यूएई के OPEC छोड़ने और पश्चिम एशिया तनाव के बीच वैश्विक तेल बाजार में बड़े बदलाव के संकेत हैं। भारत के लिए यह संकट के साथ बड़ा अवसर भी बन सकता है।
वैश्विक तेल बाजार एक बार फिर एक निर्णायक मोड पर खड़ा है। अप्रैल 2026 के ताजा घटनाक्रमों, विशेषकर संयुक्त अरब अमीरात के ओपेक से बाहर निकलने के फैसले और पश्चिम एशिया में जारी तनाव के कारण अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा परिदृश्य में नाटकीय बदलाव की आहट मिल रही है। यह महज कीमतों में उतार-चढाव नहीं, बल्कि पिछले छह दशकों से चले आ रहे तेल के व्यापारिक ढांचे में बड़े बदलाव का संकेत है। यूएई का ओपेक से अलग होना यह दर्शाता है कि तेल उत्पादक देश अब केवल कार्टल के नियमों से बंधे नहीं रहना चाहते. बल्कि अपनी उत्पादन क्षमता और रणनीतिक हितों को प्राथमिकता दे रहे हैं।
दूसरी ओर, ईरान-इजराइल तनाव के कारण होर्मुज जलडमरूमध्य में आपूर्ति बाधित होने का डर बना हुआ है, जिससे कच्चे तेल के दाम 100-115 डालर प्रति बैरल तक जाने का अनुमान लगाया जा रहा है। गोल्डमैन सैश ने 2026 के लिए बेंट क्रूड के अनुमान में 10 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि की है। पिछले दशक में चीन वैश्विक तेल मांग का इंजन था, लेकिन अब यह परिदृश्य बदल रहा है। इलेक्ट्रिक वाहनों की बढ़ती स्वीकार्यता के कारण चीन में मांग कम हुई है, जबकि भारत की मांग में वृद्धि के साथ भारत एक बड़ा वैश्विक ऊर्जा ड्रायवर बनकर उभर रहा है। यह बदलाव भारत के लिए अवसर भी है और चुनौती भी।
भारत अपनी जरूरत का 60 प्रतिशत से अधिक तेल आयात करता है और वैश्विक तनाव के कारण आपूर्ति श्रृंखला पर दबाव बढ़ सकता है। व ढ़ती कीमतों के बीच, भारत सरकार को दीर्घकालिक समाधानों पर ध्यान केंद्रित करना होगा। बायोफ्यूल, ग्रीन हाईड्रोजन और नवीकरणीय ऊर्जा में निवेश को तेज करना। भारत की नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता पहले से ही 50 प्रतिशत से अधिक हो चुकी है। संकट की स्थिति में आपूर्ति बनाए रखने के लिए अपने भंडारों का प्रभावी उपयोग। केवल पश्चिम एशिया पर निर्भर न रहकर अन्य क्षेत्रों से भी तेल आयात को बढ़ावा देना। वैश्विक तेल बाजार में भू-राजनीतिक तनाव और नई तकनीकों के बीच संतुलन बनाना एक चुनौती है।
2026 में, बाजार में 'ओपेक प्लस' के प्रभुत्व को कम होते देखा जा सकता है। ऐसे में, भारत को न केवल ईंधन की कीमतों में अस्थिरता को प्रबंधित करना होगा, बल्कि ऊर्जा सुरक्षा के लिए टिकाऊ विकल्पों की ओर तेजी से बढ़ना होगा। स्थिरता और विकास के बीच संतुलन ही इस नए दौर में सफलता की कुंजी है। उल्लेखनीय है कि भारत अपनी कच्चे तेल की खपत के 85 फीसदी से अधिक के लिए आयात पर निर्भर करता है, इसलिए उसे कम कीमतों से लाभहोगा। यूएई भारत के शीर्ष आपूर्तिकर्ताओं में से एक है। दोनों देश अधिक मात्रा में तेल व्यापार के लिए दीर्घकालिक अनुबंध कर सकते हैं, जिससे अधिक स्थिरता और पूर्वानुमान सुनिश्चित होगा।
यूएई की पाइपलाइन क्षमता में सुधार की भी उम्मीद है, जिससे होर्मुज स्ट्रेट से बचा जा सकेगा। हालांकि निकट अवधि में लाभकेवल तभी मिलेगा जब पश्चिम एशिया का संकट हल हो जाएगा। बहुत कुछ समाधान की शर्तों पर भी निर्भर करेगा। यदि ईरान को भी स्वतंत्र रूप से तेल बेचने की अनुमति दी जाती है, तो उपलब्धता और बढ़ेगी और आयातकों के लिए कीमतों पर अनुकूल प्रभाव पड़ेगा।