क्षमा करना, हम आपकी विषम परिस्थितियों को अभी तक दूर नहीं कर पाए हैं, पर एक दिन सत्य की जीत अवश्य होगी। आपका बलिदान व्यर्थ नहीं होगा.. वंदे मातरम्..!

॥ बृजेश कुमार त्रिपाठी
(लेखक उज्जैन में जिला कार्यक्रम अधिकारी हैं)