विदिशा के ज्ञानचंद जैन और उनके परिवार ने आपातकाल के दौरान भूमिगत रहकर जेलों में बंद स्वयंसेवकों के परिवारों तक भोजन और सहारा पहुंचाया।
लोकतंत्र की रक्षा केवल आंदोलनों, गिरफ्तारियों और जेल यात्राओं से ही नहीं होती, बल्कि उन मौन सेवकों के समर्पण से भी होती है, जो संकट की घड़ी में स्वयं को यज्ञ की समिधा की तरह राष्ट्रहित में अर्पित कर देते हैं। आपातकाल के दौर में विदिशा निवासी स्वर्गीय ज्ञानचंद जैन और उनका परिवार इसी त्याग, सेवा और राष्ट्रनिष्ठा का जीवंत उदाहरण बनकर उभरा। उन्होंने न केवल दमन के उस कठिन समय का साहसपूर्वक सामना किया, बल्कि उन परिवारों का संबल भी बने, जिनके घरों के कमाने वाले लोकतंत्र की रक्षा के संघर्ष में जेलों में बंद थे।
स्वर्गीय ज्ञानचंद जैन की पुत्रवधु एवं भारतीय जनता पार्टी की प्रदेश प्रवक्ता श्रीमती मंजरी जैन बताती हैं कि उनके ससुर आपातकाल के संस्मरण पूरे परिवार को बड़े आत्मीय भाव से सुनाया करते थे। उन्हीं स्मृतियों में उस दौर की पीड़ा, संघर्ष और सेवा का ऐसा दस्तावेज सुरक्षित है, जो आज भी प्रेरणा देता है।
वर्ष 1975 में विदिशा का जैन भोजनालय केवल एक होटल नहीं था, बल्कि समाज के हर वर्ग के लोगों का भरोसेमंद ठिकाना था। राजनेताओं, समाजसेवियों और जरूरतमंद लोगों के लिए उसके द्वार सदैव खुले रहते थे। 26 जून 1975 की सुबह जब आपातकाल की घोषणा के बाद पुलिस ने विरोधियों की धरपकड़ शुरू की, तब 41 वर्षीय ज्ञानचंद जैन का नाम भी गिरफ्तारी सूची में शामिल था। वे स्वयं भी आंदोलन कर जेल जाना चाहते थे, किंतु संगठन ने उन्हें एक अलग और अत्यंत महत्वपूर्ण दायित्व सौंपा जेलों में बंद स्वयंसेवकों और लोकतंत्र सेनानियों के निर्धन परिवारों तक भोजन और आवश्यक सहायता पहुंचाने का यह कार्य अत्यंत जोखिम भरा था।
यदि भोजन होटल में तैयार होता तो पुलिस को संदेह हो सकता था और पूरा सेवा अभियान समाप्त हो जाता। इसलिए निर्णय लिया गया कि भोजन घर की रसोई में बनेगा। इसके बाद घर का चूल्हा मानो सेवा का अखंड दीप बन गया। सुबह जलने वाला चूल्हा अगले दिन की तैयारी तक शांत नहीं होता था। इस सेवा की धुरी बनीं उनकी पत्नी स्वर्गीय शांतिबाई जैन। छह संतानों के पालन-पोषण और घर की जिम्मेदारियों के बीच उन्होंने कभी यह नहीं पूछा कि भोजन किसके लिए बन रहा है या कितना बनाना है। उन्होंने इसे सेवा नहीं, बल्कि राष्ट्रधर्म और मानवता की पूजा मानकर पूरी निष्ठा से निभाया।
भूमिगत स्वयंसेवक प्रतिदिन यह भोजन और आवश्यक सामग्री उन परिवारों तक पहुंचाते रहे, जिनके घरों में दो वक्त की रोटी का संकट खड़ा हो गया था। लगभग तीन महीने तक यह कार्य गुप्त रूप से चलता रहा, लेकिन अंततः इसकी भनक पुलिस को लग गई। अक्टूबर 1975 में ज्ञानचंद जैन को उनके होटल से गिरफ्तार कर मीसा के तहत जेल भेज दिया गया, जहां उन्होंने लगभग 18 महीने बिताए।पति के जेल जाने के बाद भी सेवा का यह संकल्प नहीं टूटा। उनकी बुजुर्ग माता स्वर्गीय गुलाबबाई जैन ने होटल की जिम्मेदारी संभाली, जबकि शांतिबाई जैन ने भूमिगत स्वयंसेवकों के सहयोग से भोजन, राशन और अन्य आवश्यक सामग्री जरूरतमंद परिवारों तक पहुंचाने का कार्य निरंतर जारी रखा। यह सेवा आपातकाल समाप्त होने तक बिना किसी प्रचार और अपेक्षा के चलती रही। जेल से रिहा होने के बाद भी ज्ञानचंद जैन जीवनभर समाजसेवा और संगठनात्मक कार्यों में सक्रिय रहे।
बाद के वर्षों में भी उनका राष्ट्रकार्य निरंतर जारी रहा। वे रामजन्मभूमि आंदोलन से जुड़े और वर्ष 1992 की कारसेवा में अयोध्या पहुंचे। परिवार के अनुसार वे बाबरी ढांचे के गुंबद तक पहुंचे थे और वहां से एक पत्थर स्मृति के रूप में लेकर आए थे। इसके अतिरिक्त वे तत्कालीन भाजपा अध्यक्ष डॉ. मुरली मनोहर जोशी के नेतृत्व में श्रीनगर के लाल चौक पर तिरंगा फहराने के अभियान में भी सहभागी बने। पार्टी के विभिन्न राष्ट्रीय अधिवेशनों और चुनावी दायित्वों में भी उन्होंने सक्रिय भूमिका निभाई। वर्ष 1980 में वे विदिशा मार्केटिंग सोसायटी तथा गृह निर्माण समिति के अध्यक्ष भी रहे। स्वर्गीय ज्ञानचंद जैन का जीवन इस सत्य का प्रमाण है कि इतिहास केवल बड़े नेताओं के भाषणों से नहीं, बल्कि उन साधारण परिवारों के असाधारण त्याग से भी बनता है, जो बिना किसी यश या प्रतिफल की आकांक्षा के समाज और राष्ट्र के लिए अपना सर्वस्व समर्पित कर देते हैं। उनका परिवार आज भी इस सेवा-संस्कार को लोकतंत्र और राष्ट्रनिष्ठा की अमूल्य धरोहर मानकर आगे बढ़ा रहा है।
भोपाल। आपातकाल का इतिहास केवल जेलों में बंद लोकतंत्र सेनानियों की पीड़ा का इतिहास नहीं है, बल्कि उन अनाम परिवारों के त्याग का भी इतिहास है जिन्होंने स्वयं संकट झेलकर दूसरों के जीवन में आशा की लौ जलाए रखी। विदिशा के स्वर्गीय ज्ञानचंद जैन और उनका परिवार ऐसे ही निःस्वार्थ कर्मयोगियों में था, जिसने भूमिगत रहकर जेलों में बंद स्वयंसेवकों के परिवारों तक भोजन, राशन और सहारा पहुंचाया। यह सेवा किसी राजनीतिक दायित्व से अधिक मानवता और राष्ट्रधर्म की साधना थी।